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ये दर्द है दमोह जिले के हिनौती गांव के युवक अजय बंसल का, जो उस दलित समाज से आता है जिसे आज भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इस वजह से अजय साल में केवल 10-15 दिन के लिए गांव आता है, माता-पिता से मिलता है और लौट जाता है। उसके दलित समाज के और भी युवा हैं जिन्होंने इसी वजह से गांव छोड़ दिया है।
दरअसल, बुंदेलखंड में आज भी जातिगत भेदभाव की जड़ें काफी गहरी हैं। इस व्यवस्था को बदलने के लिए कई बार पहल हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। अब नई पीढ़ी ने व्यवस्था बदलने की बजाय पलायन का रास्ता अपनाया है। गांव में हो रहे इस भेदभाव की जानकारी प्रशासन को नहीं है। पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट
गांव की भौगोलिक बनावट में दिखता है बंटवारा लगभग 1800 की आबादी वाला हिनौती, ग्राम पंचायत हथनी पिपरिया का हिस्सा है। पहली नजर में यह किसी भी आम गांव की तरह दिखता है। गांव में थोड़ा घूमने पर सामाजिक विभाजन की रेखाएं स्पष्ट हो जाती है। गांव का अगला हिस्सा तथाकथित सवर्ण जातियों का है, तो वहीं पिछला हिस्सा दलित और आदिवासी समुदायों की बसाहट है।
एक तालाब, घाट अलग-अलग गांव के बीचो-बीच स्थित एक पुराना तालाब इस भेदभाव का सबसे बड़ा और क्रूर प्रतीक है। तालाब एक है, लेकिन उसके घाट जातियों के नाम पर बंटे हुए हैं। भास्कर रिपोर्टर ने जैसे ही हाथ धोने के लिए एक घाट की सीढ़ियों पर कदम रखा, पास ही चबूतरे पर बैठे गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा कि “आप इस घाट पर मत जाओ। ये घाट छोटी जात वालों का है।”
ठाकुर ने आगे कहा कि यह हमारे गांव का बहुत पुराना तालाब है। हम लोग बचपन से देख रहे हैं कि तालाब के घाट अलग-अलग जातियों के हिसाब से बंटे हुए हैं। गांव में करीब 5-6 जातियों के लोग रहते हैं। लोधी, दलित, आदिवासी, ठाकुर, ब्राह्मण सभी की जगह तय है। यह हमारे गांव की पुरानी परंपरा है जो पीढ़ियों से चल रही है। कोई भी किसी दूसरे के घाट पर नहीं जाता।

हितौनी गांव का वो तालाब जिसके घाट भी जातियों में बंटे हैं।
नियम तोड़ने की हिम्मत कोई नहीं करता
इस ‘परंपरा’ की पुष्टि तालाब के ही पास रहने वाले दूसरी ओर रहने वाले 60 वर्षीय होशियार रैकवार भी करते हैं। वे कहते हैं, ‘यहां ऐसा ही है। ऊंची जाति वालों के घाट अलग, छोटी जाति वालों के अलग है। यह आज से नहीं, बरसों से है। जब से गांव बसा है, तब से यही व्यवस्था चल रही है। बाप-दादा को जैसा करते देखा, हम भी वैसा ही कर रहे हैं।’
रैकवार इस व्यवस्था की वजह से आने वाली मुश्किलों को भी याद करते हैं। वे बताते हैं, ‘पहले जब गर्मियों में पानी कम हो जाता था और हमारे घाट का पानी सबसे पहले सूखता था, तब भी हमें ऊंची जाति वालों के घाट पर जाने की मनाही थी। हम गंदा पानी इस्तेमाल करने को मजबूर थे, लेकिन किसी और के घाट पर नहीं जा सकते थे।’

शादी-ब्याह में भी कायम है दूरी भेदभाव का यह सिलसिला सिर्फ तालाब तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक समारोहों और खान-पान में भी उतनी ही शिद्दत से मौजूद है। गांव के भैया राम बताते हैं, ‘पहले हम लोगों को शादी-ब्याह में बुलाते थे, लेकिन बैठने की व्यवस्था अलग होती थी। बड़े लोग ऊपर बैठते थे और हम लोग दूर नीचे जमीन पर।
अब तो हमारी बिरादरी के लोगों ने ऐसी जगहों पर जाना ही बंद कर दिया है। अब खान-पान सिर्फ अपनी-अपनी समाज में ही होता है।’ इस बात को लोधी समाज से आने वाले मुकेश लोधी भी स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, ‘हम लोग तो सभी को अपने घर के कार्यक्रमों में बुलाते हैं, बस बैठने की व्यवस्था अलग-अलग रहती है।
ठाकुरों के लिए कुर्सी होती है, वे ऊपर बैठते हैं। जो छोटी जाति के लोग हैं, उन्हें नीचे बिठाते हैं। यह तो चलता है।’

