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What is Bio Pallets: मध्य प्रदेश के जबलपुर और नरसिंहपुर में बायो पैलेट्स बनाने का काम तेजी से चल रहा है. जल्द ही अधिक से अधिक जिलों में इसको बनाने के लिए इकाइयां स्थापित होंगी. इस एलपीजी और कोयले का मजबूत विकल्प माना जा रहा है. जानें क्या है पैलेट्स?
Jabalpur News: घरेलू और औद्योगिक ईंधन की बढ़ती कीमतों और एलपीजी सिलेंडर की कमी के बीच मध्य प्रदेश के कृषि इंजीनियरों ने एक नया विकल्प पेश किया है. अब खेतों में जलने वाली धान और गन्ने की पराली न केवल प्रदूषण कम करेगी, बल्कि ईंधन का एक मजबूत विकल्प बनकर उभरेगी. इसे ‘बायो-पैलेट्स’ का नाम दिया गया है.
अक्सर किसानों के लिए सिरदर्द बनने वाली और पर्यावरण में जहर घोलने वाली पराली को अब फैक्ट्रियों में प्रोसेस कर छोटे-छोटे पैलेट्स में बदला जा रहा है. कृषि अभियांत्रिकी विभाग के विशेषज्ञ विशविजय मौर्य ने लोकल 18 को बताया कि इन पैलेट्स को बनाने के लिए पराली को बारीक कर, उसकी नमी निकालकर कंप्रेस किया जाता है. जहां NTPC में कोयले की जगह यह ‘सफेद कोयला’ जगह ले रहा हैं.
घरों और छोटे कारखाने में शुरू हुआ इसका इस्तेमाल
आगे बताया, इन पैलेट्स की ज्वलनशीलता बहुत अधिक है. सबसे बड़ी बात ये कि इन्हें जलाने पर राख बहुत कम बचती है. NTPC में कोयले के रिप्लेसमेंट के रूप में सरकार की मदद से इसकी सप्लाई शुरू हो चुकी है. जहां इंडस्ट्रियल बॉयलरों में इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा बड़ी तादाद में यह घरेलू ईंधन का विकल्प बनकर उभर रहा है. आने वाले समय में इसे रसोई गैस के एक सस्ते और सुलभ विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.
MP के इन जिलों में काम शुरू, बढ़ेगी डिमांड
फिलहाल, मध्य प्रदेश के जबलपुर और नरसिंहपुर में इन पैलेट्स को बनाने का काम तेजी से चल रहा है. प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी धीरे-धीरे पैलेट्स कारखाने स्थापित किए जा रहे हैं. क्योंकि बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. हालांकि, अभी हमारे पास उत्पादन क्षमता सीमित है, लेकिन जिस तरह से बड़े उद्योगों और बिजली संयंत्रों में इसकी मांग आ रही है, यह आने वाले समय में ईंधन का मुख्य आधार बनेगा.
आखिर यह सस्ता विकल्प क्यों है?
पैलेट्स ईंधन का काफी सस्ता विकल्प है, जो गैस और कोयले के मुकाबले काफी किफायती है. इतना ही नहीं, इससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता. साथ ही खेतों में होने वाली पराली जलाने की समस्या का समाधान भी है. वहीं, इसके उपयोग में जलने के बाद बहुत कम राख छोड़ता है. ईंधन के क्षेत्र में यह आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम साबित हो सकता है, जिससे न केवल पर्यावरण बचेगा बल्कि आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला बोझ भी कम होगा.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें