मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि देवास के बावड़िया मोहल्ले में रहने वाली 18 साल की नगीना 30 सितंबर 2013 की शाम को कोचिंग से घर नहीं लौटी। रात 8 बजे उसने बहन हसीना को घबराकर फोन किया था। फोन पर उसके आखिरी शब्द थे… पुलिस को बुला.
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उस कॉल के बाद नगीना कभी नहीं मिली। 18 दिन बाद उसकी लाश दो बोरों में बंधी हुई इंदौर बायपास के एक कुएं से मिली। ऊपरी धड़ अलग, कमर के नीचे का हिस्सा अलग। नगीना की हत्या किसने और क्यों की थी? हत्यारों ने वारदात को अंजाम कब और कैसे दिया था? पुलिस ने जब इसकी जांच की तो हत्याकांड की परतें खुलती चलती गई।
मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट-2 के 5 चैप्टर में पढ़िए कौन था नगीना का कातिल
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया। सबसे पहले नगीना की मां और बहन हसीना से फिर से पूछताछ की गई। इस बार उनकी आंखों में सिर्फ दुख ही नहीं, बल्कि एक अजीब सा डर और झिझक भी थी। हसीना ने कांपते हुए पुलिस को जो बताया, उसने जांच की दिशा ही बदल दी।
हसीना ने कहा, “नगीना और पापा के बीच अक्सर झगड़ा होता था। पैसों को लेकर और उसके दोस्तों को लेकर। पापा चिल्लाते थे कि उसने घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी है।” यह पहली बार था जब शक की सुई परिवार पर आकर टिक गई थी। पुलिस ने दो समानांतर लाइनों पर काम करना शुरू किया।

मोबाइल लोकेशन ने खोले राज बीजू से दोबारा सख्ती से पूछताछ हुई। उसने अपनी बात दोहराई, ‘मैं उस दिन शिर्डी में था। मेरे पास इसके सबूत हैं। मैंने नगीना को आखिरी बार घटना से दो दिन पहले देखा था।’ पुलिस ने जब बीजू की मोबाइल लोकेशन और अन्य सबूतों की जांच की, तो उसकी बात सच निकली। वह वाकई शिर्डी में था। अब पुलिस का पूरा ध्यान परिवार पर केंद्रित हो गया।
हसीना ने दबी जुबान में अपने पिता और भाई पर शक जताया था। पुलिस ने पिता आदम और भाई इरफान को पूछताछ के लिए बुलाया। इरफान ने बताया कि जिस दिन नगीना लापता हुई, वह पेमेंट के सिलसिले में उज्जैन गया हुआ था। लेकिन जब पुलिस ने उसकी कॉल डिटेल और मोबाइल लोकेशन निकलवाई, तो उसका झूठ पकड़ा गया। उसकी लोकेशन पूरे दिन देवास में ही थी। यह एक बड़ा सबूत था।
दो दिन की निगरानी के बाद पुलिस ने पिता आदम और भाई इरफान को हिरासत में ले लिया। थाने में पूछताछ शुरू होते ही इरफान का चेहरा पीला पड़ गया। उसके चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी। जैसे-जैसे पुलिस के सवाल तीखे होते गए, इरफान का आत्मविश्वास डगमगाने लगा। आखिरकार, पुलिस की सख्ती के आगे वह टूट गया और उसने जो कबूल किया, वह किसी भी सभ्य समाज की कल्पना से परे था।

इरफान ने रोते हुए अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने बताया, ‘मेरी छोटी बहन नगीना दूसरे धर्म के लड़कों, सूरज और बीजू से दोस्ती रखती थी। वह हमारी दुकान से पैसे निकालकर उन पर खर्च करती थी। जब मैं कुछ समय के लिए गुजरात गया था, तो उसने मां को बहला-फुसलाकर हमारे पीछे वाला मकान भी अपने नाम करवा लिया था। वह घर में किसी की नहीं सुनती थी, हर बात पर लड़ाई-झगड़ा करती थी।
हम सब उससे बहुत परेशान हो चुके थे। उसकी हरकतों से हमारे परिवार की इज्जत खराब हो रही थी। मैंने अपने दोस्त अनीस, जो रिक्शा चलाता है, से बात की। मैंने उससे कहा कि कोई आदमी बताओ जो नगीना को खत्म कर सके। जो भी पैसा लगेगा, मैं और मेरे पिताजी मिलकर दे देंगे। एक महीने पहले, अनीस ने अपने जीजा इदरीस और उसके दोस्तों रिजवान और सद्दाम को इंदौर से देवास बस स्टैंड पर बुलवाया।

लाश को ठिकाने लगाने दो बोरे भी भाई से मंगवाए 30 सितंबर 2013 को, प्लान के मुताबिक इदरीस, रिजवान और सद्दाम कार लेकर भोपाल रोड पर बताई गई जगह पर पहुंच गए। शाम को उन्होंने मुझे फोन करके दो बोरे लाने को कहा। मैं शक्कर की दुकान से दो बोरे खरीदकर अनीस को दे आया और साथ में 15 हजार रुपए भी दिए। शाम करीब 6 बजे, जब मेरी बहन नगीना सिविल लाइन से कोचिंग पढ़कर सब्जी लेने जा रही थी, मैंने उसे अपनी कार में बैठा लिया।
मैं उसे भोपाल रोड ले गया, जहां वो तीनों हत्यारे इंतजार कर रहे थे। मैंने नगीना को उनके पास छोड़ा और वापस आ गया। रात को इदरीस ने मुझे फोन करके बताया कि ‘काम हो गया है’। दो दिन बाद अनीस बाकी पैसे लेने आया। मैंने पापा से लेकर उसे दो लाख रुपए दिए। 5-6 दिन बाद वह फिर आया, तो मैंने बैंक अकाउंट से ढाई लाख रुपए निकालकर उसे दे दिए।
इस तरह हमने कुल 5 लाख 15 हजार रुपए अपनी ही बेटी और बहन को मारने के लिए दिए। पिता आदम हाजी मेमन ने भी कबूल किया कि बेटी ‘अपने मन की करती थी’ और उनकी बात नहीं मानती थी, इसलिए वे उसकी हत्या के लिए राजी हो गए।

