बुरहानपुर में किसान परेशान, मंडी में लगातार गिर रहे हैं इस फसल का दाम

बुरहानपुर में किसान परेशान, मंडी में लगातार गिर रहे हैं इस फसल का दाम


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Agriculture News: किसान मनीष भारते ने कहा कि एक महीने पहले व्यापारी 5300 क्विंटल के हिसाब से सोयाबीन की उपज खरीद रहे थे. एक महीने में ही 800 से ₹1000 का भाव में अंतर आ गया है. जिस कारण किसान काफी चिंतित और परेशान है. सोयाबीन की फसल तैयार करने में 6 महीने का समय लग जाता है.

मध्य प्रदेश सरकार किसानों को उपज का अच्छा दाम देने के लिए कई प्रकार की योजनाएं बना रही है. लेकिन मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले की रेणुका कृषि उपज मंडी में अपनी उपज बेचने आने वाले किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. किसानों का कहना है कि एक महीने पहले व्यापारी 5300 क्विंटल तक सोयाबीन की उपज खरीद रहे थे.

अब 4100 से 4200 प्रति क्विंटल ही हमारी उपज खरीदी जा रही है. जिस कारण हमारा नुकसान हो रहा है. हमारी लागत भी नहीं निकल पा रही है. जिसको लेकर अब किसान विरोध करने को मजबूर हो गए हैं. किसान मनीष भारते का कहना है कि सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है. यह दावे जमीन पर खोखले नजर आ रहे हैं.

किसानों ने दी जानकारी 
टीम ने जब मंडी में आए किसान मनीष भारते से बात की तो उन्होंने बताया कि एक महीने पहले व्यापारी 5300 क्विंटल के हिसाब से सोयाबीन की उपज खरीद रहे थे. लेकिन एक महीने में ही 800 से ₹1000 का भाव में अंतर आ गया है. जिस कारण किसान काफी चिंतित और परेशान है. हमारी लागत भी नहीं निकल पा रही है. हमको सोयाबीन की फसल तैयार करने में 6 महीने का समय लग जाता है. यह 6 महीने तक हमको खाद बीज से लेकर तो खरपतवार और उसकी कटाई तक के काफी खर्चा लगता है. लेकिन जब भाव नहीं मिलता है तो हम हताश हो जाते हैं हम लगातार नुकसान झेल रहे हैं. सोयाबीन मक्का और गेहूं की फसल में हमको कई सालों से नुकसान हो रहा है. अब हम लगाए तो कौन सी फसल लगाए. इसको लेकर हमारी चिंताएं बढ़ जा रही है.

भाव नहीं मिलने से नाराज है किसान 
जब सिरपुर से आए किसान मुकेश रामदास चौधरी ने लोकल 18 से कहा कि कम भाव मिलने से काफी परेशानी जा रही है. लागत भी नहीं निकल रही है. हम सरकार से मांग करते हैं कि फसलों का एक न्यूनतम मूल्य लागू किया जाए. उस रेट पर हमारी फसले खरीदी जाए. जिससे हमारी लागत के साथ हमको मुनाफा हो तो आने वाले सालों में भी हम खेती में बढ़ोतरी करेंगे खेती में लगातार नुकसान होने से हमारा मनोबल गिरते जा रहा है. आज की युवा पीढ़ी तो खेती करना पसंद ही नहीं करती है लेकिन हम जैसे किसान परंपरागत खेती करते आ रहे हैं.

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