ऑर्गन डोनेशन और ट्रांसप्लांट की दिशा मध्यप्रदेश की राजधानी में लगातार विस्तार हो रहा है। यही कारण है कि भोपाल में हुए 24वें लिवर ट्रांसप्लांट से 58 वर्षीय कृष्णा व्यास को नया जीवन मिला है। उनकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि बिना लिवर ट्रांसप्लांट के लंबे स
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जिसके जरिए 7 अगस्त को भोपाल के सिद्धांता रेड क्रॉस अस्पताल में उनका सफल लिवर ट्रांसप्लांट किया गया। यह सर्जरी चीफ सर्जन के रूप में गुरुग्राम के मेदांता लिवर ट्रांसप्लांट इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डॉ. अरविंदर सोइन ने की थी। 12 दिन बाद अब मरीज स्वस्थ है।
डॉ. सोइन ने मंगलवार को सिद्धांता अस्पताल में हुई प्रेस वार्ता में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े। उन्होंने बताया कि कृष्णा व्यास का लिवर अंतिम अवस्था (end-stage liver disease) तक पहुंच गया था, जिससे मस्तिष्क पर भी असर पड़ा और वह प्रीकॉमा की स्थिति में आ गए थे। इस वजह से वे बार-बार बेहोश होने लगे थे। लिवर ट्रांसप्लांट के बिना उनकी जान बचाना मुश्किल था।
तीन लोगों को मिला नया जीवन एक व्यक्ति की इंसानियत ने तीन लोगों को नई जिंदगी दी। जबलपुर में सिर पर गंभीर चोट लगने के बाद मृत्युंजय हुए 31 वर्षीय दाता के परिजनों की सहानुभूतिपूर्ण सहमति और मेडिकल टीमों की समन्वित कार्रवाई से 58 वर्षीय कृष्णा व्यास को सिद्धांता रेड क्रॉस हॉस्पिटल, भोपाल में जीवनदान मिला। वहीं दान दाता का हृदय अहमदाबाद रवाना किया गया और एक गुर्दा स्थानीय रूप से जबलपुर में प्रत्यारोपित कर तीन परिवारों की खुशियों की वजह बना।
ट्रांसप्लांट टीम वर्क व समन्वय का उदाहरण सिद्धांता रेड क्रॉस हॉस्पिटल (SRHC) के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. सुबोध वर्शने ने बताया कि दान दाता, अस्पताल, दोनों शहरों की पुलिस, राज्य प्रशासन और ट्रांसप्लांट टीमों ने मिलकर हर संभव सहूलियत मुहैया कराई। ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया और अंगों की सुरक्षित हवाई परिवहन व्यवस्था करवाई गई। यह दिखाता है कि मध्यप्रदेश में डेसीज्ड (deceased) ऑर्गन डोनेशन अब परिपक्वता के स्तर पर पहुंच चुका है। यही कारण था कि सफल ट्रांसप्लांट संभव हो सका। प्रदेश में लगातार ट्रांसप्लांट की सुविधाओं में विस्तार हो रहा है।
सर्जिकल चुनौतियां और सम्मानजनक विदाई वरिष्ठ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. कमल यादव ने बताया कि दान दाता पर अंग निकालने की सर्जरी जटिल थी। तीन अलग टीमों ने लिवर, हार्ट और किडनी को निकालने के लिए ऑपरेशन किया। इसमें कोआर्डिनेशन बेहद जरूरी होता है, जिससे सभी अंगों का उपयुक्त संरक्षण और निष्कर्षण सुनिश्चित हो सके। दान दाता के पेट और छाती को बाद में सामान्य शल्यक्रिया की तरह बंद कर दिया गया और शरीर को सम्मानपूर्वक, बिना किसी विकृति के परिजनों को लौटा दिया गया।
ग्रीन कॉरिडोर की बड़ी कवायद अंगों को सुरक्षित और समय पर पहुंचाने के लिए दो बड़े ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए। जबलपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल से डुमना एयरपोर्ट तक ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया। वहीं भोपाल एयरपोर्ट से सिद्धांता रेड क्रॉस अस्पताल तक पुलिस-प्रशासन ने पूरा रास्ता खाली कराया।
सुबह 11 बजे प्रक्रिया शुरू होनी थी, लेकिन अहमदाबाद से फ्लाइट लेट होने के कारण शाम चार बजे हार्ट गुजरात रवाना हुआ और 4 बजकर 20 मिनट पर लिवर भोपाल पहुंचा। करीब साढ़े छह बजे सिद्धांता अस्पताल में प्रत्यारोपण के लिए अंग सुरक्षित पहुंच गया।
अंग दाता सत्येंद्र की कहानी सत्येंद्र यादव जबलपुर में किराए से कमरा लेकर पत्नी के साथ रहते थे। अप्रैल 2025 में ही उनका विवाह हुआ था। वे गैस कंपनी में डिलीवरी का काम करते थे। 4 अगस्त की रात ड्यूटी से लौटते समय गढ़ा थाना क्षेत्र में सड़क हादसे का शिकार हो गए।
उनके बड़े भाई विजय यादव ने बताया कि परिवार ने मिलकर यह फैसला लिया कि अगर सत्येंद्र के अंग किसी की जान बचा सकते हैं तो इससे बड़ा पुण्य कुछ नहीं होगा। इसलिए डॉक्टरों की सलाह पर अंगदान का निर्णय लिया गया।