53 साल की उम्र में एक बार फिर दुनिया को देखना कैसा लगता है? इंदौर की चंद्रकांता से जब ये सवाल पूछा तो वह बोलीं- 40 साल पहले मैंने जो दुनिया देखी थी वो बदल गई है। इतने साल तक दुनिया को केवल महसूस कर पाती थी अब देख पा रही हूं। इस अनुभव को शब्दों में बय
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दरअसल, चंद्रकांता जब 12 साल की थीं, तब उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। इतने सालों तक अंधेरे में रहने के बाद इसी साल उनकी आंखों का कॉर्निया ट्रांसप्लांट( नेत्रदान) हुआ है। अब वह दिवाली की जगमग देखने के लिए बेताब है। ऐसी ही कहानी संदीप और आकृति की भी है। ये दिवाली दोनों के जीवन में नई रोशनी लेकर आई है।
दैनिक भास्कर ने इन लोगों से बात कर जाना कि आंखों की रोशनी मिलने के बाद उनकी जिंदगी कैसे बदली। साथ ही एक्सपर्ट से बात कर नेत्रदान की मुश्किलें और चुनौतियों के बारे में समझा। पढ़िए रिपोर्ट
अब बताते हैं… तीनों की कहानी
कहानी1: बचपन और जवानी अंधेरे में डूबी.. अब रोशन सवेरा ‘मैंने पिछले 40 साल से दिवाली के मौके पर अंधेरा ही महसूस किया है। मेरा बचपन, मेरी जवानी… सब कुछ इस अंधेरे ने छीन ली थी। यह कहते हुए चंद्रकांता की आवाज में 40 साल का दर्द साफ झलकता है। जब 12 साल की उम्र में उनकी आंखों की रोशनी गई, तो मानो दुनिया ही थम गई। आंखों से लगातार बहते आंसू और फिर अचानक छाई सफेद परत, यह उनके जीवन का सबसे भयानक मोड़ था।
वह कहती हैं, मेरे माता-पिता की मौत हुई, और मैं उन्हें आखिरी बार देख भी नहीं पाई। मेरी पढ़ाई छूट गई। मेरी मां, मरते-मरते भी मेरा ख्याल रखती रहीं । समय के साथ उनकी आंखों की हालत और बिगड़ गई। उनकी आंखें पॉपकॉर्न की तरह बाहर आ गई थीं और वे पलकें भी बंद नहीं कर पाती थीं। कोशिश करतीं तो बेतहाशा पानी बहता।
माता-पिता के जाने के बाद बहनों ने उन्हें संभाला, लेकिन बहनों की शादी हो गई, तो उन्हें वृद्धाश्रम में आना पड़ा। यहीं उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।

चंद्रकांता इंदौर के इस वृद्धाश्रम में रहती है।
रेनू मैडम ने दिखाई अंधेरे में रोशनी की किरण
वृद्धाश्रम में इंदौर सोसाइटी ऑफ ऑर्गन डोनेशन की सदस्य और अमर सेवा आश्रम की रेनू मैडम उनके लिए मां बनकर आईं। चंद्रकांता भावुक होकर कहती हैं, “मां के बाद उन्हीं ने मेरी इतनी सेवा की और यह आस जगाई कि मैं फिर से देख पाऊंगी।” रेनू मैडम ने ठान लिया था कि वह चंद्रकांता जी के जीवन से इस अंधेरे को मिटाकर रहेंगी।
6 महीने का इंतजार और आंखों में खुशी के आंसू कॉर्निया ट्रांसप्लांट करने वाले डॉक्टर अंकित बताते हैं, ‘जब चंद्रकांता जी हमारे पास आईं, तो उनकी आंखें बहुत बुरी स्थिति में थीं। हमें उम्मीद थी कि अगर अच्छी गुणवत्ता का कॉर्निया मिला, तो रोशनी लौट सकती है।’ 6 महीने से ज्यादा के इंतजार के बाद, एक अच्छी कंडीशन का कॉर्निया डोनेट हुआ और ट्रांसप्लांट किया गया।
डॉक्टर अंकित कहते हैं, ‘जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो हमारी आंखों में भी खुशी के आंसू आ गए। हम खुद बहुत उत्साहित थे।’ चंद्रकांता उस पल को याद करते हुए कहती हैं, ‘जब डॉक्टर ने बताया कि रोशनी आ जाएगी, तो मेरे शरीर में करंट दौड़ गया था। ट्रांसप्लांट के बाद मैं बार-बार कह रही थी कि मेरी पट्टी निकालो। जब पट्टी हटी, तो सबसे पहले मुझे डॉक्टर साहब की शक्ल दिखी।
मैंने रेनू मैडम और आश्रम के साथियों को देखा। उस दिन मेरा नया जीवन शुरू हो गया। अब इस दिवाली वह चुपचाप कोने में नहीं बैठेंगी।

