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Ajab Gajab : छतरपुर जिले की शादियों में आज भी एक ऐसी रस्म निभाई जाती है. जिसे सालों से निभाया जा रहा है. दरअसल, जिले में आज भी कुछ समाज में शादी के दौरान लड़कों की जब बारात निकलती है तो निकासी के दौरान दूल्हा अपनी माता का स्तनपान करके बारात के लिए निकलता है. क्यों निभाई जाती है ये रस्म? कितने साल पुरानी है? आइए जानते हैं
Ajab Gajab : हाल ही में सोशल मीडिया में आईपीएस के.के. बिश्नोई की शादी खूब चर्चा में रही. दरअसल , IPS के.के. बिश्नोई ने शादी के लिए बारात लेकर निकलने से पहले अपनी मां का दूध पीकर एक रस्म निभाई थी. हालांकि, मप्र के छतरपुर बुंदेलखंड में भी मां अपने दूल्हे बने बेटे को दूध पिलाती है.
छतरपुर के बुंदेलखंड में शादी की रस्में सादगी और संस्कारों से भरी होती हैं. इनमें से एक विशेष परंपरा ‘दूध पिलाने’ की है. 80 वर्षीय केशकली लोकल 18 से बातचीत में बताती हैं कि हमारे छतरपुर में जब किसी लड़के की शादी होती है तो बारात जाने से पहले उसकी घर से निकासी होती है. निकासी के दौरान ही दूल्हे को उसकी मां अपने बेटे को अपने आंचल से ढंक लेती है और अपना आखिरी स्तनपान कराती है. ये एक तरह की रस्म है जिसे पूरा करना होता है. अगर बेटे की मां नहीं है तो फिर उसकी बुआ उसे अपना दूध पिलाती है. मां अपने बेटे को आखिरी दूध पिलाती है. इसलिए माताएं भावुक भी हो जाती हैं. क्योंकि इसके बाद उसका बेटा अलग हो जाएगा. वह अपनी मां के घर को छोड़कर दूसरे के घर जा रहा है. मैंने खुद अपने बच्चों को दूध पिलाया है. हमारे यहां तो सालों से रे रस्म निभाई जा रही है.
केशकली बताती हैं कि बेटा बना दूल्हा जब मां का स्तनपान कर लेता है तो वह फिर घर की तरफ़ नहीं देखता है. सीधे बारात लेकर दुल्हन के यहां पहुंचते हैं. केशकली के मुताबिक पहले के जमाने में कार गाड़ी नहीं चलती थीं, जंगल बहुत होता था. बेटा घर से बाहर नहीं निकला होता था. उसे कुछ हो न जाए, सकुशल वह अपने घर दुल्हन लेकर आए. इसलिए माताएं अपने दूल्हा बने बच्चों को दूध पिलाया करती थीं ताकि बेटा अपने मां के दूध की लाज रखे. दूध पिलाने से मतलब बेटे को शक्ति देना भी होता है. क्योंकि वह घर से निकलकर जंगल भरे रास्ते से होकर परदेश जाता है तो उसे माता लाड़ दुलार करके और शक्ति प्रदान कर भेजती है. आज भी हमारे बुंदेलखंड में कुछ समाज में ये परंपरा चलती है.
मां के लिए बेटा होता है छोटा बच्चा
केशकली बताती हैं कि यह रस्म इस बात का भी प्रतीक है कि बच्चा कितना भी बड़ा हो जाए या गृहस्थ जीवन में प्रवेश करे, वह अपनी मां के त्याग और उनके दूध के कर्ज को कभी नहीं भूलेगा. आज भी बेटा उसके लिए बच्चा ही है, भले ही वह कितना बड़ा हो जाए. यह परंपरा व्यक्ति को अपनी जड़ों के साथ जुड़ाव और मातृत्व के प्रति कृतज्ञ रहना सिखाती हैं.
मां के दूध का कर्ज कभी नहीं चुका सकता
‘जब एक बेटा शादी करने जैसे जीवन के बड़े पड़ाव पर खड़ा होता है, तो वह ‘मातृ ऋण’ को स्वीकार करता है. यह रस्म याद दिलाती है कि बेटा चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना बन जाए, वह अपनी मां के दूध का कर्ज कभी नहीं चुका सकता है. यह परंपरा उस अटूट विश्वास का प्रतीक है कि मां के संस्कारों की लाज को बेटा उम्र भर रखेगा. वहीं कई लोग इस परंपरा को इतिहास से जुड़ा सामाजिक संदेश भी मानते हैं.
वहीं छतरपुर के इतिहासकार इस रस्म का संबंध शौर्य और मर्यादा से भी बताते है. मध्यकाल में जब योद्धा युद्ध के मैदान में जाते थे, तब वे मां का दूध पीकर निकलते थे. इसका मतलब यह था कि वे युद्ध में ऐसा कोई भी अनैतिक कार्य नहीं करेंगे जिससे मां के दूध को लज्जा आए.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें