Pitru Paksha: उज्जैन के पंडितजी के पास पीढ़ियों का ‘गूगल’, झट से बताएंगे 200 साल पुराने पूर्वजों के नाम

Pitru Paksha: उज्जैन के पंडितजी के पास पीढ़ियों का ‘गूगल’, झट से बताएंगे 200 साल पुराने पूर्वजों के नाम


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Pitru Paksha 2025: मान्यता है कि महाकाल की नगरी मे मोक्ष दायनी मां क्षिप्रा के किनारे सिद्धवट घाट पर पूर्वजों का तर्पण करने से गयाजी के बराबर पुण्य मिलता है. यहां पंडे-पुजारी के पास गजब की पोथी है. जानें महत्व….और पढ़ें

Ujjain News: धार्मिक नगरी उज्जैन में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है. उन्हीं देव स्थानों में से एक उज्जैन का प्रसिद्ध मंदिर सिद्धवट विख्यात है. आज के डिजिटल युग में लेखा-जोखा रखने के लिए बड़े-बड़े कंप्यूटर मौजूद हैं. उनमें दुनिया भर का डाटा सेव रखा जा सकता है, पर आज से 100-200 साल पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी, तब बही-खातों में लोग लेखा-जोखा करते थे. समय के साथ बहुत से बही-खाते नष्ट हो गए. लेकिन, उज्जैन में आज भी 200 साल पहले के बही-खाते सुरक्षित हैं, जिसमें पूर्वजों के बारे में जानकारी मौजूद है.

पंडित-पुरोहितों के पास बड़े काम की पोथी
अगर आप अपने पूर्वजों के बारे में जानना चाहते हैं तो महाकाल की नगरी उज्जैन में इसका जवाब मिलेगा. उज्जैन के सिद्धवट घाट पर पंडे-पुजारियों के पास आज भी सालों पुराने बही-खाते हैं. बड़ी संख्या में लोग यहा अपने पितरों का तर्पण करने पहुंचते हैं. मान्यता है कि क्षिप्रा नदी किनारे सिद्धवट घाट पर पूर्वजों का तर्पण करने से गयाजी के बराबर पुण्य मिलता है. लोग सिर्फ अपना और शहर का नाम बताकर अपनी पीढ़ियों का पता पंडितों से पाते हैं. फिर अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं. इस आधुनिक युग में भी बिना कंप्यूटर के 200 वर्ष पुरानी पोथी पर काम कर रहे पंडित चुटकियों में जजमान के परिवार का लेखा जोखा सामने रख देते हैं. यही नहीं, कुछ वर्षों पहले इनकी पोथियों से कोर्ट में लंबित पारिवारिक और संपत्ति विवाद का निपटारा भी हुआ है.

तीर्थपुरोहित के पास है जवाब

तीर्थपुरोहित पं. श्याम पंचोली घोड़ी वाला पंडा ने बताया, कोई भी जानकारी आप गुगल से प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन अपनी वंश बेल की जानकारी आपको गूगल नहीं बल्कि तीर्थ पुरोहित से ही लेनी पड़ेगी. हमारे पूर्वजों ने यह समृद्ध ज्ञान दस्तावेजों में दर्ज कर रखा है, इसे वंशावली कहते हैं. दावा किया कि इसमें यजमान की पीढ़ी दर पीढ़ी के नाम दर्ज हैं, संबंधित कुल से कोई भी व्यक्ति तीर्थ पर आता है, तो उसका नाम उनके पिता, दादा, परदादा के साथ दर्ज कर लिया जाता है. यह परंपरा 200 साल से चली आ रही है.

श्रद्धालु हो जाते हैं भावुक
तीर्थ यात्री न सिर्फ यहां अपने गयापाल पंडे से पिंडदान श्राद्ध का कर्मकांड करवाते हैं, बल्कि वहां उनके पास बही-खातों में अपने पूर्वजों की विवरणी देखते हैं. अपने पूर्वजों के नाम देखकर वे खुशी से झूम उठते हैं. वह तब भावुक हो जाते हैं, जब वे अपने पूर्वजों के हस्ताक्षर देखते हैं, तब उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रह जाता है.

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इन पंडितजी के पास पीढ़ियों का ‘गूगल’, झट से बताएंगे 200 साल पुराने पूर्वज



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