कहानी2 : अब पढ़ाई पूरी करने का सपना कुक्षी( धार) के 30 वर्षीय संदीप की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आंखों की समस्या के चलते उन्हें नौवीं क्लास के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। वह बताते हैं, ‘मेरी नजरें हमेशा ऊपर रहती थीं, मैं नीचे एक लेवल में नहीं देख पाता था।’ जनवरी 2024 में उन्हें दिखना लगभग बंद हो गया। वह परिवार के सदस्यों को भी पहचान नहीं पाते थे।
परिवार उन्हें गुजरात के शंकर नेत्रालय ले गया, जहां से उन्हें इंदौर के डॉ. अंकित के पास भेजा गया। 10 जुलाई 2024 को उनका एक आंख का कॉर्निया ट्रांसप्लांट हुआ। ‘आज मैं सामान्य रूप से देख पा रहा हूं,’ संदीप की आवाज में एक नई उम्मीद है। मैं सामने खड़े इंसान को पहचान सकता हूं और दूर से बड़े अक्षरों में लिखी हेडलाइन भी पढ़ सकता हूं। संदीप अब अपनी छूटी हुई पढ़ाई पूरी करना चाहते हैं और किताबें पढ़ना चाहते हैं।

आकृति के पिता बोले- यही हमारी होली-दिवाली ललितपुर की रहने वाली 6 साल की आकृति पिछले 4 साल से देख नहीं पा रही थी। खेलते-खेलते अचानक आंख में जलन हुई और फिर आंख पूरी तरह सफेद हो गई। पिता राजेश बताते हैं, ‘पिछले चार साल कैसे गुजरे, यह सिर्फ हम जानते हैं। हमेशा चिंता रहती थी कि उसका भविष्य क्या होगा, शादी कैसे होगी?’ एक दिन हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों के कैंप से उन्हें उम्मीद की किरण मिली।
डॉक्टरों ने बताया कि इलाज संभव है। हमीदिया अस्पताल में रजिस्ट्रेशन के बाद, एक महीने पहले आकृति को एक नया कॉर्निया मिला। राजेश खुशी से कहते हैं, ‘जैसे ही डॉक्टरों ने बताया कि उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई है, वही दिन हमारे लिए किसी होली-दिवाली से कम नहीं था।’
इस दिवाली, उनकी बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह त्योहार मना पाएगी, नए कपड़ों में खुद को देख पाएगी और अपने माता-पिता को देख पाएगी। यह इस परिवार के लिए चार साल बाद आई सबसे बड़ी खुशी है।

एक्सपर्ट बोले- कॉर्निया ट्रांसप्लांट में कई चुनौतियां चंद्रकांता, संदीप और आकृति तीनों किस्मत वाले हैं जिन्हें आंखें डोनेट करने वाले मिले। उनकी वजह से वे अब रोशनी देख पा रहे हैं। मगर, इसका दूसरा पहलू ये है कि प्रदेश में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की राह में कई बड़ी चुनौतियां हैं। इसकी वजह से आज भी कई लोग अंधेरे में जीने को मजबूर है।

- डेथ सर्टिफिकेट की अनिवार्यता: किरन फाउंडेशन के सचिव डॉ. राकेश भार्गव बताते हैं, ‘सबसे बड़ी अड़चन तब आती है जब किसी की मृत्यु घर पर होती है। परिवार के पास तुरंत डेथ सर्टिफिकेट नहीं होता, जो अस्पताल के लिए अनिवार्य है। इसके बिना, दान किए गए कॉर्निया का उपयोग सिर्फ रिसर्च में हो पाता है, ट्रांसप्लांट में नहीं।’ वे कहते हैं कि सरकार को इस नियम में बदलाव कर त्वरित मेडिकल स्क्रीनिंग को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- ग्रीफ काउंसलर की कमी:हमीदिया अस्पताल की नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ. कविता बताती हैं, ‘अस्पताल में होने वाली मौतों में युवाओं की संख्या बहुत है, लेकिन उनकी आंखें हमें नहीं मिल पातीं। इसका कारण ग्रीफ काउंसलर की कमी है, जो शोक में डूबे परिवार को नेत्रदान के लिए प्रेरित कर सके।’ सरकार को इस बारे में लिखा है उम्मीद है कि जल्द ही एक स्थायी ग्रीफ काउंसलर की नियुक्ति होगी।
- संसाधनों का अभाव:डॉ. कविता बताती हैं, ‘नेत्रदान के लिए कॉल आने पर हमें कई बार OLA-UBER करके जाना पड़ता है, क्योंकि एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं होती।’ इसका समाधान ये है कि सभी आई बैंकों को समर्पित वाहन की सुविधा दी जानी चाहिए।
- आई-बैंक की कमी:नए नियमों के अनुसार हर मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में आई-बैंक होना चाहिए, लेकिन मध्य प्रदेश के कई जिलों में यह सुविधा नहीं है। आई-बैंक न होने से 6 घंटे के भीतर कॉर्निया कलेक्ट करना और उसे प्रिजर्व करना मुश्किल हो जाता है। डॉ. कविता बताती है कि हमीदिया में 2016-17 में सिर्फ 8-10 कॉर्निया मिले थे, लेकिन आई-बैंक खुलने के बाद 2024 में 64 कॉर्निया मिले हैं।
- गुणवत्तापूर्ण कॉर्निया का अभाव:डॉ. कविता ने बताया, ‘हमारे पास अधिकतर बुजुर्गों के कॉर्निया आते हैं, जो रोशनी देने की हालत में नहीं होते। केवल 25-30% कॉर्निया ही ट्रांसप्लांट के लायक होते हैं। बाकी का इस्तेमाल थेरेप्टिक ग्राफ्टिंग या स्टूडेंट्स की ट्रेनिंग में होता है।’
