IPL 2026 में हर डगआउट के पास कुछ अंजान चेहरे

IPL 2026 में हर डगआउट के पास कुछ अंजान चेहरे


नई दिल्ली. टी-20 क्रिकेट का वो बाजार बन चुका है जहां हर क्षेत्र के लोग अपनी रोटी सेंकने को तैयार है, इस फॉर्मेट का सबसे बड़ा ब्रैंड है IPLजो सिर्फ बाउंड्री लाइन के भीतर नहीं खेला जा रहा, असली मुक़ाबला कहीं और शिफ़्ट हो चुका है, इंस्टाग्राम की रील्स, यूट्यूब के बिहाइंड-द-सीन्स और ट्रेंडिंग हैशटैग्स की दुनिया में. पिछले कुछ साल में एक दिलचस्प, और थोड़ा चिंताजनक, ट्रेंड उभरा है, टीमें अब सिर्फ़ मैच जीतने नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर छाने के लिए भी खेल रही हैं.

ड्रेसिंग रूम हो या डगआउट जहां भले ही टीम मैनेजमेंट और खिलाड़ी ही होते हों, लेकिन टीम के इर्द-गिर्द अब एक पूरी “क्रिएटिव आर्मी” सक्रिय रहती है, जो हर पल को कंटेंट में बदलने के लिए तैयार रहती है. सवाल सीधा है, क्या यह दिखावा वाकई ब्रांड वैल्यू बढ़ाता है, या फिर दूर के ढोल सुहाने लगते है वाली कहावत

सोशल मीडिया है नई ‘इम्पैक्ट प्लेयर’?

एक रिपोर्ट के मुताबिक IPL 2025 में फ्रेंचाइज़ियों और ब्रांड्स ने इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर करीब ₹550 करोड़ खर्च किए. और 2026 में यह आंकड़ा ₹700 करोड़ के पार जाने की उम्मीद है, एक ऐसा निवेश, जो कई छोटे देशों के पूरे स्पोर्ट्स बजट से भी बड़ा है. Star Sports और Bartergram ने मिलकर सभी दस टीमों के लिए 75 इन्फ्लुएंसर ऑन बोर्ड किए, कई को तो पैसे नहीं, सिर्फ मैच टिकट देकर. IPL 2024 में 3.15 लाख से ज़्यादा इन्फ्लुएंसर पोस्ट्स आए, जिन्होंने 3.2 अरब एंगेजमेंट पैदा किया, और इनमें 56% से ज़्यादा माइक्रो-इन्फ्लुएंसर थे, वो चेहरे जिन्हें आप सड़क पर शायद पहचान भी न पाएं. अब फ़ोकस क्रिकेट की बारीकियों से हटकर इस पर आ गया है कि कौन-सा खिलाड़ी ‘सिग्नेचर डांस’ करेगा, कौन-सा मीम वायरल होगा. फ़ैंस के मन में सवाल उठना लाज़मी है, क्या हम एक क्रिकेट टीम को सपोर्ट कर रहे हैं, या एक कंटेंट क्रिएशन एजेंसी को?

प्लेयर्स का प्रदर्शन वर्सेज पब्लिसिटी

ये हर किसी को पता है कि कॉरपोरेट दुनिया ‘रीच’ के पीछे भागती है, लेकिन खेल का इतिहास कुछ और कहता है, असली ब्रांड वैल्यू हमेशा मैदान पर बनती है. सालों के इंतज़ार के बाद जब 2025 में RCB ने पहली बार ट्रॉफ़ी जीती, तो उनकी ब्रांड वैल्यू $269 मिलियन तक पहुंच गई, 18.5% की छलांग.यह उछाल किसी वायरल रील का नतीजा नहीं था, यह जीत का असर था, स्पॉन्सरशिप, मर्चेंडाइज़ और विज़िबिलिटी सब कुछ बदल गया.

