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यह दर्द है रानी का, जो केन-बेतवा लिंक परियोजना में शामिल प्रभावितों में से एक है। प्रशासन द्वारा लगाई धारा 163 और कड़े पहरे के बीच, हजारों आदिवासियों, किसानों और महिलाओं ने केन नदी की जलधारा के बीचों-बीच विरोध स्वरूप ‘प्रतीकात्मक चिताओं’ पर लेटे हैं।
रानी समेत बच्चों को लेकर चिताओं पर लेटी इन महिलाओं की एक ही मांग है। “न्याय दो या मौत।” पढ़िए यह रिपोर्ट…
प्रदर्शन की 3 तस्वीरें
केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में महिलाएं बांध के बीच में चिता बनाकर लेटी हुई हैं।

बांध के बीचों बीच बच्चों को छांव से बचाने इस तरह की टपरिया बनाई गई है।

महिलाएं बच्चों को नमक और पानी में रोटियां मिलाकर खिला रही हैं।
प्रशासन ने आने जाने पर लगाई रोक केन-बेतवा लिंक परियोजना में विस्थापन से प्रभावित ग्रामीणों का आंदोलन टाइगर रिजर्व में बांध निर्माण स्थल पर जारी है। प्रशासन ने पन्ना और छतरपुर की सीमाओं को सील कर बाहरी आवाजाही पर रोक लगा दी है। इसके जवाब में आंदोलनकारियों ने केन नदी को अपना ठिकाना बनाया, जो दोनों जिलों की सीमा साझा करती है।
पन्ना के किसान अपनी सीमा में और छतरपुर के किसान अपनी सीमा में रहते हुए संयुक्त रूप से आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के अमित भटनागर ने इसे ‘दमन के विरुद्ध लोकतन्त्र की जीत’ बताया है।

महिलाएं नदी का पानी पीकर आंदोलन में सहभागिता कर रही हैं।

नया गांव बसाने की मांग कर रहे ग्रामीण आंदोलनकारी विस्थापित गांव के बदले नया गांव बसाए जाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि गांव विस्थापित किए जा रहे हैं। इस कारण पुनर्वास कानून के अनुसार ही गांव बसाया जाए। इसमें गांव को विकसित करके भूखंड के साथ पांच लाख की राशि दी जाए।
साढ़े 12 लाख रुपए देकर प्रशासन अपना पल्ला न झाड़े। पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम में दो प्रावधान हैं- पुनर्वास पैकेज की पूरी राशि 12.50 लाख का एक भुगतान किया जाए अथवा गांव को विकसित करके भूखंड के साथ 5 लाख राशि दी जाए। विकल्प चुनने का अधिकार विस्थापित को है।

पुनर्वास की प्रक्रिया से असंतुष्ट हैं ग्रामीण वहीं, प्रशासन ने सामूहिक रूप से सभी विस्थापितों को 12.50 लाख रुपए भुगतान का फैसला किया है। करीब 40 फीसदी को कर दिया गया है। केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत और पन्ना जिले के 24 गांव विस्थापित किए जा रहे हैं।
इन गांवों के विस्थापित ग्रामीण शासन की पुनर्वास प्रक्रिया से असंतुष्ट हैं। विस्थापितों का कहना है कि 18 वर्ष से अधिक के सभी लड़के और लड़कियों को पुनर्वास का हकदार माना जाए। उम्र का निर्धारण वर्ष 2026 में किया जाए।
अधिनियम में भी 18 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति को पुनर्वास पैकेज का हक है। प्रशासन ने 18 साल को इकाई माना है, पर उम्र का निर्धारण वर्ष 2022-23 के लिए किया गया है।

नेतृत्वकर्ता बोले- टैंकर वालों को भगाया, नदी का पानी पीने को मजबूर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर का आरोप है कि यहां प्रशासन ने राशन-पानी, स्वास्थ्य सेवाएं सब बंद कर दी है। नदी का पानी पीने से बच्चे समेत दूसरे लोग बीमार हो रहे हैं। भटनागर कहते हैं- एक लड़के को दवा लाने भेजा था। लड़का बाहर तो गया, लेकिन फिर भीतर नहीं आ पाया।
डॉक्टर को भी नहीं आने दिया गया। देसी इलाज ही अब सहारा है। हालात बहुत गंभीर है। जैसा व्यवहार किया जा रहा है, अनहोनी का भी डर सता रहा है। राशन, पानी, आना-जाना, लाइट… सभी सेवाएं बंद कर दी गई हैं। मोबाइल तक चार्ज न हो, सबकुछ ऐसा किया गया है।
अमित कहते हैं कि जब 5 अप्रैल को आंदोलन की शुरुआत हुई तो पानी की सप्लाई टैंकर से हो रही थी।
टैंकर वालों को धमकाया गया। वे यहां से भाग गए। रास्ते में राशन छीन लिया गया, जो आंदोलन में शामिल होने आ रहे थे, उन्हें धमकाया गया। टैंट भी हटा दिया गया। बाहरी आवक तो रोक दिया, लेकिन गांववालों से काफी मदद मिल रही है।


लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। इससे उन्हें बीमारियों का सामना करना पड़ रहा।
बच्चों को डायरिया की शिकायत वे कहते हैं- अब नदी का पानी ही पीने से लेकर दूसरे काम में उपयोग में ले रहे हैं। ज्यादातर लोग बीमार हो रहे हैं। बच्चों को डायरिया की शिकायत हो रही है। हमारे आंदोलन को कुचलने की कोशिश हो रही है, लेकिन लोग उनती ही तेजी से बढ़ रहे हैं। अभी जो संख्या आपको 7 हजार दिख रही है, यह जल्दी ही 20 हजार से ज्यादा हो जाएगी।
ग्रामीणों द्वारा आटा हमें दिया जा रहा है, जिस कारण नमक से रोटी खा रहे हैं। पहले यहां कुछ दुकानें लगी थीं, लेकिन सबको भगा दिया, कोई आता है तो उन्हें मारा जाता है। पुलिस आंदोलन को खत्म करने रात में लाठी चलाने आती है, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग के कारण वे सफल नहीं हो पा रहे हैं।
आंदाेलन को लेकर कहते हैं शांति भंग कर रहे हो, हम पूछते हैं- यहां नदी किनारे जंगल में किसकी शांति भंग कर रहे हैं।
हमें जिलों में बांटकर अलग कर दिया यहां धारा 163 लगा दी। हमें जिले में बांट दिया। पन्ना के लोग नहीं आ सकते। छतरपुर के लोग नहीं आ सकते। नदी का एक किनारा पन्ना-दूसरा किनारा छतरपुर में है, इसलिए पन्ना वाले उस ओर, छतरपुर वाले इस ओर बैठे हुए हैं।
केन बेतवा लिंक परियोजना बताकर जिस केन नदी को बर्बाद किया जा रहा है, इस जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए हम अपनी जान दे देंगे।
प्रशासन को यदि गांव चाहिए तो विस्थापन को लेकर बने कानून का पालन करे। जन आंदोलन खड़ा होगा तो प्रशासन को बात मानना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो जन आंदोलन से पहले भी सत्ता समेत बहुत कुछ बदला है। 2026 का बुंदेलखंड का यह आंदोलन, देश की क्रांति का आंदोलन बनेगा।

महिलाएं इस तरह से संकेतिक चिता बनाकर उस पर लेटी हुई हैं।
चार साल से आवेदन, कई बार आवेदन दिए पिछले 4 साल से यह आंदोलन चल रहा है। हमने कई बार आवेदन दिया। प्रदर्शन किया। भूख हड़ताल पर बैठे। जल सत्याग्रह किया। सांकेतिक फांसी लगाई। खून से लेटर लिखा…। रैली, यात्रा सब किया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
दिल्ली चलो का नारा दिया… दिल्ली नहीं जाने दिया। राशन लूट लिया। वाहनों के फर्जी चालान काटे। कई लोगों को जबरन जेल में डाला।
अब 30 गांव के लोग एक ही मांग लेकर चिता पर लेटे हुए हैं। या तो हमें न्याय दो या फिर मौत दे दो। सरकार यहां आए बम पटककर सबको मार दे। हमारी मांग नहीं मानी तो अब सभी गांवों में चूल्हांबदी होगी। सरकार का यह चेहरा सबके सामने लाएंगे। अब भी नहीं माने तो गांवों में इन लोगों का प्रवेश बंद होगा।
कहा- मुझे खरीदने कोशिश की अमित अपने जेल जाने की वजह बताते हुए कहते हैं कि महिलाएं यहां न्याय नहीं तो बांध नहीं को लेकर आंदोलन कर रही थीं। मैं उन महिलाओं की बात मीडिया के सामने रख रहा था। जब देश में आंदोलन अपनी जगह बनाने लगा तो मुझे खरीदने की कोशिश हुई, फिर डराया गया।
बोले- आदिवासी लोग हैं, हम भी लूटें आप भी लूटिए। ये आदिवासी हैं, कितना भी पैसा दे दो, शराब में पैसे बर्बाद कर देंगे।

