यह दृश्य लोगों को काफी आकर्षित भी कर रहा है. करीब 26 हजार वर्ग फीट में जंगल को तैयार किया जा रहा है. यह जंगल पहाड़ी में नर्मदा तट किनारे जबलपुर के सगड़ा, झपनी ग्राम पंचायत में तैयार हो रहा है. जहां 6 हजार 990 पौधे लगाए जा रहे हैं. यह पौधे दो से तीन सालों में बढ़कर बढ़े हो जाएंगे. यह मध्यप्रदेश का पहला उपवन होगा, जहां मां शब्द लिखकर इतना बड़ा उपवन तैयार किया गया हो.
दरअसल जिस भूमि को नमो उपवन के लिए चिन्हित किया गया है. यह भूमि नर्मदा परिक्रमा पथ के लिए चिह्नित की गई थी. लिहाजा अब इसी भूमि पर नमो उपवन को विकसित किया जा रहा है. जहां आने वाले समय में यह उपवन नर्मदा भक्तों के लिए पहाड़ी पर आश्रय स्थल बन जाएगा. सुरक्षा के लिहाज से 7 एकड़ के इस पूरे क्षेत्र में तार से फेंसिंग भी कर दी गई है.
अपर कलेक्टर नाथू राम गोंड ने बताया करीब 26 हजार वर्ग फीट में मियांवाकी तकनीक से पौधों को रोपने का काम किया जा रहा है. जहां फलदार पौधों को लगाया गया है. जिनमें सीताफल, नीम, जामुन, आम अर्जुन, गुलमोहर, इमली, कदम गूलर, शीशम प्रजाति के करीब ढाई हजार पौधे हैं जबकि अन्य पौधे आंवला, मौलश्री, अमलतास, कनेर, बेल प्रजाति के रोप गए हैं. मां शब्द खूबसूरत देखें इसको लेकर चांदनी, चमेली, कनेर, मोगरा, मेहंदी सहित कई सुगंधित पौधे भी ‘नमो उपवन’ में लगाए गए हैं.
मियावाकी पद्धति एक वैज्ञानिक पौधारोपण तकनीक है, जिसे जापान के प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी ने विकसित किया. इस पद्धति का उद्देश्य प्राकृतिक वनों की तरह घने, आत्मनिर्भर और जैव विविधता से परिपूर्ण जंगल तैयार करना है. इस पद्धति में भूमि की गहरी खुदाई कर उसमें जैविक खाद, गोबर खाद और कम्पोस्ट मिलाया जाता है. फिर 3 पौधे प्रति वर्ग मीटर की घनत्व से विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए जाते हैं. नियमित सिंचाई, मल्चिंग और रखरखाव के कारण 2-3 वर्षों में पौधे पूरी तरह विकसित होकर घना जंगल तैयार कर देते हैं.
भविष्य में यहां पर नर्मदा परिक्रमावासियो के लिये आश्रय स्थल का निर्माण किया जाएगा, जो कि संपूर्ण सुविधायुक्त होगा. जिससे कि नमो उपवन का लाभ नर्मदा परिक्रमावासी के साथ-साथ जिले के समस्त नागरिकों को पर्यटन के रूप में लाभ मिल सकेगा. भविष्य में इस स्थान पर आजीविका मिशन से ’होम स्टे’, गौशाला आदि भी विकसित किए जाने की योजना जिला प्रशासन बनाने का काम कर रहा हैं.