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Pyaz Ki Kheti: प्याज में गांठ बनने की प्रक्रिया शुरू होते ही जड़ और तना सड़न का प्रकोप बढ़ जाता है. शुरुआत में दो-तीन नए पत्तों के साथ ऊपरी हिस्से पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं, जो इसके शुरुआती संकेत हैं. ऐसे पौधों को खींचने पर सड़न की बदबू आना इस बीमारी की पहचान मानी जाती है, इसलिए किसानों को समय रहते सतर्क होकर उपचार करना चाहिए.
Agri Tips: मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्याज की खेती की जाती है, लेकिन इस समय किसानों के सामने जड़ और तना सड़न की समस्या बड़ी चुनौती बनती जा रही है. बदलते मौसम, बढ़ती नमी और फंगस संक्रमण के कारण यह रोग तेजी से फैल रहा है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है. कई किसानों की फसल खराब होने की कगार पर पहुंच रही है.
कृषि एक्सपर्ट अनुपम चतुर्वेदी ने लोकल 18 को बताया कि इस मौसम में यह रोग मुख्य रूप से फंगस के कारण होता है. जब प्याज में गांठ बनने की प्रक्रिया शुरू होती है, उसी समय यह बीमारी सक्रिय हो जाती है और धीरे-धीरे पूरी गांठ को सड़ा देती है. इससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और कई बार पूरी फसल नष्ट होने की स्थिति बन जाती है.
इन दवाओं से होगा बचाव
अनुपम चतुर्वेदी के मुताबिक, प्याज की फसल में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस का कल्चर यदि दो बार प्रिवेंटिव रूप से उपयोग किया जाए, तो इस रोग से काफी हद तक बचाव संभव है. यह लाभकारी बैक्टीरिया मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को नियंत्रित करता है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है. इसके साथ ही माइकोराइजा फंगस का उपयोग करने से जड़ों और गांठ का विकास बेहतर होता है, जिससे पौधा मजबूत बनता है और उत्पादन में वृद्धि होती है.
इन संकेतों को अनदेखा न करें
आगे बताया कि जैविक उपाय अपनाने से उनकी प्याज फसल में अच्छे परिणाम मिले. रासायनिक खेती करने वाले किसान शुरुआती लक्षण दिखते ही फंगीसाइड का उपयोग करना चाहिए, रोडोमिल गोल्ड और मैनकोजेब इस रोग को नियंत्रित करने में कारगर हैं. पौधों में दो-तीन नए पत्तों के साथ ऊपरी हिस्से पर सफेद धब्बे दिखना शुरुआती संकेत हैं. ऐसे पौधों को खींचने पर सड़न की बदबू आना इस बीमारी की पहचान माना जाता है, इसलिए समय पर उपचार जरूरी है.
गर्मी और नमी से दिक्कत
यह भी बताया कि गर्मी और नमी के मौसम में इस रोग का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में किसान कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WG (500 ग्राम प्रति एकड़) या कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% WP (500-600 ग्राम प्रति एकड़) का प्रयोग कर सकते हैं. दवा को रेत में मिलाकर या सिंचाई के पानी के साथ जड़ों में डालने से बेहतर परिणाम मिलते हैं और फसल को सड़न से बचाया जा सकता है.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें