पदम योग में मनाई जा रही शनि व कुशोत्पाटिनी अमावस्या: नर्मदा डुबकी लगाने पहुंचे हजारों लोग, श्रद्धालु पितृदोष शांति के कर रहे उपाय – Barwani News

पदम योग में मनाई जा रही शनि व कुशोत्पाटिनी अमावस्या:  नर्मदा डुबकी लगाने पहुंचे हजारों लोग, श्रद्धालु पितृदोष शांति के कर रहे उपाय – Barwani News


आज भाद्रपद की शनि अमावस्या है। मंदिरों में विशेष आयोजन किए गए हैं। साल की ‎इस अंतिम शनि अमावस्या पर पदम योग भी है, जो इसे विशेष और दुर्लभ बनाता है। बड़वानी जिले के राजघाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई। सुबह से ही नर्मदा तट पर स्नान के लिए लोग प

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खरगोन, धार, अलीराजपुर और बड़वानी जिले से श्रद्धालु यहां पहुंचे। घाटों पर भजन-कीर्तन और बम भोले के जयकारे गूंजते रहे। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था संभाली। श्रद्धालुओं को गहरे पानी में जाने से रोका गया। लोगों ने स्थानीय सिद्धेश्वर मंदिर समेत अन्य मंदिरों में दर्शन किए।

पंडित सचिन शुक्ला ने शनि अमावस्या के महत्व के बारे में बताया। उनके अनुसार, इस रात पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि पीपल में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस पर शनिदेव का प्रभाव भी रहता है।

दीपक जलाते समय ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। काले तिल, सरसों का तेल और काले कपड़े का दान करना फलदायी माना जाता है। इस दिन किया गया दान पितृ दोष को भी शांत करता है।

इस बार की शनि अमावस्या कई शुभ योगों के कारण विशेष है। श्रद्धालु पितृ दोष शांति के उपाय कर सकते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। शनि की साढ़े साती और ढैय्या से प्रभावित लोग सरसों के तेल से अभिषेक कर रहे हैं।

पंडित शुक्ला ने यह भी बताया कि शनिदेव हनुमान जी के भक्तों को कष्ट नहीं देते। इसलिए शनि अमावस्या की रात को हनुमान चालीसा का पाठ लाभदायक माना जाता है।

क्यों खास है कुशोत्पाटिनी‎ अमावस्या पंडितों का कहना है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष‎ की शनि अमावस्या को कुशोत्पाटिनी‎ अमावस्या भी कहा जाता है, जिससे इसका‎ धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन को‎ पितृपक्ष की तैयारी का आरंभिक दिन भी माना‎ जाता है। ‎कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर विशेष मंत्रोच्चार‎के साथ कुशा घास को जंगल या बगीचों से ‎तोड़ा जाता है। यह कुशा आगामी पितृपक्ष के ‎16 दिनों तक तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध‎कर्मों में उपयोग की जाती है। कुशा को‎ “कांस” भी कहा जाता है। पंडितों के अनुसार,‎इसके बिना पितृकार्य अपूर्ण माने जाते हैं।‎



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