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रामधेर मज्जी के सरेंडर ने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के नक्सल फ्रेमवर्क को बड़ा झटका दिया है. MMC ज़ोन का प्रभावी कमांडर रहा रामधेर अब मुख्यधारा में लौट आया है. इसी साल कई टॉप माओवादी नेताओं ने आत्मसमर्पण किया है. सुरक्षाबलों का मानना है कि यह घटनाक्रम तीनों राज्यों के नक्सल मुक्त होने की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकता है.
श्रीनिवास नायडू
भोपाल/ रायपुर/ राजनांदगांव . मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के नक्सल बेल्ट में दो दशकों से जिस नाम का खौफ सबसे अधिक था, वह अब सुरक्षा एजेंसियों के सामने हथियार डाल चुका है. रामधेर मज्जी का सरेंडर तीनों राज्यों में चल रही नक्सल-रोधी मुहिम के लिए सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है. वहीं 2025 में सबसे अधिक नक्सलियों और उनके कमांडर्स ने सरेंडर किया है. रामधेर मज्जी के सरेंडर के बाद सवाल यह है कि क्या तीनों राज्य आखिरकार नक्सल मुक्त होने की ओर बढ़ रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियां इसकी पुष्टि नहीं कर रहीं, लेकिन यह साफ है कि जंगलों के भीतर गहराई तक चल रही रणनीतिक कार्रवाई अब निर्णायक चरण में है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने नक्सलियों से कहा है कि वे तुरंत सरेंडर करें और मुख्य धारा से जुड़ें.
रामधेर मज्जी का सरेंडर सिर्फ एक ऑपरेशन की सफलता नहीं. यह उन बदलावों की पुष्टि भी है, जिनके कारण नक्सल ढांचा टूट रहा है. तेलुगु, गोंडी और हिंदी जानने वाला यह कमांडर जमीन पर रणनीतियों का “फील्ड ब्रेन” माना जाता था. जनवरी 2025 में उसे MMC ज़ोन की कमान दी गई थी. साल खत्म होने से पहले वह ही संगठन की मुख्य कमजोरी बन गया. तीनों राज्यों की पुलिस का मानना है कि “रामधेर के सरेंडर के साथ MMC ज़ोन उत्तर और दक्षिण दोनों का अध्याय खत्म हो गया.” इससे संकेत मिलता है कि मध्यप्रदेश लगभग नक्सल मुक्त स्थिति में पहुंच चुका है.
MMC ज़ोन के पतन की सबसे बड़ी वजह: रामधेर का सरेंडर
रामधेर मज्जी कभी राजनांदगांव-खैरागढ़-बालाघाट के बीच फैले कॉरिडोर का नियंत्रक था. दक्षिणी MMC ज़ोन की गुरिल्ला यूनिट उसी के निर्देशों पर चलती थी. दीपक तेलतुंबड़े जैसे बड़े कमांडरों के खत्म होने के बाद उसकी भूमिका और बढ़ गई. वह कई वर्षों तक तीन राज्यों की पुलिस के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण लक्ष्य बना रहा. अब वही अपनी टीम से अलग होकर आत्मसमर्पण कर चुका है.
संगठन के अंदर टूट किस तरह तेज हुई
- टॉप कमांडरों की लगातार मौत और गिरफ्तारियां
- ज़ोनल कमांडरों के बीच मतभेद और फंडिंग पर विवाद
- जंगलों में लगातार दबाव बढ़ाने वाले ऑपरेशन
- ग्रामीण इलाकों में सप्लाई नेटवर्क का कमजोर होना
- राज्यों के बीच इंटेलिजेंस समन्वय का मजबूत होना
| क्रम | नाम | पद/भूमिका | इनामी राशि | स्थान | सरेंडर वर्ष |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | मलोजुला वेणुगोपाल | पोलित ब्यूरो सदस्य | 1 करोड़ | गढ़चिरौली | अक्टूबर 2025 |
| 2 | पुललरी प्रसाद राव उर्फ चंद्रन्ना | सेंट्रल कमेटी सदस्य | 40 लाख (अन्य राज्यों में 1 करोड़) | तेलंगाना | नवंबर 2025 |
| 3 | रामधेर उर्फ सोमा | सेंट्रल कमेटी सदस्य | 40 लाख (अन्य राज्यों में 1 करोड़) | राजनांदगांव | 8 दिसंबर 2025 |
| 4 | टक्का पल्ली वासुदेव उर्फ सतीश | सेंट्रल कमेटी सदस्य | 40 लाख | बस्तर | अक्टूबर 2025 |
| 5 | ग्रिड्डी पवंदम रेड्डी उर्फ श्याम दादा | DKSZC सदस्य | 25 लाख | छत्तीसगढ़ | नवंबर 2025 |
| 6 | वेंकटेश उर्फ अदुमल वेंकटेश | DKSZC सदस्य | 25 लाख | बस्तर | अक्टूबर 2025 |
| 7 | राजमन मंडावी उर्फ भास्कर | DKSZC सदस्य | 25 लाख | जगदलपुर | अक्टूबर 2025 |
| 8 | रानीता उर्फ जयमति | DKSZC सदस्य | 25 लाख | जगदलपुर | अक्टूबर 2025 |
| 9 | मुचाकी एर्रा | DKSZC सदस्य | 25 लाख | तेलंगाना | नवंबर 2025 |
2024 से 2025 के बीच रिकॉर्ड सरेंडर
- बड़े कमांडरों की कमी ने नेतृत्व को कमजोर किया.
- दमन के बजाय सरेंडर पॉलिसी पर राज्यों ने जोर दिया.
- लगातार दबाव वाले ऑपरेशन ने मूवमेंट रूट को बाधित किया.
- आंतरिक अविश्वास ने माओवादी ढांचे को अंदर से तोड़ा.
- इसी कारण कई बड़े नेता मुख्यधारा में लौट आए.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें