भारत की हॉकी टीम ने इस राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा किया और इस प्रक्रिया में लगातार चौथा ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता. इससे पहले वह 1928 में एम्स्टर्डम, 1932 में लॉस एंजिल्स और 1936 में बर्लिन में शीर्ष सम्मान जीत चुकी थी. यह स्वर्णिम यात्रा 1948 में नहीं रुकी, बल्कि 1964 तक जारी रही, जिसमें 1960 में एक संक्षिप्त रजत पदक का अंतराल भी शामिल था. जब भारत को अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के हाथों शीर्ष स्थान छोड़ना पड़ा.
जब भारत की हॉकी टीम ने 1948 में लंदन ओलंपिक हॉकी स्टेडियम में ग्रेट ब्रिटेन को फ़ाइनल में 4-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता, तो एक ओलंपिक जीत से कहीं ज़्यादा कुछ लिखा गया था. इंग्लैंड को उसी के देश में हराने को तब लोगों ने माना कि लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजों द्वारा किए गए अपमान का प्रतिशोध था. इस जीत ने यह साबित कर दिया कि हॉकी जनता के लिए नई उर्जा ओर देश के एकजुटता का साधन बन सकती थी. यह एक साथ उत्साह, गर्व और राष्ट्रीय बंधन का स्रोत था जिसमें देश के कई लोगों के लिए, यह खेल भावनात्मक लगाव और आध्यात्मिक जुनून के स्रोत के रूप में धर्म का विकल्प बन गया. और कई लोगों के लिए, चूँकि यह आज़ादी के बाद के सबसे शुरुआती यादगार अनुभवों में से एक था, इसने स्मृतियों में जगह बनाई, उत्साह को आकार दिया और कल्पनाओं को पंख दिए.
हालाँकि हॉकी के देश का ‘राष्ट्रीय’ खेल होने का दावा सदी की शुरुआत में ही शुरू हो गया था और एम्स्टर्डम, लॉस एंजिल्स और बर्लिन में जीत के बाद इसने गति पकड़ी, लेकिन लंदन तक इसकी सर्वोच्चता सुनिश्चित नहीं हुई थी. इसके अलावा, जिस समय भारत की हॉकी टीम लंदन में सम्मान के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही थी, उसी समय देश की सीमाएँ पड़ोसी पाकिस्तान के साथ पहले युद्ध से सुलग रही थीं. विभाजन का ‘अधूरा एजेंडा’, जिसके कारण 1965 और 1971 में और संघर्ष हुए, और तब से लगातार तनाव बना हुआ है.
1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक की तुलना में, लंदन 1948 ने भारतीय हॉकी के लिए एक मौलिक रूप से अलग चुनौती पेश की. और भी इसलिए, क्योंकि खिलाड़ी पहली बार ब्रिटिश भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, बल्कि अपनी मातृभूमि के लिए खेल रहे थे. यह पहली बार था जब भारतीय नए तिरंगे के लिए और अंग्रेजों के खिलाफ खेल रहे थे, जिनके शाही झंडे तले उन्होंने पिछले खेलों में भाग लिया था. इस बदलाव के महत्व को महान खिलाड़ी ध्यानचंद ने सबसे अच्छे ढंग से व्यक्त किया. अपनी आत्मकथा में ध्यानचंद जी ने लिखा कि मुझे 1948 की भारतीय ओलंपिक टीम से ईर्ष्या होती है, जिसे यह सम्मान (ओलंपिक मंच पर अंग्रेजों से भिड़ने और उन्हें हराने का) मिला. काश, मैं कम से कम उस ऐतिहासिक अवसर का गवाह होता. लेकिन, आप में से ज़्यादातर लोगों की तरह, मेरी भी किस्मत में हज़ारों मील दूर घर पर रेडियो सुनने और प्रेस रिपोर्ट पढ़ने का मौका था.इस जीत ने भारत को एकजुट किया साथ ही तिरंगा का मान कैसे आगे बढ़ाए उसका रास्ता भी दिखाया.