‘अपनी–अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी’, यह पंक्ति उस समय की देन है, जब निमाड़ के लोग देश के अलग-अलग कोनों में जाकर बसने लगे. चाहे गुजरात हो, दिल्ली, मुंबई या पंजाब, हर जगह बसने वाला निमाड़ी अपने गांव की बोली को कभी नहीं भूला. जब भी वे अपने किसी गांव वाले से मिलते, पहला वाक्य होता, ‘अरे भैया, अपनी-अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी लागे.’ यह कहावत यहीं से जुबानों पर चढ़ गई और आज भी जब दो निमाड़ी एक-दूसरे से मिलते हैं, तो इसी पंक्ति के साथ बात की शुरुआत होती है. यह हंसी-मजाक के साथ जुड़ा संवाद है, जिसमें गर्व और अपनापन दोनों छिपा है.
हर प्रदेश की अपनी भाषा होती है लेकिन निमाड़ी की बात ही निराली है. इसकी मिठास, इसकी सादगी और इसका अपनापन लोगों के मन को छू जाता है. यही कारण है कि निमाड़ छोड़ने के बाद भी निमाड़ी लोग अपनी बोली नहीं छोड़ते. गांव में दादी बोलती थीं, फिर मां ने सीखा और अब बच्चे भी सीख रहे हैं. कोई मुंबई में हो या भोपाल में, एक निमाड़ी जब अपने घर फोन करता है, तो सबसे पहले कहता है, ‘मा, भला तो’, यही अपनापन है, जो उसे अपनी भाषा से जोड़ता है.
‘अपनी–अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी’, केवल भाषा प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, यह उस सांस्कृतिक चेतना की परिचायक है, जो आज भी निमाड़ के युवाओं में जिंदा है. यह कहावत लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ने का काम करती है, चाहे कोई युवा हो या बुजुर्ग, जब यह कहावत सुनते हैं, तो गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है.
आज की पीढ़ी क्या सोचती है?
आज के युवाओं ने इस कहावत को सोशल मीडिया तक पहुंचा दिया है. इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप स्टेटस, रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स में ‘अपनी–अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी’ से जुड़े हैशटैग खूब ट्रेंड कर रहे हैं. कई युवाओं ने अपने यूट्यूब चैनल का नाम ही इस कहावत पर रख दिया है.
निमाड़ी बोली अब सिर्फ निमाड़ तक सीमित नहीं रही बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और यहां तक कि विदेशों में बसे निमाड़ी परिवारों में यह बोली आज भी बोली जाती है. बच्चे भले अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हों, पर घर में बोलते हैं, ‘मम्मी, भात दे.’
‘अपनी–अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी’ कोई साधारण कहावत नहीं, यह निमाड़ के दिलों की आवाज है. यह कहती है, भाषा कोई बोझ नहीं, यह गर्व है. यह कहावत बताती है कि जहां भी जाओ, अपनी मिट्टी से जुड़ाव न छोड़ो. इसलिए जब भी यह कहावत किसी के मुंह से सुनाई दे, तो समझ जाइए, सामने खड़ा शख्स दिल से निमाड़ी है.