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Gwalior News: झांसी हाईवे और भिंड रोड पर हुई मौतों ने दिखा दिया कि कंटेंट की भूख ने इंसानियत को पीछे धकेल दिया है. लोग खून बहते शरीरों को बचाने की जगह वीडियो बनाते रहे. मजदूरों और छात्रों की जान मदद के अभाव में चली गई. यह सिर्फ दुर्घटना नहीं, समाज के ठंडे पड़ चुके दिल का खौफनाक सच है.
Gwalior News: आज ग्वालियर सिर्फ एक शहर नहीं रहा, बल्कि एक ठंडा, संवेदनहीन दर्पण बन चुका है जिसमें हम खुद को देखते हैं और शर्म से नजरें झुक जाती हैं. शुक्रवार की सुबह झांसी हाईवे पर जो हुआ, वो कोई साधारण सड़क हादसा नहीं था; वो हमारे समाज की आत्मा पर एक और गहरा घाव था. एक ट्रॉली पलट गई. तीन बंगाली मजदूर, जो सुबह-सुबह अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी कमाने निकले थे, उसी पल दुनिया से विदा हो गए. उनके बेजान शरीर सड़क पर बिखरे पड़े थे. उनके साथ जो चौथा मजदूर था, वो जिंदा था—लेकिन सिर्फ शरीर से. उसका बेटा जैसा साथी चला गया था, उसकी दुनिया उजड़ गई थी. वो घायल पिता सड़क पर तड़प-तड़प कर रो रहा था, चीख रहा था, अपने मृत साथियों के शरीरों से लिपट कर विलाप कर रहा था. लेकिन आसपास खड़े सैकड़ों लोग? वो चुपचाप मोबाइल निकाल कर वीडियो बना रहे थे. रील्स के लिए. लाइक्स के लिए.
पूरे एक घंटे तक शव सड़क पर पड़े रहे. घायल का खून बहता रहा. उसकी चीखें हवा में गूंजती रहीं. लेकिन कोई एक व्यक्ति भी आगे नहीं आया जो उसे उठाकर अस्पताल ले जाता, या कम से कम कंबल ओढ़ाता, सिरहाने हाथ फेरता. नहीं. सब तमाशबीन बने खड़े रहे. रील्स बनाते रहे. शायद किसी का वीडियो वायरल हो जाए. शायद किसी को लाखों व्यूज मिल जाएं. ये पहला मौका नहीं. ठीक तीन दिन पहले, 19 नवंबर को भिंड रोड पर भी यही नजारा था. दो युवा छात्र, जिनकी उम्र अभी सपने देखने की थी, बाइक से गिरे. एक की मौके पर ही मौत हो गई, दूसरा लहूलुहान तड़प रहा था. फिर वही भीड़. फिर वही मोबाइल. लोग वीडियो बनाते रहे. खून बहता रहा. जिंदगी एक-एक सांस खींचती रही और अंत में हार गई. ज्यादा ब्लड लॉस से दोनों में से एक की जान चली गई. जिसे बचाया जा सकता था, वो भी नहीं बचा. क्योंकि मदद करने की बजाय लोग “कंटेंट” बना रहे थे.
कब तक चलता रहेगा ये? कब तक हम इंसान बने रहेंगे सिर्फ नाम के लिए? जिस दिन हम किसी तड़पते इंसान को देखकर पहले फोन निकालेंगे और बाद में इंसानियत याद आएगी, समझ लीजिए उस दिन हमारी संवेदना मर चुकी है. ग्वालियर आज रो रहा है. उन तीन मजदूरों की विधवाओं का, उन बच्चों का जो अब बाप को कभी नहीं देखेंगे, उस घायल पिता का जिसने अपने साथी को सड़क पर यूँ मरते देखा और कोई हाथ तक नहीं थामा.
निवेदन- हे ग्वालियर, हे इंसानियत… उठो. अगली बार जब कोई सड़क पर गिरे, तो पहले इंसान बनो. फोन बाद में निकालना. क्योंकि अगर हमने आज इन चीखों को अनसुना कर दिया, तो कल जब हमारी बारी आएगी, कोई हमारी चीख भी नहीं सुनेगा.
Anuj Singh serves as a Content Writer for News18MPCG (Digital), bringing over Two and Half Years of expertise in digital journalism. His writing focuses on hyperlocal issues, Political, crime, Astrology. He has…और पढ़ें
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