 बड़ी टीमों की अल्टीमेटम :

चेन्नई सुपर किंग्स की ब्रांड वैल्यू सिर्फ 1.7% बढ़ी और वे पहले से तीसरे नंबर पर खिसक गए, वजह, मैदान पर निराशाजनक प्रदर्शन. इतना बड़ा फ़ैन बेस और ब्रांड रिकॉल होने के बावजूद एक खराब सीज़न ने पूरी तस्वीर बदल दी. CSK और MI की असली ताकत उनके मज़ाकिया सोशल मीडिया पोस्ट नहीं हैं, बल्कि उनके पास मौजूद दिग्गज खिलाड़ी और ट्रॉफ़ियों का इतिहास है. सच यही है,एक इन्फ्लुएंसर आपको लाइक्स दे सकता है, लेकिन एक मैच-विनर आपको पीढ़ियों की वफ़ादारी दिलाता है.

भ्रम का मायाजाल 

एक सर्वे बताता है कि 65% IPL फैंस को इन्फ्लुएंसर कैंपेन याद रहते हैं लेकिन सिर्फ 14% ने कहा कि उन्होंने किसी इन्फ्लुएंसर की वजह से ख़रीदारी की. इसके उलट, IPL 2024 में विराट कोहली को अकेले 75 लाख सोशल मीडिया मेंशन मिले. किसी इन्फ्लुएंसर को, एक प्रतिशत भी नहीं. RCB को 1.07 करोड़ मेंशन मिले, और वो भी तब, जब उन्होंने CSK को हराकर प्लेऑफ़ में जगह बनाई. मतलब साफ है, buzz तब बनता है, जब मैदान पर कुछ बड़ा होता है. पंजाब का उदाहरण और दिलचस्प है Shreyas Iyer के लिए सरपंच साहब कैंपेन वायरल हुआ, लेकिन यह किसी इन्फ्लुएंसर का कमाल नहीं था, यह एक खिलाड़ी की असली पहचान थी नतीजा, PBKS की ब्रांड वैल्यू में 39.6% की रिकॉर्ड बढ़ोतरी.

जब टीमें प्रदर्शन के बजाय ‘इमेज नैरेटिव’ पर ज़्यादा ध्यान देती हैं, तो हार के बाद वही सोशल मीडिया हथियार बन जाता है, ट्रोलिंग के लिए. हार्दिक पंड्या IPLइतिहास के पहले कप्तान बने जिन्हें हर मैदान पर दर्शकों ने बूट किया. रील्स थीं, ब्रांड डील्स थीं, लेकिन जब मैदान पर नेतृत्व कमजोर पड़ा, तो कोई डिजिटल रणनीति उस छवि को बचा नहीं सकी.

सोशल मीडिया से सुकून नहीं मिलने वाला 

फ़ैंस को पसीना चाहिए, जुनून चाहिए, न कि ड्रेसिंग रूम की स्क्रिप्टेड कॉमेडी. ₹30-40 करोड़ के विज्ञापन सौदे तब और भारी लगते हैं, जब टीम प्लेऑफ तक नहीं पहुंचती. स्पॉन्सर जीत में निवेश करता है, ट्रेंड में नहीं. IPL फ्रेंचाइज़ियों को याद रखना होगा, वे अंततः एक स्पोर्ट्स टीम हैं, कंटेंट एजेंसी नहीं. डेटा बार-बार यही कहता है, एक ट्रॉफ़ी जीत, एक ही वैल्यूएशन साइकल में टीम को तीसरे से पहले स्थान पर पहुंचा सकती है.

सोशल मीडिया शोर पैदा करती हैं और खिलाड़ी इतिहास लिखते हैं. अगर खेल केंद्र में नहीं रहा,तो यह पूरा डिजिटल महल ताश के पत्तों की तरह गिर सकता है. ब्रांड वैल्यू मैदान के अंदर बनती है, स्क्रीन पर सिर्फ उसका प्रचार होता है. अब वक्त है कि टीमें रील्स से नजर हटाकर नेट प्रैक्टिस और रणनीति पर वापस जाए क्योंकि आखिर में, स्कोरबोर्ड ही सबसे बड़ा सोशल मीडिया होता है और ब्रांड बनने की शुरुआत भी वहीं से होती है



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