मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के 5 गांव ऐसे हैं, जहां के लोग मानसून से डरे हुए हैं। उनका एक-एक दिन भारी होता जा रहा है।
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जिले के एसाह, वीलपुर, कुथियाना, बरवाई, रतनबसाई गांव से सट कर चंबल नदी बहती है। हर बारिश में नदी उफान पर आती है। गांवों की 20 से 50 फीट तक की जमीन साथ बहा ले जाती है।लोगों के अपने घर और खेती की जमीन तक गंवानी पड़ती है। बारिश का मौसम आते ही गांव के लोग इस चिंता में आ जाते हैं कि पता नहीं आने वाले 4 महीने कौन सी तबाही लेकर आने वाले हैं। इस बार तो तोमर वंश की कुल देवी का मंदिर भी नदी की कटान के आखिरी छोर पर खड़ा है। नदी में उफान आया तो करोड़ों रुपए की लागत से बने प्राचीन मंदिर का बहना तय है।
नदी के उफान पर आने से पहले दैनिक भास्कर की टीम इन्हीं 5 गावों में पहुंची। लोगों से बात कर उनकी समस्या को जाना। साथ ही ये भी जाना कि आखिर प्रशासन उनकी मदद के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा रहा?
सबसे पहले हम दिमनी विधानसभा क्षेत्र में आने वाले एसाह, वीलपुर और कुथियाना गांव पहुंचे।
वीलपुर और कुथियाना गांव के हालात
वीलपुर और कुथियाना गांव एक दूसरे से सटकर ही बसे हैं। इन दोनों गांव के बीच पहुंचते ही हमने चौराहे पर खड़े लोगों से पूछा कि यहां चंबल नदी का किनारा कहां है। लोगों ने बताया आप नदी के किनारे पर ही खड़े हैं। अगले चौराहे से बाएं मुड़ेंगे तो 200 से 300 मीटर बाद ही किनारा दिख जाएगा। गांव किनारे तक ही फैला है या यूं कहें कि नदी कुछ सालों में गांव के किनारे से भी अंदर आ गई है।
नदी किनारे पहुंचते ही हमने देखा। किनारे पर ही करीब 30 घर बने हैं। कुछ कच्चे और कुछ पक्के। बच्चे नदी में दूर तक पत्थर फेंकने की प्रतियोगिता कर रहे हैं। घरों में मवेशी बंधे हुए हैं। किनारे पर देखने से पता चलता है कि यहां पहले कुछ घरों में सीमेंटेड फर्श बना था जो अब आधा अधूरा है। घर नदी में बह चुके हैं। नीचे आधा टूटा हुआ फर्श बचा है।

हमने दोनों गावों के लोगों से बात की। साथ ही ड्रोन के जरिए समस्या दिखाने की कोशिश भी की है।
खेतों में झोपड़ी बनाकर रह रहे लोग
वीलपुर गांव के चरण सिंह तोमर ने कहा, बारिश में यहां जान का खतरा बना रहता है। नदी हर साल 50 फीट जमीन को काटकर अपने साथ ले जाती है। लोग अपने खेतों में, यहां-वहां घर बना कर रहने को मजबूर हैं। एक अन्य बुजुर्ग चंद्र प्रकाश सक्सेना ने कहा, ये चंबल का किनारा है। नदी लगातार कटान कर रही है। शासन-प्रशासन कोई मदद कर दे तो लोग अपनी खेती की जमीन और घर गंवाने से बच जाएं।
कटान के चलते लोगों के पास पशु बांधने की जगह नहीं है। लोग खेतों में झोपड़ी बना कर रहने को मजबूर हैं। यहां देखिए लोगों के घर बह गए। गरीब लोग हैं। उन्होंने हमें थोड़ा और आगे जाकर देखने के लिए कहा, बोले- जाकर देखिए कितने गरीब लोग हैं। पिछली बारिश में घर बह गए, लेकिन प्रशासन ने आजतक उनको आवास नहीं दिया है।

