मध्यप्रदेश में हर 100 में से 34 मरीजों की मौत के पीछे दिल और खून की नलियों से जुड़ी बीमारियां (डिजीज ऑफ सर्कुलेटरी सिस्टम) जिम्मेदार हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, यह आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है। यह दावा केंद्र सरकार की मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डे
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देश की बात करें तो हृदय रोग कुल मौतों में 40.8% की हिस्सेदारी रखते हैं। यानी हर 100 में से 40 लोगों की मौत का कारण कमजोर दिल है। चिंता की बात यह है कि सिर्फ व्यस्क या बुजुर्ग ही नहीं बल्कि 14 साल से छोटे 17% बच्चों की भी मौत हार्ट डिजीज के कारण हो जाती है।
गंदगी भी बन रही जानलेवा
रिपोर्ट बताती है कि हृदय रोग के बाद दूसरे नंबर पर फेफड़ों और सांस की नलियों की बीमारियां (डिजीज ऑफ रेस्पिरेटरी सिस्टम) और तीसरे नंबर पर संक्रमण व परजीवी रोग (सर्टेन इन्फेक्शन और पैरासिटिक) मौत का कारण हैं। साल 2022 में मप्र में संक्रमण से 2,169 मौतें हुईं। देशभर में 1.43 लाख मरीज संक्रमण की भेंट चढ़ गए। इनमें 88,637 पुरुष और 54,901 महिलाएं थीं। परजीवी संक्रमण के मामलों में 70% मौतें सेप्टीसीमिया (खून में संक्रमण) से हुईं।
वरिष्ठ गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव रघुवंशी बताते हैं कि परजीवी संक्रमण का मुख्य कारण गंदगी और साफ-सफाई का अभाव है। घरों और अस्पतालों में गंदगी से पेट में संक्रमण फैलता है और समय पर इलाज न मिले तो मौत भी हो सकती है।

सोर्स- गांधी मेडिकल कॉलेज के कार्डियोलॉजी विभाग की केस स्टडी
देश और मप्र में दर्ज मौतें साल 2022 में देश में 86.49 लाख मौतें दर्ज हुईं। इनमें से सिर्फ 19.32 लाख मौतों का कारण दर्ज किया गया यानी 22.3%। इनमें 12.36 लाख पुरुष और 6.95 लाख महिलाएं थीं। वहीं, मध्यप्रदेश में 5.11 लाख मौतें दर्ज हुईं, जिनमें सिर्फ 48 हजार (9%) मौतों का कारण दर्ज हुआ। इनमें 34 हजार पुरुष और 14 हजार महिलाएं थीं।

साल दर साल बदलती मौत के पीछे बीमारियों की हिस्सेदारी
बीमारी 2002- 2007- 2012- 2017- 2022
डिजीज ऑफ सर्कुलेटरी सिस्टम – 27.5% – 26.9% – 30.4% – 34% – 40.8%
डिजीज ऑफ रेस्पिरेटरी सिस्टम – 9% – 8.2% – 8.4% – 9.2% – 9.7%
सर्टेन इन्फेक्शन और पैरासिटिक – 14.2% – 13.8% – 12.3% – 10.4% – 7.4%

कोविड के बाद से यंग जेनरेशन हार्ट पेशेंट वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. किसलय श्रीवास्तव ने कहा कि कोविड के बाद से यंग पेशेंट में हार्ट से जुड़ी बीमारी बढ़ी हैं। यह पहले भी बढ़ रही थीं, लेकिन अब इनका ग्राफ तेजी से ऊपर गया है। किसी भी प्रकार की कमी हार्ट डिजीज में देखने को नहीं मिली है। इसके साथ-साथ दवाइयों का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कई फैक्टर जिम्मेदार हैं, जिसमें से प्रमुख दिनचर्या है। जो हमने महसूस किया है कि पहले अपनी डेली लाइफ में काफी एक्टिव थे, लेकिन अब यह कम हो गया है।
हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए ब्रिस्क वॉकिंग जरूरी डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, हार्ट मरीजों के लिए सबसे ज्यादा लाभकारी ब्रिस्क वॉकिंग है। लोग क्या करते हैं कि धीमे-धीमे चलते हैं। ऐसे 10 किलोमीटर चलने के बाद भी वो लाभ नहीं दिखते। जो 5 किमी तेज चलने पर नजर आते हैं। हर युवा को दिन में 30 मिनट ब्रिस्क वॉकिंग करनी चाहिए।
चेस्ट पेन न लें हल्के में डॉ. श्रीवास्तव ने कहा, इमोशनल स्ट्रेस एक इम्पॉर्टेंट फैक्टर है। स्ट्रेस की वजह से आर्टरीज पास में चली जाती हैं, जिससे चेस्ट पेन होने लगता है। इमोशन स्ट्रेस के कारण हाइपर टेंशन की समस्या भी बढ़ती है। इस स्थिति में यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से है तो लॉन्ग टर्म में यह बॉडी पर इम्पैक्ट करता है।

डॉ. श्रीवास्तव ने आगे कहा कि इन फैक्टर्स के अलावा कई अन्य चुनौतियां भी हैं। उदाहरण के लिए कोलेस्ट्रॉल की जांच में लेवल ठीक आया, लेकिन क्या यह सच में ठीक है। हम अक्सर एलडीएल पैरामीटर पर गौर करते हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि उसमें भी कई फैक्टर होते हैं। इसमें एक माइक्रो एलडीएल पार्टिकल होते हैं। इसकी समस्या भारत के लोगों में कॉमन हैं।
अगर किसी का एलडीएल 100-110 है, लेकिन माइक्रो एलडीएल की हिस्सेदारी उसमें 30 से 40 प्रतिशत है तो यह चिंताजनक स्थिति होती है। इन सब की जानकारी अभी भी लोगों तक नहीं पहुंची है। अब इनको टारगेट करने की भी जरूरत है। कुछ थोड़ी महंगी जांच भी करानी चाहिए, जिसमें होमोसिस्टीन और माइक्रो एलडीएल शामिल है।