दलितों के भीतर भी जातिवाद की परतें जातिगत भेदभाव केवल सवर्णों और दलितों के बीच नहीं है, बल्कि दलित जातियों के भीतर भी इसकी गहरी जड़ें हैं। नन्हेलाल रैकवार कहते हैं, ‘गांव में अब थोड़ा बदलाव आया है, उठना-बैठना साथ होने लगा है, लेकिन कुछ चीजें वैसी ही हैं। अगर हम बड़े लोगों के सामने जाते हैं और वे कुर्सी पर बैठे हैं, तो हम खुद ही नीचे बैठ जाते हैं।
वे हमें तो कभी-कभी चबूतरे पर बैठने को कह देते हैं, लेकिन अहिरवार और कुटवार को साथ नहीं बिठाते। सच कहूं तो, उनको तो हम लोग भी अपने साथ बराबरी से नहीं बिठाते।’ यही बात गांव की सरपंच नीता अहिरवार भी दोहराती हैं, जो खुद एक दलित समुदाय से हैं। वे कहती हैं, ‘मैं जब से शादी होकर इस गांव में आई हूं, तब से ही यह सब देख रही हूं।
साथ बैठकर खाना नहीं खा सकते। हम पंचायत में जाते हैं तो मुझे कुर्सी पर बैठने को मिलता है, लेकिन समाज में बराबरी नहीं है। जैसे शुरू से रिवाज चल रहा है, तब से ये वैसा ही चल रहा है।

नई पीढ़ी बोलीं- देश आजाद हुआ हम नहीं जहां पुरानी पीढ़ी इसे ‘परंपरा’ या ‘नियति’ मानकर जी रही है, वहीं नई पीढ़ी इस अपमान के खिलाफ आवाज उठा रही है। गांव के युवा दिनेश जाटव, जो भीम आर्मी से जुड़े हैं, कहते हैं, ‘देश आजाद हो गया, बाबा साहब का संविधान लागू हो गया, लेकिन हम आज भी आजाद नहीं हैं। दमोह के कई गांवों में आज भी भयंकर छुआछूत है।
कई जगहों पर तो दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता था। हमने शांति से नहीं, तो क्रांति से ही सही, पर घोड़ी पर बारातें निकालीं।’ दिनेश कहते हैं कि भेदभाव तो रोजमर्रा के जिंदगी में शामिल हो गया है। दुकान पर जाओ तो चप्पल उतारकर बाहर से सामान लेने के लिए कहते हैं। दुकानदार पैसे भी हाथ से नहीं लेता, नीचे रखवाता है और सामान फेंक कर देता है। यहां इतनी छुआछूत है।
प्रशासन भेदभाव से अनजान जब इस पूरे मामले पर दमोह की एडीएम मीना मेश्राम से बात की गई, तो उन्होंने कहा, ‘जातिगत भेदभाव के संबंध में अभी तक इस गांव से हमें कोई शिकायत नहीं मिली है।’

एक्सपर्ट बोले- आर्थिक गतिविधियां ला सकती हैं बदलाव
बुंदेलखंड की जाति व्यवस्था पर स्टडी कर चुके राकेश दीवान बताते हैं कि जातिवाद के प्रश्न का सरकार और कानून से ज्यादा ताल्लुक नहीं है, बल्कि ये समाज से ज्यादा जुड़ा है। अगर, समाज तैयारी कर ले कि हमें जातिवाद खत्म करना है, तो कानून और सरकारें उसमें मदद कर सकती है। वे कहते हैं कि इस व्यवस्था को आर्थिक गतिविधियों के जरिए बदला जा सकता है।
यदि आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो जाति के सवाल थोड़े कमजोर होते हैं। बहुत से इंडस्ट्रियल एरिया, रेलवे कॉलोनी या फिर ऐसी जगह जहां आर्थिक गतिविधियां ज्यादा है वहां जाति का कड़ा बंधन नहीं होता। सभी को मिलजुल कर रहना होता है, इसलिए जाति की अहमियत पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन कम होती है।