यहां हर साल नदी के बहाव से किनारे की जमीन में कटान हो रही है।
हम आगे बढ़े। ऐसे लोगों से बातचीत की जिन्होंने पिछली बारिश में अपना घर और जमीन गंवा दी है…
गांव के ही पूरन लच्छाकार ने कहा, हमारा खेत नदी में चला गया है। अब मकान भी जा रहा है। आप देख लीजिए। इस बार नदी उफान पर आई तो घर को बहने से कोई नहीं रोक सकता। हम दो भाई थे। दोनों के पास 8 बीघा जमीन थी। पिछले बारिश के मौसम में हमारी 6 बीघा जमीन नदी में चली गई है। अब मात्र 2 बीघा जमीन बची है। अब घर जाने की नौबत आ गई है। घर भी चला जाएगा तो हम कहां जाएंगे, कहां रहेंगे। प्रशासन से भी कोई मदद नहीं मिल रही है। अब जीवन यहां तो व्यतीत नहीं होगा। दूसरी जगह, दूसरे जिलों में जाएंगे। पता नहीं आगे क्या होगा।
इन दो गांवों में सभी जाति के लोगों की जमीन गई है। सभी आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। अभी हमारा काम मजदूरी से चल रहा है। प्रशासन से चाहते हैं कि हमें मकान बनाने को जगह मिल जाए। जो जमीन गई है, उतनी ही जमीन मिल जाए।
हम थोड़ा और आगे बढ़े तो हमें अशोक मिले। अशोक लच्छाकार ने कहा, पिछली बारिश के बाद चंबल में जो उफान आया था। उसमें हमारी दो भैंसें चली गईं। आधा मकान बह गया। आधे मकान में रह रहे हैं। इस बार उसके जाने का भी खतरा है।

इन दोनों से बात कर ही रहे थे कि गांव के कई पीड़ित इकट्ठे हो गए। सबने चंबल के उफान में कुछ ना कुछ खोया है और आगे जो बचा है उसे भी खोने का खतरा बना हुआ है। हम थोड़ा और आगे बढ़े।
जवानी के दिनों में नदी हमारे घर से आधा किमी दूर थी
हमारी मुलाकात रामलछरू से हुई। रामलछरू ने कहा, यहां हम तीन भाई रहते थे। पूरा मकान चला गया। कोई सामान भी नहीं बचा। मकान के थोड़े से हिस्से का टूटा हुआ फर्श बस बचा है। अब हम खेत में झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं। प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है। यहां कोई देखने तक नहीं आया।
जब हम 20-22 साल के थे, हमें याद है नदी यहां से करीब आधा किमी की दूरी पर थी। अब हमारे घर तक बहा ले गई है। हमारे घर के आगे दो और घर बने थे। पिछली बारिश में वो घर बह गए थे। वो लोग भी झोपड़ी बना कर रह रहे हैं। फिर हमारा घर गया। हम चाहते हैं कि शासन-प्रशासन से मदद मिले। नदी किनारे रहने वाली विमला ने कहा, क्या खाएं, क्या पिएं, कहां रहें।

4 बच्चों को लेकर मंदिर के पास रहती हूं
इसके बाद अनीता तोमर ने आवाज लगाकर हमें बुलाया। बोलीं- हमारी समस्या भी सुन लीजिए। हमारे घर के हालात भी देख लीजिए। घर के हालात दिखाते हुए कहा कि मेरे 4 बच्चे हैं। पति बाहर काम करने गए हैं। हिस्से में 2 बीघा जमीन मिली थी, एक कच्चा घर मिला था। वो सब नदी में चला गया। अब एक दूसरे कच्चे मकान में रह रही हूं। ये भी नदी की चपेट में आने को तैयार है।
ना रहने को जगह है, ना खाने को। बारिश में बच्चों को पालना बेहद मुश्किल हो जाता है। अब हम कहां रहें। नदी जब उफान पर आती है तो हमें बच्चों को लेकर गांव से निकलना पड़ता है। मंदिर के पास गुजर बसर करनी पड़ती है। जहरीले जानवरों का खतरा रहता है। पिछली बारिश में पूरी खेती बर्बाद हो गई थी, अभी खरीद कर खा रहे हैं।
चंबल नदी के उफान से पीड़ित सूबेदार बघेल ने कहा, समस्या बहुत भयानक है, लेकिन कोई इस पर ध्यान नहीं दे रहा है। यहां एक बार कोई गरीबी की चपेट में आता है तो फिर बाहर नहीं निकल पाता। किसी की भैंस खूंटे से बंधी है, गलती से खूंटा टूट गया तो भैंस सीधे नदी में जाकर गिरती है। फिर उसे कर्जा लेकर उसकी भरपाई करनी होती है। फिर कभी उसकी जमीन नदी में चली जाती है तो कभी मकान। वो इंसान पूरी जिंदगी गरीबी में गुजारने के लिए मजबूर हो जाता है।
मवेशियों से लेकर बच्चों तक सबको संभालना बेहद मुश्किल होता है। नदी मवेशियों को बहा ले जाती है। बच्चों के गिरने का खतरा बना रहता है। पहले मेरा भी नदी किनारे घर था, बह गया। अब खेत में बनाया है।5-6 साल बाद वो वाला घर भी खतरे के निशान पर आ जाएगा। नदी उफान पर आती है तो आसपास की जमीनों की पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। अभी 5 गांव खतरे में हैं। भविष्य में 20 से ज्यादा गांव इसकी चपेट में आ सकते हैं। नदी की कटान की समस्या का समाधान हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।

