जंगल की क्रांति में भी हुआ प्यार लेकिन…!पढ़िए नक्सली कमांडर कबीर की रीयल लाइफ कहानी

जंगल की क्रांति में भी हुआ प्यार लेकिन…!पढ़िए नक्सली कमांडर कबीर की रीयल लाइफ कहानी


Balaghat News: छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का छोटा सा गांव पोलमपल्ली… यही से शुरू हुई कबीर उर्फ सुरेंद्र की कहानी. असली नाम सोमा सोढ़ी. बचपन में ही गांव का माहौल ऐसा था कि नक्सलियों का असर हर तरफ था. पहले वो बाल संगठन से जुड़ा, फिर धीरे-धीरे उसमें इतना एक्टिव हुआ कि उसे अध्यक्ष बना दिया गया.

घर में खेती होती थी, लेकिन वन विभाग के लोग बार-बार जमीन खाली कराने के लिए परेशान करते. ऊपर से फोर्स के जवान भी गांव में आकर दबाव बनाते थे. ये सब देखकर उसके अंदर गुस्सा भर गया… और यही गुस्सा उसे 16 साल की उम्र में नक्सलियों के रास्ते पर ले गया.

ट्रेनिंग और खूंखार बनने की कहानी
1995 में उसने नक्सल संगठन जॉइन किया. कोंटा दलम के डिप्टी कमांडर बदरन्ना ने उसे शामिल किया और सिर्फ 5 दिन में बेसिक ट्रेनिंग दे दी. बाद में वो बड़े नेताओं के साथ काम करने लगा, यहां तक कि सेंट्रल कमेटी के मेंबर का गार्ड भी रहा. धीरे-धीरे वो संगठन में ऊपर चढ़ता गया और खतरनाक ऑपरेशनों का हिस्सा बन गया.

झीरम घाटी कांड: कबीर का कबूलनामा
कबीर ने खुद माना कि वो झीरम घाटी हमले में शामिल था. उसके मुताबिक, असली टारगेट फोर्स के हथियार लूटना था, लेकिन जब पता चला कि नेताओं का काफिला आने वाला है, तो प्लान बदल दिया गया. तीन दिन तक घात लगाकर बैठे रहे. जैसे ही काफिला आया, दोनों तरफ से रास्ता बंद कर दिया गया और हमला शुरू हो गया. करीब 3 घंटे तक गोलीबारी चली. कबीर कहता है कि वो महेंद्र कर्मा को जिंदा पकड़ना चाहते थे, लेकिन हालात बिगड़ गए और कई लोग मारे गए.

बालाघाट में दूसरा बड़ा चेहरा
2016 में वो बालाघाट पहुंचा और केबी डिविजन का प्रमुख बन गया. यहां एमएमसी जोन में वो दूसरा सबसे बड़ा नक्सली बन गया. लंबे समय तक उसने पूरे इलाके में अपनी पकड़ बनाए रखी.

प्यार, शादी और दर्दनाक अंत
जंगल की जिंदगी में भी उसे प्यार हुआ. सुकमा की साजंती उर्फ क्रांति से उसने शादी की. दोनों साथ में नक्सल गतिविधियों में सक्रिय रहे. उनकी एक बेटी भी हुई, जिसे बाद में रिश्तेदारों के पास छोड़ दिया. लेकिन 2024 में एक मुठभेड़ में उसकी पत्नी मारी गई. ये घटना उसके लिए बड़ा झटका साबित हुई.

आखिर क्यों किया सरेंडर?
लगातार दबाव, बड़े नेताओं का सरेंडर और संगठन की कमजोरी… ये सब देखकर कबीर टूट गया. आखिरकार 6 दिसंबर को उसने अपने 9 साथियों के साथ सरेंडर कर दिया. अब वही इंसान, जिसने जिंदगी भर संविधान को नहीं माना… आज उसी के तहत सामान्य जिंदगी जीना चाहता है.



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