Last Updated:
Jabalpur News: तेंदुए का शिकार या फिर उसके अंगों का व्यापार भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत एक गंभीर अपराध है क्योंकि तेंदुआ इस अधिनियम की अनुसूची एक में शामिल है. इस मामले में कठोर सजा मिलती है.
जबलपुर. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि बाघ, तेंदुआ या फिर अन्य वन्यजीव के शिकार करने के बाद खाल, दांत और नाखून गायब क्यों मिलते हैं. आखिर इन खाल, दांतों और नाखून से ऐसा क्या किया जाता है, जो शिकारी जंगली जानवरों को मारने के बाद इन्हें निकाल लेते हैं. इतना ही नहीं, बाघ और तेंदुओं को इन्हीं चीजों के लिए शिकारी अपने जाल में फंसाते हैं और मार देते हैं. इन्हीं सभी सवालों को लेकर लोकल 18 की टीम पहुंची जबलपुर के वन विभाग, जहां हमारी मुलाकात हुई जबलपुर के आईएफएस अधिकारी ऋषि मिश्रा से.
अंधविश्वास, पूजन और आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल
डीएफओ ऋषि मिश्रा ने आगे कहा कि अक्सर लोगों के मन में अंधविश्वास और भ्रांति होती है कि वन्यजीव के दांत और नाखून को पूजन-पाठ में इस्तेमाल किया जा सकता है. न सिर्फ पूजन-पाठ इसके अलावा जादू-टोना, धन वर्षा और आर्थिक लाभ जैसी भ्रांतियों के लिए भी वन्यजीवों के अंगों का इस्तेमाल किया जाता है. चमत्कारी सिद्धियों के लिए भी इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं. यही मिथक लोगों के मन में बना रहता है.
सख्त सजा का प्रावधान
तेंदुए का शिकार या फिर शरीर के अंगों का व्यापार भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत एक गंभीर अपराध माना जाता है क्योंकि तेंदुआ इस अधिनियम की अनुसूची एक में शामिल है. इस मामले में कठोर दंड मिलता है. इस अपराध के लिए 7 साल तक की सजा हो सकती है. इतना ही नहीं, 25 हजार रुपये तक का जुर्माना भी हो सकता है. यह गैर-जमानती अपराध होता है.
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.