गेहूं-चना छोड़ो, अब लगाओ बर्मा की सागवान, खेती से तैयार होगी पुश्तैनी संपत्ति!

गेहूं-चना छोड़ो, अब लगाओ बर्मा की सागवान, खेती से तैयार होगी पुश्तैनी संपत्ति!


अगर आप खेती में परंपरागत फसलों से हटकर कुछ अलग करने की सोच रहे हैं और लंबी अवधि में अच्छा मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो बर्मा की सागवान  की खेती आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है. खंडवा सहित पूरे निमाड़ अंचल में किसान अब पारंपरिक गेहूं, सोयाबीन, चना जैसी फसलों के अलावा एग्रो-फॉरेस्ट्री और हॉर्टिकल्चर की ओर रुख कर रहे हैं, जिसमें सागवान की खेती सबसे चर्चित और लाभकारी मानी जा रही है.

क्यों करें सागवान की खेती?
एग्रीकल्चर फील्ड से जुड़े बीडी संनखेरे ने Local 18 से बात करते हुए कहा कि बर्मा की सागवान एक बहुमूल्य और मांग में रहने वाली लकड़ी है, जिसका उपयोग प्लाईवुड, फर्नीचर, रेल डिब्बे, जहाज निर्माण जैसे उद्योगों में होता है. इसके अलावा इसकी छाल और पत्तियों से शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाएं भी बनाई जाती हैं.
खंडवा जिले के कई किसान आज इस दिशा में सफल प्रयोग कर रहे हैं और लाखों की आमदनी अर्जित कर चुके हैं. अगर एक किसान 1 एकड़ जमीन में 10×10 फीट की दूरी पर सागवान के पौधे लगाए, तो वहां लगभग 120 पौधे लगाए जा सकते हैं। ये पौधे 15 साल में परिपक्व होकर लाखों की लकड़ी का उत्पादन कर सकते हैं.
देसी नहीं, बर्मा (म्यांमार) टीक का करें चयन
बीडी संनखेरे ने कहा कई किसानों ने देसी सागवान लगाया, लेकिन वह 25-30 साल में भी परिपक्व नहीं हो पाया और पतली लकड़ी की वजह से बाजार में अच्छी कीमत नहीं मिली. इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि आप सागवान लगाएं तो बर्मा का टीक (बर्मीज टीक) या टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे ही लगाएं. ये पौधे 12-15 साल में परिपक्व हो जाते हैं और बहुत अच्छी लकड़ी प्रदान करते हैं.
लागत और संभावित लाभ
पौधरोपण लागत (120 पौधे): ₹30,000 से ₹40,000 (टिश्यू कल्चर वाले पौधों के साथ)
सिंचाई व देखभाल (15 साल): ₹60,000 से ₹70,000
कुल लागत: लगभग ₹1 लाख से ₹1.2 लाख प्रति एकड़
15 वर्षों बाद आमदनी: एक परिपक्व पेड़ से औसतन ₹10,000 से ₹15,000 की लकड़ी प्राप्त हो सकती है⇒ 120 पेड़ = ₹12 लाख से ₹18 लाख

इस तरह केवल एक एकड़ जमीन से किसान 15 वर्षों में ₹15 लाख तक की आय कर सकता है, जो परंपरागत खेती से कई गुना ज्यादा है.
अतिरिक्त विकल्प: महोगनी और मलाबार नीम
सिर्फ सागवान ही नहीं, बल्कि किसान महोगनी और मलाबार नीम जैसे पौधों की खेती भी कर सकते हैं.
महोगनी 10–12 साल में तैयार हो जाती है और लकड़ी की कीमत बहुत अधिक होती है. मलाबार नीम केवल 3–4 वर्षों में प्लाईवुड इंडस्ट्री के लिए परिपक्व हो जाती है. इनकी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी मांग है, जिससे किसान को बाजार की चिंता नहीं रहती.
कहां लगाएं ये पौधे?
किसान चाहें तो मुख्य फसलों के साथ खेत की मेड़ (बॉर्डर) पर भी इन पौधों को लगा सकते हैं. इससे उनकी वर्तमान फसल पर असर नहीं होगा और भविष्य में लकड़ी का बड़ा मुनाफा मिलेगा.
किसान के अनुभव
हरदा जिले के गौरीशंकर मुकाती जैसे किसान सागवान की खेती से करोड़ों की आमदनी कर चुके हैं. निमाड़ क्षेत्र में भी खमेर, छपीपुरा जैसे गांवों के कई किसानों ने टिश्यू कल्चर सागवान लगाकर सफलता पाई है.
डर नहीं, दूरदर्शिता ज़रूरी
कई किसान आज भी इस खेती को लेकर संकोच में रहते हैं, क्योंकि इसमें मुनाफा लंबी अवधि में मिलता है. लेकिन ध्यान रखें – सागवान की लकड़ी का इंटरनेशनल मार्केट है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. आज अगर आप निवेश करते हैं, तो 10–15 साल बाद यह आपकी पुश्तैनी संपत्ति बन सकती है.
खेती को फायदे का सौदा बनाना है तो पारंपरिक खेती से आगे बढ़ें. सागवान, महोगनी और मलाबार नीम जैसे पेड़ों की खेती अपनाएं. टिश्यू कल्चर पौधों का उपयोग करें, प्रमाणित नर्सरी से पौधे लें और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें. समय और धैर्य से की गई यह खेती आने वाले वर्षों में किसानों की आर्थिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है.



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