भोपाल में पब्लिक ट्रांसपोर्ट फेल. 350 में सिर्फ 60 बसें, धूप में तड़प रहे यात्री

भोपाल में पब्लिक ट्रांसपोर्ट फेल. 350 में सिर्फ 60 बसें, धूप में तड़प रहे यात्री


भोपाल. पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम लगभग चरमराता नजर आ रहा है. हालात ऐसे हैं कि जिन लोगों के पास निजी वाहन नहीं हैं, उनके लिए रोजमर्रा का सफर बड़ी चुनौती बन गया है. शहर में बसों की भारी कमी और मेट्रो की धीमी रफ्तार ने यात्रियों को घंटों धूप में खड़े रहने पर मजबूर कर दिया है. बस स्टॉप से लेकर मेट्रो स्टेशनों तक लोगों के चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई देती है. राजधानी में सार्वजनिक परिवहन की यह स्थिति सीधे आम नागरिकों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है. स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि बस और मेट्रो व्यवस्था को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन जमीनी स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है.

मजबूरी में लोग महंगे ऑटो, ई-रिक्शा और निजी टैक्सी का सहारा ले रहे हैं. इससे उनका खर्च बढ़ रहा है और सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी रहती है. प्रशासन की योजनाएं कागजों पर जरूर दिखती हैं, लेकिन जमीन पर राहत नजर नहीं आ रही है. मेट्रो के फेरे लगातार कम किए गए हैं. इससे यात्रियों का भरोसा घटा है. लोग मेट्रो का उपयोग करने से बच रहे हैं. उम्मीद थी कि मेट्रो से ट्रैफिक और बसों का दबाव कम होगा, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं दिख रहा है.

350 में से सिर्फ 60 बसें सड़कों पर
भोपाल में कभी 300 से ज्यादा बसें सड़कों पर दौड़ा करती थीं. लेकिन अब स्थिति यह है कि करीब 350 बसों के बेड़े में से सिर्फ 60 बसें ही चल रही हैं. BCLL की बसों के डिपो में खड़े रहने से शहर की परिवहन व्यवस्था प्रभावित हुई है.

कर्मचारियों पर भी पड़ा असर
बसों के संचालन में कमी का असर कर्मचारियों पर भी पड़ा है. ड्राइवर, कंडक्टर और मेंटेनेंस स्टाफ बड़ी संख्या में बेरोजगार हो गए हैं. उनका कहना है कि टेंडर प्रक्रिया और ऑपरेटर कंपनियों के विवाद का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है.

बस स्टॉप पर घंटों इंतजार
शहर के प्रमुख बस स्टॉप जैसे बोर्ड ऑफिस, न्यू मार्केट और रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. गर्मी के मौसम में यह परेशानी और बढ़ जाती है. कई बार लोगों को आधे घंटे से एक घंटे तक बस का इंतजार करना पड़ता है.

महंगे विकल्पों की मजबूरी
बसों की कमी के चलते यात्री ऑटो, ई-रिक्शा और कैब का सहारा ले रहे हैं. ये साधन न सिर्फ महंगे हैं, बल्कि कई बार असुरक्षित भी माने जाते हैं. रोजाना यात्रा करने वालों के लिए यह खर्च भारी पड़ रहा है.

स्टूडेंट्स और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
इस संकट का सबसे ज्यादा असर छात्रों, महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रहा है. पहले जहां हर 10 से 15 मिनट में बस मिल जाती थी, अब इंतजार का समय बढ़कर एक घंटे तक पहुंच गया है. भीड़भाड़ और खराब बसों की हालत से परेशानी और बढ़ जाती है.

मेट्रो से भी नहीं मिल रही राहत
भोपाल में शुरू हुआ मेट्रो प्रोजेक्ट भी यात्रियों को राहत नहीं दे पा रहा है. प्रायोरिटी कॉरिडोर पर सीमित संचालन हो रहा है. एक ही ट्रेन अप-डाउन ट्रैक पर चल रही है. एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचने में 1 से 1.15 घंटे तक का समय लग रहा है.



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