इरफान और आदम के कबूलनामे के आधार पर पुलिस ने इंदौर से चारों आरोपियों – अनीस (बिचौलिया), इदरीस (मुख्य हत्यारा), रिजवान और सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया। उनकी पूछताछ में हत्या की रात का पूरा मंजर सामने आ गया। आरोपी सद्दाम ने बताया कि योजना के मुताबिक, 30 सितंबर की शाम हम कार से भोपाल रोड पर तय जगह पहुंच गए।
थोड़ी देर में अनीस अपने रिक्शे से आया और हमें दो बोरे देकर चला गया। करीब आधे घंटे बाद, इरफान अपनी बहन नगीना को कार से लेकर आया। उसने नगीना को हमारी कार के पास उतारा और चला गया। जैसे ही नगीना हमारी तरफ बढ़ी, मैंने उसका मुंह कसकर दबा दिया। इदरीस ने उसकी टांगें पकड़कर उसे जमीन पर गिरा दिया और छुरे से उसका गला काट दिया। वह वहीं मर गई।
इसके बाद, रिजवान ने छुरे से उसकी कमर के पास से शरीर के दो टुकड़े कर दिए। हमने दोनों टुकड़ों को अलग-अलग बोरों में भरा, कार की डिक्की में रखा और इंदौर के लिए निकल गए। आरोपी इदरीस ने आगे बताया ‘हमने हत्या के लिए तीन छुरे देवास से ही 400 रुपए में खरीदे थे। नगीना के शरीर पर जो कपड़े, कान की बाली, और गले की चेन थी, वह सब हमने निकाल लिया। उसका मोबाइल भी ले लिया।
हत्या के बाद मिले पैसों से हमने जुआ खेला, शराब पी और बाकी पैसे बांट लिए। कुछ दिनों बाद, हमने नगीना का मोबाइल इंदौर के तुलसीनगर के एक नाले में फेंक दिया और उसके कपड़े तीन इमली चौराहे के पास एक नाली के पाइप में डाल दिए।

पुलिस ने अपनी जांच पूरी कर कोर्ट में चालान पेश किया। केस की सुनवाई के दौरान आरोपी पिता आदम हाजी मेमन की बीमारी से मौत हो गई। अदालत में, आरोपियों के वकील ने यह तर्क देकर केस को कमजोर करने की कोशिश की कि कुएं से मिली लाश की चमड़ी गल चुकी थी, इसलिए यह साबित नहीं होता कि वह नगीना ही थी।
उन्होंने यह भी दलील दी कि जब्त किए गए कपड़ों पर खून के धब्बों का डीएनए टेस्ट नहीं हुआ, लेकिन इस केस में अभियोजन पक्ष की सबसे बड़ी ताकत थी नगीना की बड़ी बहन हसीना। यह एक बहन की अपनी ही दूसरी बहन को इंसाफ दिलाने की लड़ाई थी। उसने अपने परिवार के खिलाफ जाने का साहस दिखाया। हसीना ने कोर्ट में अपने पिता और भाई के खिलाफ गवाही दी।
उसने नगीना की आखिरी कॉल के बारे में बताया, घर में होने वाले झगड़ों का सच बयान किया और लाश के पास मिले कपड़ों की शिनाख्त की। यह लड़ाई आसान नहीं थी। हसीना को धमकियों का सामना करना पड़ा, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के निर्देश पर उसे विशेष पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई गई। वह अंत तक अपनी बहन के लिए लड़ती रही।

तमाम गवाहों, सबूतों और विशेषकर हसीना की गवाही के आधार पर, करीब साढ़े चार साल तक चले इस केस में अदालत ने अपना फैसला सुनाया। 24 मार्च 2018 को, देवास जिला कोर्ट ने नगीना के भाई इरफान, उसके दोस्त अनीस और तीनों हत्यारों इदरीस, रिजवान और सद्दाम को हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने का दोषी पाया। अदालत ने पांचों दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई।
यह फैसला सिर्फ एक हत्या का फैसला नहीं था, बल्कि तथाकथित ‘ऑनर’ के नाम पर की जाने वाली क्रूरता के खिलाफ एक तमाचा था। यह एक भाई और पिता के विश्वासघात की कहानी थी, और उससे भी बढ़कर, यह एक बहन के अटूट प्रेम और न्याय के लिए उसकी अविश्वसनीय लड़ाई की कहानी थी। हसीना ने साबित कर दिया कि इंसाफ की लड़ाई में रिश्ते नहीं, बल्कि सच मायने रखता है।
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तारीख 30 सितंबर 2013। देवास के बावड़िया मोहल्ले की गलियों में उस दिन भी रोज की तरह ही चहल-पहल थी। 18 साल की नगीना शेख, अपनी 12वीं की किताबों का बैग कंधे पर टांगकर घर से निकली। मां ने पीछे से आवाज लगाई, ‘जल्दी लौट आना।’ नगीना ने पलटकर एक मुस्कान दी और कहा, ‘बस तीन घंटे में आती हूं।’ ये नगीना की परिवार से आखिरी बातचीत थी। इसके बाद नगीना नहीं लौटी। पूरी खबर पढ़ें