करियर खत्म करने का कहते हुए धमकाया आप नहीं माने तो आपका कॅरियर बर्बाद कर देंगे। मैंने जब कहा- न मैं आपको देखूं, न आप मुझे देखो… हम दोनों गरीबों को देखें, उनके हक की बात करें। इसके बाद मुझे 9 फरवरी को उठाकर जेल में डाल दिया। चार दिन जेल में रहा। दो दिन बिजावर, दो दिन लवकुशनगर। आंदोलन समाप्ति के लिए दबाव बनाया। नहीं माना तो मांगे मानने पर समझौता हुआ।
प्रशासन ने कहा था- 14 गांव में सर्वे। दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई। महिलाओं पर हुए लाठीचार्ज की जांच। हर गांव में ग्राम सभा की बात कही थी, लेकिन दो महीने बाद भी कुछ नहीं हुआ। हमारे 150 प्लस साथियों पर केस दर्ज किए गए। इस कारण आंदोलन फिर से शुरू किया।
अमित कहते हैं कि 3 गांव में दिखावे के लिए सर्वे किया। अरबों रुपए की यहां कमाई की जा रही है। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष सब मिले हुए हैं। अधिकारी, दलाल सब सक्रिय हैं। जंगल की लकड़ियों का खेल चल रहा है।

कानून का पालन कर लें तो मैं आंदोलन से हट जाऊंगा अमित का कहना है कि “यह लड़ाई सिर्फ मुआवजे की नहीं है। यह हमारे जल, जंगल, जमीन और संस्कृति को बचाने की लड़ाई है। जितना दमन होगा, संघर्ष उतना ही तेज होगा। वे कहते हैं- क्या कानून (धारा-11,15,18,19,21) का पालन मांगना अवैधानिक है?
अगर आपने इन कानूनों का 10 प्रतिशत भी पालन किया हो तो में आंदोलन से खुद हट जाऊंगा, अगर ग्राम सभा हुई है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक करें। फर्जी आश्वासनों से आंदोलन नहीं रुकेगा।

ग्रामीण हाथों में तख्तियां लेकर विरोध जता रहे हैं।
कलेक्टर बोले- 90% ग्रामीणों को मुआवजा दिया जा चुका कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने बताया कि 90% ग्रामीणों को मुआवजा दिया जा चुका है। वहां अनहोनी न हो, इसके लिए टीम लगातार नजर बनाए हुए है। आंदोलन करने वालों से हमारा संवाद निरंतर जारी है। किसी भी मदद की जरूरत होती है तो वो दी जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग की टीम वहां भेज रहे हैं। किसी को मेडिकल हेल्प की व्यवस्था होगी तो उन्हें वह व्यवस्था कराई जाएगी।

छतरपुर जिले के 13 गांवों के लोगों को साढ़े 6 सौ करोड़ से अधिक राशि का भुगतान किया जा चुका है, जिनके नाम छूटे हैं, उन्हें भी नए सिरे से जोड़कर लाभ देंगे। अतिरिक्त मांग करना संभव नहीं है। आंदोलन करने वाले लोग अपनी शिकायत स्थानीय प्रशासन या हमारे पास आकर बताएं।
सूचना मिली है कि जिले के बाहर से लोग आकर व्यवस्थाओं को बिगाड़ने में लगे हैं। इसको देखते हुए धारा 163 लागू के तहत कार्रवाई की है। मेरा सभी से अनुरोध है कानून का पालन कर आंदोलन छोड़ें, जो भी आपका स्थानीय प्रशासन है, वहां अपनी मांग रखें।
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नॉन मानसून सीजन में सागर समेत MP के 8 जिलों को पानी मिलेगा

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच 15 साल से चल रहे केन बेतवा लिंक परियोजना से पानी लेने का विवाद सुलझ गया है। इस परियोजना से नॉन मानसून सीजन (नंवबर से अप्रैल के बीच ) में मध्य प्रदेश काे 1834 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) व यूपी को 750 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी मिलेगा।
लगभग 35,111 करोड़ रुपए की लागत की इस परियोजना में 90% राशि केंद्र सरकार देगी। जबकि शेष 5-5% हिस्सेदारी मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश वहन करेंगे। इस योजना से सागर-विदिशा समेत एमपी के आठ जिलों को पानी मिलेगा। पूरी खबर पढ़िए