महाभारत के घायलों को एक रात में ठीक करता था ये चमत्कारी पौधा, रीवा में नर्सरी

महाभारत के घायलों को एक रात में ठीक करता था ये चमत्कारी पौधा, रीवा में नर्सरी


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Shalyakarni Benefits: डॉ दीपक ने लोकल 18 से कहा कि रामायण काल की बात करें, तो उसमें तीन महाशक्तिशाली जड़ी-बूटियों का जिक्र किया गया है. ये हैं- संजीवनी, विशल्यकर्णी और शल्यकर्णी.

रीवा. महाभारत के समय एक अनोखी जड़ी-बूटी का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे युद्ध में घायल सैनिकों का घाव तेजी से भर जाता था. यही नहीं, उस जड़ी-बूटी की पत्तियों और पौधे के छाल के रस में कपड़े को डुबोकर गंभीर घाव पर बांधने से वो भी ठीक हो जाता था. आज के समय में यह जड़ी-बूटी अति दुर्लभ है. इसका नाम शल्यकर्णी है, जिसका पौधा रीवा में संरक्षित है. आयुर्वेद में इस जड़ी-बूटी की महिमा सुन आप भी हैरान रह जाएंगे. रीवा के वन संरक्षक सामाजिक वानिकी वृत्त अनुसंधान केंद्र में अति दुर्लभ प्राचीनकाल की गुणकारी और चमत्कारी औषधि शल्यकर्णी के पौधे को संरक्षित करने का दावा किया गया है.

विशेषज्ञ डॉ दीपक ने लोकल 18 से कहा कि प्रयास किया जा रहा है कि इस पौधे की संख्या बढ़ाई जा सके. इस पौधे को कई साल पहले अमरकंटक के जंगलों से लाया गया था. इसके बाद रीवा के वानिकी विभाग में इसका पौधरोपण किया गया. यहां की औषधीय वाटिका में इसकी नर्सरी लगाई गई जबकि यहां पर रोपे गए शल्यकर्णी के कुछ पौधे 5 फीट से 10 फीट तक के हो चुके हैं.

60 फीट का होता है पेड़
उन्होंने कहा कि शल्यकर्णी एक लुप्तप्राय पौधा है. यह पौधा अब विलुप्त होने की श्रेणी में है. इस पौधे का वर्णन महाभारत काल में भी है. इस पौधे का लेप लगाने मात्र से ही युद्ध में घायल सैनिकों के घाव ठीक हो जाते थे. आयुर्वेद के ग्रंथ चरक संहिता में भी इसका वर्णन है. इस खास औषधि का पौधा करीब 50 से लेकर 60 फीट तक का होता है. महाभारत के युद्ध में सैनिक जब तलवार भाले और तीर से घायल होते थे, तब इस औषधि के पत्तों से उनका उपचार किया जाता था.

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रामायण और महाभारत में शल्यकर्णी पौधे का वर्णन
डॉ दीपक ने आगे कहा कि रामायण काल की बात करें, तो उसमें तीन महाशक्तिशाली जड़ी-बूटियों का वर्णन आता है, जिसमें संजीवनी, विशल्यकर्णी और शल्यकर्णी हैं. संजीवनी जड़ी-बूटी के सेवन से मरणासन्न हालत में पड़ा व्यक्ति जीवित हो जाता था. प्राचीनकाल में विशल्यकर्णी का पौधा भी विभिन्न प्रकार की बीमारियों में उपचार के लिए उपयोग में लाया जाता था. शल्यकर्णी तब भी घावों को ठीक करने में काम आता था.

मछली के घाव गायब थे
बताया जाता है कि सीधी और अमरकंटक के पहाड़ी क्षेत्र के अलावा रीवा के छुहिया पहाड़ में इसकी खोज आदिवासियों ने की थी. किंवदंती है कि कई साल पहले आदिवासियों ने एक झरने के पास एक बड़ी सी मछली को तीर मारकर उसका शिकार किया था. जिसके बाद आदिवासियों ने मछली को घर तक ले जाने के लिए पास ही लगे शल्यकर्णी के पत्तों का इस्तेमाल किया था. उन्होंने शिकार की गई मछली को शल्यकर्णी के पत्ते से लपेटा और उसे घर लेकर गए. दूसरे दिन सुबह जब मछली के ऊपर लपेटे गए पत्ते हटाए गए, तो मछली पर लगे तीर के घाव गायब थे. अब इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पौधा कितना चमत्कारी, लाभकारी और गुणकारी है.

आदिवासी आज भी करते हैं इस्तेमाल
जानकारी के मुताबिक, 2008 में एक आदिवासी सम्मेलन हुआ. उसी दौरान आदिवासियों ने इस दुर्लभ शल्यकर्णी पौधे की जानकारी दी थी. तभी यह पौधा दोबारा अस्तित्व में आया लेकिन अब यह पौधा विलुप्त होने के कगार पर है. यह पौधा हिमालय पर्वत के अलावा पचमढ़ी, अमरकंटक और रीवा सीधी के मध्य छुहिया पहाड़ में पाया जाता था. कहा जाता है कि यह खास पौधे अब काफी कम संख्या में छुहिया पहाड़ पर मौजूद हैं. बताया गया कि आज भी आदिवासी इस गुणकारी पौधे का इस्तेमाल कर अपना इलाज कर लेते हैं.

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महाभारत के घायलों को एक रात में ठीक करता था ये चमत्कारी पौधा, रीवा में नर्सरी

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.



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