प्रदेश भर में पंजीकृत 25 लाख 62 हजार 701 युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार के पास कोई योजना नहीं है। शासकीय नौकरी तो दे नहीं पा रही। अब निजी कंपनियों में काम दिलाने के नाम पर 15 लाख रुपए महीने की फिजूलखर्ची अलग से शुरू कर दी है। इतनी मोटी राशि खर्च कर
.
मेला लगवाने वाले रोजगार कार्यालय, उद्योग विभाग और आईटीआई तीनों संस्थाओं के माध्यम से टेंट-कुर्सी, स्टॉल जैसी सारी व्यवस्थाएं जुटाने के साथ ही इसमें शामिल होने वाली निजी कंपनियों के अधिकारियों की मनुहार (आवभगत) तक करनी पड़ती है।
इन व्यवस्थाओं पर प्रति मेले में औसतन 30 हजार रुपए खर्च होता है। इस हिसाब से 52 जिलों में रोजगार मेलों पर खर्च होने वाली राशि का आंकड़ा 15 लाख 60 हजार से ऊपर पहुंच रहा है। इतनी मोटी राशि खर्च होने के बाद भी युवाओं को निजी कंपनियों ने नौकरी दी या नहीं, इसकी जानकारी किसी भी विभाग के पास नहीं है।
मेला लगाने वाले विभागों ने भी वास्तविकता में नौकरी पाने वाले युवाओं के आंकड़े जुटाने का प्रयास नहीं किया। उप संचालक रोजगार कार्यालय उज्जैन के वीरेंद्र बिजौलिया ने बताया, “मेलों में कंपनी युवाओं का चयन कर जॉब ऑफर देती है। वही आंकड़े हम दर्ज करते हैं। एक मेले पर टेंट आदि मिलाकर करीब 25-30 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं।”
10 जिलों के रोजगार कार्यालयों को सरकार ने बना दिया फुटबॉल
प्रदेश भर के रोजगार कार्यालयों में अभी कुल 25 लाख 62 हजार 701 युवा पंजीकृत हैं। उज्जैन में यह आंकड़ा 50 हजार 281 है। पंजीकृत लाखों युवाओं को नौकरी के अवसर उपलब्ध कराने वाले 10 जिलों के रोजगार कार्यालयों को ही सरकार ने फुटबॉल बना दिया। इसमें उज्जैन का रोजगार कार्यालय भी शामिल है।
जिसे साल 2018 में केंद्र सरकार ने मॉडल करियर सेंटर बनाकर यहां वाईपी (यंग प्रोफेशनल) भेजकर युवाओं को ट्रेनिंग दिलाने की पहल की, जो एक साल में बंद हो गई। साल 2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने पीपीपी मॉडल के तहत सरकारी कार्यालय को निजी कंपनी यशस्वी के सुपुर्द कर दिया।
2022 में यह कंपनी भी चली गई। अब फिर रोजगार अधिकारी ही बचे हैं, जो सिर्फ रोजगार मेले लगवाने तक सीमित हैं। उज्जैन के अलावा इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, सागर, रीवा, सीहोर, नीमच, सिंगरोली जिलों में भी रोजगार कार्यालयों का यही हश्र हुआ।
7 मेलों में 1354 को जॉब ऑफर, कितनों को काम मिला पता नहीं
उज्जैन जिले में अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक लगे कुल 7 रोजगार मेलों में सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 2903 युवा शामिल हुए। इनमें से अक्टूबर तक कुल 1354 युवाओं का प्रथम (प्राथमिक) चयन हुआ। लेकिन इनमें से किस कंपनी ने कितने युवाओं को काम दिया, यह प्रमाणित डेटा किसी के पास नहीं है। ऐसे में प्रथम चयन के आंकड़े बताकर विभाग इन्हीं को जॉब दिलाने का झूठा दावा करता है।
रोजगार मेलों में प्रथम चयन आंकड़ों के बाद कोई रिकॉर्ड नहीं
हर माह रोजगार मेला लगाने वाले विभाग मेले में शामिल युवाओं की संख्या और प्रथम चयनित आवेदकों के आंकड़े बताकर ही अपनी पीठ खुद थपथपाने में लगे हैं। जबकि प्रथम चयन का मतलब यह कतई नहीं है कि इनको नौकरी या रोजगार दे दिया गया।
एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हकीकत में प्रथम चयन वाले युवाओं में से औसतन 10 में से केवल 2 या 3 को ही काम मिलता है। यानी सरकारी दावों की तुलना में सिर्फ 20-30% युवाओं को ही कंपनियां काम पर रखती हैं। ये आंकड़े कंपनी सरकार से साझा नहीं करती।
आंकड़े नहीं जुटाए जा सकते, युवाओं की अलग-अलग होती है कंडीशन
“सरकारी नौकरी की हमारे पास कोई मांग नहीं आती। प्रतिमाह प्रत्येक जिले में रोजगार मेलों के माध्यम से युवाओं को निजी कंपनियों में नौकरी दिलाने का प्रयास करते हैं। इन मेलों से कितने युवाओं को नौकरी पर रखा गया और उनमें से कितने अभी काम कर रहे हैं, यह आंकड़े नहीं जुटाए जा सकते, क्योंकि जॉब ऑफर के बाद भी कई युवा कंपनी में जाते ही नहीं। कुछ पहुंचने के बाद भी ज्वाइन नहीं करते और कुछ ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद छोड़ देते हैं। सबकी अलग-अलग कंडीशन होती है।”– सीके बघेल, जॉइंट डायरेक्टर, रोजगार संचालनालय भोपाल