हादसे में टूट गई रीढ़ की हड्डी, 8 साल तक बिस्तर पर रही…अब धड़ाधड़ जीत रही गोल्ड, जानें कहानी

हादसे में टूट गई रीढ़ की हड्डी, 8 साल तक बिस्तर पर रही…अब धड़ाधड़ जीत रही गोल्ड, जानें कहानी


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Khandwa News: उस हादसे के बाद खंडवा की विशाखा पराशर को लेकर कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि ये खेल में गोल्ड जीत सकेगी. लेकिन आज ऐसा हो रहा है. जानें कहानी…

Khandwa News: खंडवा की बेटी विशाखा पाराशर आज हर किसी के लिए मिसाल हैं. कभी एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी थम गई थी. रीढ़ की हड्डी टूट गई और कमर से नीचे का आधा हिस्सा काम करना बंद कर दिया. आठ साल तक बिस्तर पर रहने को मजबूर रहीं. परिवार और समाज ने उन्हें “बेचारी” कहा, लेकिन विशाखा ने हार मानने के बजाय अपनी कमजोरी को ताकत बनाया और आज पूरे देश में खंडवा का नाम रोशन कर रही हैं. भोपाल में आयोजित पैरा एथलीट चैंपियनशिप में विशाखा ने शॉट पुट और जैवलिन थ्रो दोनों में गोल्ड मेडल जीतकर साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों तो कोई भी कठिनाई रास्ता नहीं रोक सकती.

हादसे से नई शुरुआत तक
सन 2015 में हुए एक्सीडेंट ने विशाखा की पूरी जिंदगी बदल दी. कमर के नीचे का हिस्सा काम करना बंद हो गया और डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि अब पहले जैसा संभव नहीं है. लगातार आठ साल उन्होंने बिस्तर पर गुजारे. लेकिन, 2023 में मोबाइल और इंटरनेट के जरिए उन्होंने जाना कि पैरा गेम्स भी खेले जाते हैं. यहीं से उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ी. उन्होंने सबसे पहले पुणे में नेशनल गेम्स खेले, फिर गोवा और दिल्ली में आयोजित खेलो इंडिया में हिस्सा लिया. हालांकि वहां चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन हार नहीं मानी. इसके बाद फेंसिंग (तलवारबाजी) में भी हाथ आजमाया और चेन्नई में दो गोल्ड और दो सिल्वर मेडल हासिल किए.

भोपाल में दोहरा गोल्ड
हाल ही में भोपाल में आयोजित प्रतियोगिता में विशाखा ने शॉट पुट और जैवलिन थ्रो दोनों में गोल्ड जीतकर सबका ध्यान खींचा. आज वह गांधीनगर, गुजरात स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया सेंटर में ट्रेनिंग ले रही हैं और एशियन गेम्स में देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना देख रही हैं.

दिव्यांगों के लिए संदेश
विशाखा का मानना है कि भारत को ‘एक्सेसबल इंडिया’ बनाना जरूरी है. उनका कहना है कि “हर जगह दिव्यांगों के लिए सुविधाएं होनी चाहिए, चाहे वह होटल हों, स्कूल हों या स्पोर्ट्स सेंटर. जब तक बच्चों को सुविधा और जानकारी नहीं मिलेगी, वे खेलों में आगे नहीं बढ़ पाएंगे.” वे चाहती हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में खेल शिक्षा को और गंभीरता से लिया जाए, ताकि छोटे शहरों से भी बच्चे ओलंपिक तक का सफर तय कर सकें.

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