हर साल मिट्टी के कटान से लोग आशंका जता रहे हैं कि कुछ ही साल में 20 से ज्यादा गांव बाढ़ की चपेट में आने लगेंगे।
मेहतर हूं, गांव में कोई रहने को जगह नहीं देता, कहां जाऊं?
पिछली बारिश में गांव के बुजुर्ग रामू मेहतर का आधा घर नदी के उफान में चला गया। अब रामू इस बारिश के आने से डरे हुए हैं। रामू ने कहा, प्रधानमंत्री आवास का जो घर मिला था वो भी आधा नदी में बह गया है। अब मेरे पास रहने को कोई जगह नहीं है।
मैं जाति का मेहतर हूं। गांव में कोई रहने को जगह नहीं दे रहा है। गांव के अंदर मैं झोपड़ी बना कर भी नहीं रह सकता। कोई काम भी नहीं दे रहा है। आधा घर बचा है। फिर बारिश आ रही है। जो आधा घर बचा है, वो भी चला जाएगा।

रामू की पत्नी शरबती बाई ने नदी के चलते टूटा हुआ अपना घर दिखाते हुए कहा, हमारे सुअर, जानवर सब ऐसे ही पड़े रहते हैं। अब बताइए गांव में कोई हमें चार रोटी दे देगा तो किसी का क्या हो जाएगा। हमारे 4-5 छोटे बच्चे हैं, उन्हें कैसे पालें। पिछली बार कपड़े-लत्ते समेत सारा सामान घर के साथ नदी में बह गया था। जब बारिश आती है तो 4 महीने यहां-वहां भटकने को मजबूर हो जाते हैं। बारिश खतम होते ही यहां वापस आ जाते हैं।
एसाह गांव के हाल
इसके बाद हम एसाह गांव पहुंचे। गांव में तोमर ठाकुरों की आबादी ज्यादा है। गांव के बहुत से लोग काफी साल पहले नदी से करीब 1 से 2 किमी की दूरी पर आ गए हैं। अब मुख्य गांव नदी से 1 से 2 किमी की दूरी पर ही बसा है, लेकिन नदी किनारे एक पुराना मंदिर बना हुआ है। ये मंदिर चिल्लासन माता का मंदिर है, जो तोमर वंश की कुल देवी का मंदिर बताया जाता है। गांव वालों को चिंता है कि चंबल नदी के इस बार के उफान में कहीं करोड़ों की लागत से बना मंदिर ना चला जाए।
तोमर ही सांसद मंत्री हैं, कुलदेवी की फिक्र नहीं
जब हम मंदिर के करीब पहुंचे तो देखा कि पिछली बारिश में नदी मंदिर के किनारे तक की मिट्टी को बहा ले गई है। देखकर लगा कि वाकई अगर नदी उफान पर आई तो मंदिर नहीं बचेगा। एसाह गांव के एक बुजुर्ग रमेश सिंह ने कहा, गांव के लगभग सभी लोग बहुत साल पहले नदी किनारे को छोड़ कर ऊपर की तरफ रहने चले गए हैं। उन्होंने वहीं घर बना लिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें हर बार बारिश में नदी के उफान के चलते बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था, लेकिन यहां हमारी कुलदेवी का पुराना सिद्ध मंदिर है।

इस बार मिट्टी का कटाव ज्यादा हुआ तो मंदिर पर भी खतरा मंडरा रहा है।
पिछली बारिश में नदी इस मंदिर से सटकर बहने लगी थी। मंदिर के बगल तक की सारी मिट्टी को अपने साथ बहा ले गई। इस बार हमें डर है कि अगर नदी उफान पर आई तो कुल देवी मंदिर को भी अपने साथ बहा ले जाएगी। इस मंदिर को बनाने में समाज के सभी लोगों ने मदद की है। इसे तैयार करने में करोड़ों रुपए खर्च हो गए हैं। हमारे क्षेत्र से मंत्री, विधायक, सांसद सभी तोमर हैं, लेकिन इस समस्या पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। 5 से ज्यादा गांव के लोग परेशान हैं।
इसे रोकने के लिए गांव वालों ने पौधारोपण करने की कोशिश भी की थी, लेकिन जब नदी आती है तो वो पक्के मकानों तक को अपने साथ ले जाती है। पेड़ कहां बचेंगे। यहां स्टॉपडेम या कोई पक्का स्लोप बनने से ही समस्या का समाधान हो सकता है। बस हम अपने मंदिर की सुरक्षा चाहते हैं। मंदिर के पुजारी ने कहा, हम मंदिर को बचाने के लिए हर साल चंदा कर के 50 हजार रुपए खर्च करते हैं। नदी ने मंदिर के पास की पूरी मिट्टी को काट दिया है। इस जगह का इतिहास तोमर वंश के साथ जुड़ा है। ये उनकी कुलदेवी का मंदिर है फिर भी इसपर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

