खंडवा. मध्यप्रदेश में अगर आप किसी के घर मेहमान बनकर जाएं, या किसी खास अवसर पर किसी को बुलाया गया हो, तो वहां दाल बाफले न हो, ऐसा बहुत कम होता है. यह सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की परंपरा, संस्कृति और मेहमाननवाज़ी की पहचान है. खासकर मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड क्षेत्र में दाल बाफले को बड़े चाव से बनाया और परोसा जाता है.
दाल बाफला दरअसल एक पारंपरिक भोजन है, जिसमें ‘बाफले’ गेहूं के आटे से बने होते हैं और इन्हें खास तरीके से उबालकर फिर देसी घी में डुबोया जाता है. इसके साथ अरहर की तड़के वाली दाल परोसी जाती है और आमतौर पर इसके साथ चूरमा भी होता है जो गुड़ या शक्कर के साथ घी में बनाया जाता है.
दाल बाफले बनाने की पूरी पारंपरिक विधि
अब बात करते हैं असली रेसिपी की जो पीढ़ियों से चली आ रही है. इसे बनाना थोड़ा समय ज़रूर लेता है, लेकिन स्वाद ऐसा कि उंगलियां चाटते रह जाओ.
बाफले के लिए:
गेहूं का आटा – 500 ग्राम
सूजी – 100 ग्राम
अजवाइन – 1 छोटा चम्मच
नमक – स्वादानुसार
घी – 2 बड़े चम्मच (मालिश के लिए + परोसने के लिए अलग)
बेकिंग सोडा – चुटकीभर
पानी – जरूरत के अनुसार
दाल के लिए:
अरहर की दाल – 1 कप
हल्दी – 1/2 छोटा चम्मच
नमक – स्वादानुसार
हींग – चुटकीभर
जीरा – 1/2 चम्मच
लहसुन – 4-5 कलियां (कुटी हुई)
टमाटर – 1 बारीक कटा
हरी मिर्च – 2 बारीक कटी
देसी घी – 1 बड़ा चम्मच
बाफले बनाने की फहली विधि?
1. गेहूं के आटे में सूजी, अजवाइन, नमक और थोड़ा सा बेकिंग सोडा मिलाएं.
3. अब इस आटे से मुठ्ठी के आकार की लोइयां बना लें और अंगूठे से थोड़ा दबा दें.
5. उबलने के बाद इन बाफलों को छानकर एक तवे या ओवन में धीमी आंच पर सेंकें. चाहें तो कोयले की अंगीठी पर सेकें तो स्वाद दोगुना हो जाता है.
दाल बनाने की दूसरी विध?
1. अरहर की दाल को धोकर कुकर में नमक और हल्दी के साथ 3 सीटी तक पका लें.
3. यह तड़का दाल में डालें और हल्का सा उबाल आने दें.
एक प्लेट में गरम बाफले रखें, ऊपर से घी डालें. साथ में तड़के वाली दाल और गुड़-घी या चूरमा परोसें. अगर दही और हरी चटनी हो तो बात और भी मजेदार हो जाती है.
दाल बाफले: सिर्फ खाना नहीं, संस्कृति है
मध्यप्रदेश में यह व्यंजन सिर्फ स्वाद की वजह से नहीं, बल्कि परंपरा के सम्मान के रूप में बनाया जाता है. शादी-ब्याह हो, तीज-त्योहार हो या कोई विशेष भोज — बिना दाल बाफले के अधूरा माना जाता है.
दाल बाफले सिर्फ एक रेसिपी नहीं है, ये मध्यप्रदेश की आत्मा है. इसका स्वाद देसी घी से महकता है, और परंपरा से जुड़ता है. अगर आपने आज तक दाल बाफले नहीं खाया, तो समझिए आपने मध्यप्रदेश की आत्मीयता को नहीं चखा.