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Balaghat News: ऐसी मान्यता है कि जंगल एक शुद्ध जगह होती है, जहां पर देवी रहती हैं. अगर वह गांव आईं और अशुद्ध हो गईं, तो वह नाराज होकर यहां से चली जाएंगी. जिसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं.
बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में आदिवासी समुदाय के लोग काफी संख्या है. ज्यादातर आबादी अब भी ग्रामीण अंचल और सतपुड़ा की पहाड़ियों में छोटे-छोटे टोले बनाकर निवास करती है. इनका जीवनयापन जंगलों पर निर्भर होता है. सीजन के मुताबिक आदिवासी जनजाति के लोग वहां से वनोपज चुनकर लाते हैं और अपनी जीविका चलाते हैं. ऐसे में आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक होता है. पर्यावरण संरक्षण के साथ उन्हीं पर निर्भर रहकर अपनी जीविका चलाता है. वहीं उनके देवी-देवता जंगल में ही पाए जाते हैं. वे साल में एक या दो बार वहां जाकर पूजा-अर्चना करते हैं. लोकल 18 ने आदिवासी समुदाय के देवी-देवताओं और उनकी पूजा-अर्चना के बारे में जानने की कोशिश की और यह भी जाना कि आदिवासी समुदाय के देवी-देवता जंगल में ही क्यों निवास करते हैं.
बालाघाट का 53 प्रतिशत भू-भाग जंगल में है और इन्हीं इलाकों में छोटे टोलों में आदिवासी समाज के लोग रहते हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, जिले की कुल आबादी की 22.51 प्रतिशत आबादी आदिवासी है. इसमें गोंड और बैगा समुदाय प्रमुख हैं. ऐसे में ये समुदाय अपनी संस्कृति और रहन-सहन के तरीकों से दुनिया में अलग पहचान बनाते हैं. साथ ही यह समाज दिखाता है कि वे प्रकृति के साथ जीवन जीने की कला कथित मुख्यधारा के लोगों से बेहतर ढंग से जानते हैं.
जंगल में होती है खास पूजा
बालाघाट के दक्षिण बैहर स्थित गांवों में आज भी प्राचीन ढंग से पूजा अर्चना होती है, जिसमें सारा गांव जमा होता है और गांव के ही कुछ लोगों में देवी और देव अवतरित होते हैं. आदिवासी समुदाय का मानना है कि वहां पर स्वयं देवी-देवता आते हैं. ऐसे में ग्रामीण सारी पूजन सामग्री लेकर जंगल की ओर जाते हैं और देव-देवी की पूजा करते हैं. दक्षिण बैहर के बम्हनी गांव के लोगों का मानना है कि पचामा दादर की पहाड़ियों पर अनेकों देवी-देवता विराजमान हैं. गांव के सुकचंद अर्मो का कहना है कि वहां छत्रपति नौजारी माता है. यह गांव की कुंवारी देवी हैं, जो जंगल में ही रहती हैं. यहां पर महिलाओं पर देवी आती हैं. वहीं आम पुरुषों पर भी देव आते हैं. ऐसे में सब झूमने लगते हैं. पारंपरिक वाद्ययंत्र बजते हैं. जैसे-जैसे वाद्य यंत्रों की आवाज तेज होती है, वैसे-वैसे देव आए लोग और झूमने लगते हैं.
बकरे की दी जाती है बलि
इस खास पूजा में गांव के लोग बकरा और मुर्गा लेकर आते हैं. मान्यताओं के मुताबिक, लोग लंबे समय तक पूजा करते हैं. इसके बाद बकरों को देवी के भी आगे रखते हैं और बकरों की बलि दी जाती है. बकरे का सिर माता को चढ़ाया जाता है और बचे बकरे की सब्जी बनाई जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं.
आखिर वनों में ही क्यों रहते हैं देवी-देवता?
ग्रामीणों ने बताया कि देवी को गांव में लाने की बहुत कोशिश की गई लेकिन देवी जंगल में रहना चाहती हैं. ऐसी मान्यता है कि जंगल एक शुद्ध जगह है, जहां पर देवी निवासरत हैं. अगर देवी गांव आईं और अशुद्ध हो जाएंगी, तो देवी नाराज होकर यहां से चली जाएंगी. जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं. ऐसे में आदिवासियों के देवी-देवता वनों में ही निवास करते हैं.
नाराज हो जाएंगे देवी-देवता
जहां पर बम्हनी दादर के लोग पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं, अब वहीं पर उन्हें माइनिंग का डर सता रहा है. उनका कहना है कि देवी-देवता जंगल में निवासरत हैं. ऐसे में अगर जंगल कट जाएंगे, तो देवी-देवता नाराज होकर चले जाएंगे. वहीं इलाके के विधायक संजय उइके का कहना है कि माइनिंग आएगी, तो जंगल के साथ आदिवासियों के देवी-देवता भी विलुप्त हो जाएंगे. ऐसे में इनके संरक्षण पर सरकार को ध्यान देना चाहिए.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.