मिट्टी के कटान से पता चलता है कि नदी बारिश के दिनों में कितना ऊपर तक बहने लगती है।
अब बरवाई और रतनबसाई गांव की स्थिति
इसके बाद हम अंबाह विधानसभा क्षेत्र में आने वाले बरवाई और रतनबसाई गांव पहुंचे। यहां भी गांववालों और किसानों के यही हालात हैं। ये दोनों गांव आसपास ही बसे हैं। चंबल नदी इन गावों से सट कर बह रही है, लेकिन चंबल नदी से करीब 500 से 800 मीटर दूरी तक ज्यादातर सरकारी जमीन है। इसके अलावा यहां कुछ किसानों की जमीन भी है। पहले जो घर नदी से कुछ ही दूरी पर बने थे, उन लोगों ने अपने घरों को नदी से करीब 1 किमी दूर बना लिया है। अब दोनों गांव नदी से 500 से 1000 मीटर की दूरी पर बसे हैं, लेकिन उनकी खेती की काफी जमीन नदी से सट कर है।
नदी उफान में आने के बाद हर साल 20 से 50 फीट मिट्टी को काटकर गांव की तरफ बढ़ रही है। गांव वालों का कहना है कि 10 साल में उन्हें फिर अपने गांव से एक दो किमी दूर अपना घर बनाना पड़ेगा। जब नदी उफान पर आती है तो हमारी फसल नष्ट हो जाती है। घर में जानवर, बच्चों और रोजमर्रा की जिंदगी बिताने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

लोगों ने हमें दिखाया कि किस तरह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर खतरा मंडरा रहा है।
अब जानिए सरकार और प्रशासन क्या कर रहा
विस्थापन से संबंधित काम देख रहे कृषि विज्ञान केंद्र मुरैना के असिस्टेंट डिप्टी डायरेक्टर डॉ. संदीप सिंह तोमर अधिकारी ने कहा, चंबल के बीहड़ में कटाव की बड़ी समस्या हर साल बनती है। श्योपुर से लेकर चंबल के किनारे सबलगढ़, पहाड़गढ़ समेत खासतौर पर मुरैना के 5 से 6 गावों में नदी के कटाव की समस्या बनती है। मुख्य समस्या ये है कि चंबल का जो बेल्ट है उसमें प्राकृतिक तौर पर मिट्टी बहुत ज्यादा रेतीली है। इससे बचने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा प्राकृतिक संरक्षण की आवश्यकता है। ज्यादा से ज्यादा पौधे और झाड़ियां लगाने पड़ेंगे, तभी संरक्षण संभव है।
हम पिछले 5 साल से देख रहे हैं कि तेज बारिश और कोटा डैम के गेट खुलने से नदी के किनारे वाले गावों में भयावह स्थिति बनती है। बाढ़ आ जाती है। इन गांवों में हम किसानों के पुनर्वास की व्यवस्था कर रहे हैं। वीरपुर, कुथियाना समेत तमाम गांवों के पीड़ित लोगों को आसपास के ऊंचे इलाकों में जमीन आवंटित करने की व्यवस्था कर रहे हैं। ऐसे इलाकों को चिह्नित किया जा रहा है, जहां चंबल का पानी नहीं पहुंचता है।

लोगों से निवेदन भी किया जा रहा है कि वो नदी के किनारों को छोड़ दें। जहां पानी नहीं आता है वहां अपने आवास की व्यवस्था करें।
जिन किसानों की जमीन गई है, वहां पर सरकार किसानों की असल जमीन का सर्वे करा कर सरकारी जमीन पर उन्हें पट्टे देने की व्यवस्था कर रही है। पुनर्वास की धीरे-धीरे प्रोसेस चल रही है। जो भी प्रधानमंत्री आवास के अंतर्गत आते हैं, उन्हें प्राथमिकता के तौर पर घर दिया जा रहा है। जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें घर दिया जा रहा है। प्रशासन इसको लेकर काम कर रहा है।