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ठंड में गाजर और मूली जैसी जड़ वाली सब्ज़ियाँ किसानों के लिए कमाई का भरोसेमंद जरिया बन जाती हैं. अगर शुरुआती बुवाई छूट भी जाए तो लेट सॉइंग का तरीका अपनाकर किसान सिर्फ 45 दिनों में बढ़िया उत्पादन और ऊंचे बाज़ार भाव हासिल कर सकते हैं
सतना और आसपास के किसानों के लिए सर्दियों की शुरुआत सबसे मुफ़ीद मौसम मानी जाती है खासकर उन लोगों के लिए जो कम लागत में तेजी से मुनाफ़ा देने वाली फसलों की तलाश में रहते हैं. जड़ों वाली सब्ज़ियों की खेती ऐसी ही एक खेती है जिसे अपनाकर किसान 45-60 दिनों में शानदार आय कमा सकते हैं. सबसे अच्छी बात ये है की अगर शुरुआती ठंड में बुवाई छूट भी गई हो तब भी किसान लेट सॉइंग अपनाकर बेहतरीन दाम पा सकते हैं. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सही किस्म, सही दूरी और सही समय पर बुवाई कर ली जाए तो गाजर और मूली जैसी सब्ज़ियाँ खेत को कमाई का बेहतरीन साधन बना देती हैं.
सतना के किसान क्यों करें गाजर–मूली की लेट सॉइंग
सोहावल विकासखंड की उद्यानिकी विभाग अधिकारी सुधा पटेल ने लोकल 18 को बताया कि गाजर और मूली दोनों ही सतना, मैहर, अमरपाटन और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं. वहीं व्यापारिक दृष्टिकोण से भी इनकी मांग हमेशा बनी रहती है.अगर किसान अर्ली सॉइंग यानी सितंबर से पहले बुवाई कर लेते हैं तो अक्टूबर तक उन्हें बाजार में ऊँचे दाम मिल जाते हैं. लेकिन अगर शुरुआत में बुवाई नहीं हो पाई है तो लेट सॉइंग किसानों के लिए बेहद लाभकारी विकल्प बन सकती है क्युकी तब तक मार्केट में इन दोनों की आवक भी कम हो जाती है.
कौन-कौन सी किस्में हैं लेट सॉइंग में सबसे बेहतर
सुधा पटेल के अनुसार मूली की खेती के लिए लेट बोनी में पुशा केतकी, पुशा हिमानी , डाइकॉन किस्में सबसे अधिक उपज देती हैं. वहीं गाजर की लेट बोनी के लिए पुशा आशिता, पूषा नैनतेश, इम्प्रेटर किस्मों की सर्वाधिक मांग रहती है. इन किस्मों की खासियत यह है कि ठंड बढ़ने पर भी इनकी ग्रोथ बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता बेहद अच्छी आती है.
सही बुवाई और उपचार से दोगुना लाभ
बुवाई से पहले बीजोपचार बेहद ज़रूरी है, जिसके दो तरीके हैं. पहली है रासायनिक विधि, जिसमे 1 किलो बीज को 2.5 ग्राम थायराम से उपचारित करें. वहीं दूसरी है देसी विधि, इसमें 5 लीटर गौमूत्र में 1 किलो बीज को डुबोकर उपचारित किया जा सकता है.
बुवाई की विधि भी किसान की कमाई में बड़ा फर्क डालती
क्यारियों में मूली लगाकर क्यारियों के बीच दूसरी फसल उगाई जा सकती है’ मेड़ों पर गाजर लगाने से नीचे की सतह पर दूसरी फसल से अतिरिक्त कमाई का मौका मिलता है. इसमें रो टू रो दूरी 45–50 सेमी, पौधा से पौधा दूरी 5–8 सेमी और बीज की गहराई 3–4 सेमी होनी चाहिए.
सिर्फ 45 दिनों में तैयार, मुनाफ़ा दोहरा
अगर किसान दिसंबर के अंत से जनवरी की शुरुआत में योजनाबद्ध तरीके से गाजर और मूली की लेट सॉइंग कर दें तो लगभग 45 दिनों में फसल तैयार हो जाती है. बाज़ार में इन दिनों इन दोनों सब्ज़ियों की मांग चरम पर रहती है. सतना क्षेत्र के किसानों के लिए यह मौका कम लागत में अधिक मुनाफ़ा कमाने का सुनहरा अवसर साबित हो सकता है.