उज्जैन/आगर मालवा. बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल हर दिन गर्माता जा रहा है. उम्मीदवार और दलों के नेता अपने-अपने क्षेत्रों में मतदाताओं को प्रभावित करने में जुटे हैं, लेकिन इसके साथ ही चुनावी जीत की तलाश अब तंत्र-मंत्र के रास्तों की ओर भी बढ़ चली है. प्रचार के इस शोर के बीच 1200 किमी दूर मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन और आगर का नाम भी सामने आ रहा है. बताया जा रहा है कि इन स्थानों पर गुप्त रूप से प्रत्याशियों के लिए “विजय अनुष्ठान” कराए जा रहे हैं. स्थानीय तांत्रिकों ने बताया कि उज्जैन के श्मशान में सारी रात तंत्र-मंत्र किए जा रहे हैं. वहीं आगर के नलखेड़ा में मिर्ची अनुष्ठान कराया जा रहा है.
उज्जैन के प्राचीन चक्रतीर्थ श्मशान घाट में इन दिनों तांत्रिकों की व्यस्तता बढ़ी हुई है. भय्यू महाराज नामक तांत्रिक बताते हैं कि बिहार के विभिन्न प्रत्याशी और उनके समर्थक उनसे संपर्क कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि टिकट फ़ाइनल होते ही उम्मीदवार विजय साधना करवाने के लिए पहल करते हैं. उनके अनुसार, यह श्मशान “जाग्रत” है और यहाँ की गई साधना चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है.
भैरव साधना में 30 हजार का खर्चा, पूर्णाहुति से पहले शराब और राल
इन अनुष्ठानों में भैरव साधना सर्वाधिक लोकप्रिय है, जिसका खर्च करीब ₹25,000 से ₹30,000 तक आता है. साधना के दौरान राई, लाल मिर्च, सरसों, शराब, देसी घी, कपूर, गूगल, नींबू और नारियल जैसी सामग्री का उपयोग होता है. पूर्णाहुति से पहले शराब और राल डालने की परंपरा का पालन किया जाता है.
आगर मालवा के नलखेड़ा पीठ में बगलामुखी और मिर्ची अनुष्ठान
चक्रतीर्थ से करीब 100 किलोमीटर दूर नलखेड़ा का बगलामुखी पीठ भी इन दिनों सक्रिय है. मान्यता है कि पांडवों ने भी महाभारत के युद्ध से पहले यहाँ हवन किया था. तांत्रिक बताते हैं कि यहां धनतेरस की रात से भैरव साधना, भैरवी, पुतली साधना और मिर्ची अनुष्ठान शुरू किए गए हैं, जो अमावस्या की रात तक जारी रहते हैं. यह साधना सात घंटे तक चलती है और विशेष मंत्रोच्चारण के साथ पूरी होती है.
RJD और NDA दोनों खेमों की दिलचस्पी
भय्यू महाराज के अनुसार, इन साधनाओं में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के समर्थक सबसे अधिक सक्रिय हैं, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के कुछ उम्मीदवार भी इस राह पर चल पड़े हैं. उनका कहना है कि जीत की उम्मीद में दोनों दलों के प्रत्याशी गोपनीय रूप से इन अनुष्ठानों का सहारा ले रहे हैं. धर्म, आस्था और चुनावी सत्ता के इस मेल ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को नया और रहस्यमय मोड़ दे दिया है- जहां जीत अब केवल प्रचार और रणनीति पर नहीं, बल्कि तंत्र की शक्तियों पर भी निर्भर बताई जा रही है.