शिवांक द्विवेदी, सतना: आज की पीढ़ी में जहां अधिकांश युवा मान–सम्मान और सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं वहीं सतना जेल अधीक्षक लीना कोष्टा ने यह साबित कर दिया कि अगर हिम्मत और लगन हो तो हर चुनौती और सपना आसान हो जाती है. एक महिला होते हुए भी उन्होंने जेल प्रशासन की बागडोर संभालकर न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि यह भी दिखाया कि संवेदनशीलता और सख्ती, दोनों का संतुलन कैसे किया जाता है.
डॉक्टर बनने का सपना और परिस्थितियों से जंग
जबलपुर की रहने वाली लीना कोष्टा ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से बीएससी बायो की पढ़ाई की थी. उन्होंने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि शुरू में उनका सपना डॉक्टर बनने का था लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें यह सपना त्यागना पड़ा. इसके बाद उन्होंने एमए किया और फिर जेल विभाग में वेलफेयर ऑफिसर पद के लिए आवेदन किया. परिवार के कई सदस्य उनकी इस राह के खिलाफ थे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी अपराधियों के बीच काम करे. लेकिन मां ने उनका हौसला बढ़ाया और इंटरव्यू दिलाने तक साथ रहीं.
1998 से शुरू हुआ संघर्ष भरा सफर
उन्हें 1998 में नर्सिंगपुर जिले में वेलफेयर ऑफिसर के रूप में पहली पोस्टिंग मिली. इसके बाद उन्होंने 11 साल तक सागर में अपनी सेवाएं दीं और सतना में भी एक वर्ष तक वेलफेयर ऑफिसर के तौर पर पदस्थ रहीं. साल 2011 में उन्हें प्रमोशन मिला और वे जेल मुख्यालय भोपाल में चीफ प्रोविजन ऑफिसर के पद पर पहुंचीं. लगातार मेहनत और समर्पण के बाद वर्ष 2015 में उन्हें जेल अधीक्षक का पद मिला.
विदिशा से सतना तक का सफर
पहली बार विदिशा जेल में अधीक्षक पद संभालते हुए उन्होंने तीन साल तक सराहनीय कार्य किया. इसके बाद 2018 से 2022 तक वे कटनी जेल की अधीक्षक रहीं और वर्तमान में सतना जेल की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. उनका कहना है कि बंदियों ने हमेशा उन्हें अधिकारी की नजर से नहीं देखा, बल्कि मां की तरह सम्मान दिया. यही संबंध उन्हें अपने कार्यकाल में सबसे अधिक प्रेरित करता है.
धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से कैदियों का बदलता मनोबल
सतना जेल में लीना कोष्टा ने कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत की जैसे भागवत कथा, राम कथा, शिवलिंग निर्माण, गायत्री परिवार, प्रजापिता ब्रह्मकुमारी और आर्ट ऑफ लिविंग जैसे कार्यक्रमों से कैदियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया. उनका मानना है कि यह आयोजन अपराधियों के मन में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास जगाते हैं.
उद्योगों से आत्मनिर्भर होते कैदी
57 एकड़ में फैली सतना जेल में वर्तमान में तीन उद्योग संचालित हैं जिसमे कारपेंट्री, बुनाई और पावर लूम शामिल हैं. कैदी यहां फर्नीचर, चादर, खिलौने, मूर्तियां और पूजा सामग्री तक तैयार करते हैं. इन वस्तुओं की बिक्री के लिए जेल कैंटीन के पास एक आउटलेट भी खोला गया ह जिससे आम नागरिक भी इन्हें खरीद सकें. इसके अलावा उनके द्वारा जेल परिसर की 15–20 एकड़ जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराकर कृषि योग्य बनाया गया और बंदियों की मेहनत से बंजर भूमि को उपजाऊ कर एक वर्ष में 12–13 लाख रुपये का राजस्व अर्जित किया गया.
परिवार और जिम्मेदारियों का संतुलन
अपने पारिवारिक जीवन पर बात करते हुए वो स्वीकार करती हैं कि नौकरी की जिम्मेदारियों के कारण वे कई बार त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों में शामिल नहीं हो पातीं. बावजूद इसके उनका परिवार हमेशा सहयोगी बना रहा. उनकी एक बेटी है और वे चाहे कितनी भी देर से घर लौटें, खुद खाना बनाकर एक मां और गृहिणी की भूमिका भी निभाती हैं.
महिला शक्ति और प्रेरणादायक सफर
लीना कोष्टा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि महिला चाहे किसी भी क्षेत्र में कदम रखे मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर हर चुनौती का सामना कर सकती है. जेल अधीक्षक के रूप में उनका सफर केवल प्रशासनिक सफलता नहीं बल्कि मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण है. सतना जेल में उनका कार्यकाल यह दिखाता है कि अपराधियों को दंड देना ही उद्देश्य नहीं बल्कि उन्हें सही राह पर लाना भी उतना ही जरूरी है.