पैरों से नहीं हौसलों से चला राधेश्याम, दिव्यांग होते हुए भी जीते गोल्ड और सिल्वर, शहर का बढ़ाया मान

पैरों से नहीं हौसलों से चला राधेश्याम, दिव्यांग होते हुए भी जीते गोल्ड और सिल्वर, शहर का बढ़ाया मान


मध्य प्रदेश का खंडवा जिला और यहां का एक छोटा सा गांव पूरणपुरा. यही गांव आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है. वजह है – इस गांव का बेटा राधेश्याम पवार, जिसने दिव्यांग होते हुए भी अपने हौसलों के दम पर गोल्ड और सिल्वर मेडल जीतकर पूरे जिले का मान बढ़ा दिया.

भोपाल में आयोजित राज्य स्तरीय पैरास्पोर्ट्स प्रतियोगिता में राधेश्याम ने गोला फेंक और अन्य खेलों में शानदार प्रदर्शन कर मेडल अपने नाम किए. खंडवा जिले से सिर्फ दो खिलाड़ी इस प्रतियोगिता में पहुंचे थे – राधेश्याम पवार और विशाखा पारासर. दोनों ने मिलकर तीन गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीतकर खंडवा का झंडा ऊंचा कर दिया.

राधेश्याम बचपन से ही पोलियो ग्रस्त हैं और दोनों पैरों से चल नहीं सकते, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी दिव्यांगता को कमजोरी नहीं माना. अक्सर गांव-समाज के लोग कहते थे – “ये कुछ नहीं कर सकता.” लेकिन राधेश्याम ने यह साबित कर दिया कि इंसान का शरीर नहीं, बल्कि उसका जज़्बा बड़ा होता है.

राधेश्याम खुद कहते हैं –“लोग दिव्यांगता को अभिशाप मानते हैं, लेकिन मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि यह कोई अभिशाप नहीं, बल्कि वरदान है. अगर हमें सही अवसर और सुविधाएं मिलें तो हम किसी से पीछे नहीं.”
इस प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद अब राधेश्याम का अगला लक्ष्य इंटरनेशनल गेम्स है. अक्टूबर में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में वे भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे. इस आयोजन में चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया और भूटान जैसे देश भी शामिल होंगे. राधेश्याम का सपना है कि वहां जाकर भारत का तिरंगा ऊंचा करें और देश का नाम गौरवान्वित करें.

लेकिन इस सफर में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. राधेश्याम बताते हैं कि उनके जिले में दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए कोई अलग मैदान या सुविधा नहीं है. न ही प्रैक्टिस के लिए कोई खास साधन उपलब्ध हैं. वे कहते हैं –“अगर हमें उचित सुविधा और सरकारी सहयोग मिले, तो हम केवल तीन गोल्ड नहीं बल्कि सौ गोल्ड मेडल खंडवा को दिला सकते हैं. अभी हमने जो किया है, वह अपनी मेहनत और सीमित साधनों के बल पर किया है.”
यहां तक पहुंचने तक का सफर आसान नहीं था. बचपन से लेकर बड़े होने तक राधेश्याम को समाज की नज़रों, तानों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा. कई बार लोगों ने उनका हौसला तोड़ने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने अपने दिल में ठान लिया था कि दुनिया को दिखाना है कि दिव्यांग होना कोई कमजोरी नहीं.

आज जब वे मेडल जीतकर गांव लौटते हैं तो वही लोग, जो कभी कहते थे कि ये कुछ नहीं कर सकता, अब उन्हें सलाम करते हैं. बच्चे उनसे प्रेरणा लेते हैं और माता-पिता अपने बच्चों को राधेश्याम की मिसाल देकर मेहनत करने की सीख देते हैं.
राधेश्याम मानते हैं कि उनकी यह जीत केवल उनकी नहीं है, बल्कि उन सभी दिव्यांग युवाओं की जीत है जो हिम्मत जुटाकर कुछ करना चाहते हैं. वह संदेश देते हैं –“अगर आप ठान लें तो कोई भी कमी आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. बस मेहनत और हौसला बनाए रखना होगा.”

आज राधेश्याम पवार खंडवा ही नहीं, पूरे मध्य प्रदेश की शान बन चुके हैं. उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो जिंदगी में हार मान चुका है. यह कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन हों, मजबूत इरादे इंसान को हर मंज़िल तक पहुंचा सकते हैं.



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