भिंड में गांजा तस्करी का ‘कंपनी मॉडल’ सामने आया है। इसके लिए फाइनेंसर से लेकर मैनेजर, स्टोर कीपर और सप्लाई तक फिक्स होते हैं। सबका हिस्सा फिक्स होता है। फाइनेंसर को लागत का डबल मुनाफा मिलता है। कहीं फंसे तो रुपए की जरूरत होगी, इसके लिए पहले ही सिक्यो
.
भिंड में गांजा तस्करी के एक संगठित गिरोह के तीन सदस्यों के बरोही पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद इस कंपनी मॉडल का खुलासा हुआ है। पुलिस ने तीनों आरोपियों को एनडीपीएस एक्ट के तहत जेल भेज दिया है, जबकि इस नेटवर्क से जुड़े दो आरोपी अभी फरार हैं।
दैनिक भास्कर ने पुलिस और सूत्रों से बात कर तस्करी की पूरी कहानी की पड़ताल की, पढ़िए यह रिपोर्ट…
दरअसल, बीते दिनों रात के समय मदनपुरा बांध के पास पुलिस को एक संदिग्ध हुंडई कार घूमती नजर आई। पुलिस ने जब कार को रोकने का प्रयास किया तो चालक कच्चे रास्ते से भागने लगा। पीछा कर कार को रोका गया तो तलाशी में 22 किलो 200 ग्राम गांजा बरामद हुआ। कार भिंड के बीटीआई रोड निवासी राजेंद्र बघेल चला रहा था। उसके साथ बरोही निवासी पंकज शुक्ला और सोई थाना सुरपुरा निवासी राजकुमार शर्मा भी मौजूद थे। पुलिस की पूछताछ में पूरे नेटवर्क की कड़ियां सामने आईं, जिससे साफ हुआ कि यह गांजा तस्करी एक सुनियोजित और संगठित कारोबार का रूप ले चुकी थी।
कंपनी तर्ज पर चलता था नेटवर्क, ऐसे होता था मुनाफे का बंटवारा गांजा तस्करी का यह पूरा नेटवर्क कंपनी की तरह संचालित किया जा रहा था। इसमें काम और मुनाफे का बंटवारा पहले से तय था। पूरे सिस्टम को चार प्रमुख हिस्सों में बांटा गया था, जिसमें हर व्यक्ति की भूमिका और हिस्सेदारी तय थी।
सबसे अहम भूमिका फाइनेंसर की होती थी, जो पूरे कारोबार में पूंजी लगाता था। उदाहरण के तौर पर उड़ीसा से करीब ₹2 लाख का गांजा खरीदा जाता था, जिसे भिंड में बेचकर कुल कारोबार ₹10 लाख तक पहुंच जाता था।
इस कुल रकम में से सीधे 50 प्रतिशत हिस्सा फाइनेंसर को मिलता था, यानी करीब ₹5 लाख। शेष ₹5 लाख को नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों में बांटा जाता था। इसमें मैनेजर को ₹1.50 लाख, स्टोरकीपर को ₹1.50 लाख और सेलर को ₹1.50 लाख दिए जाते थे। बाकी बची ₹50 हजार की राशि नेटवर्क के संचालन, सिक्योरिटी और अन्य संसाधनों पर खर्च के लिए रखी जाती थी।
सेंट्रल जेल में उड़ीसा के तस्करों से जुड़ा नेटवर्क करीब चार साल पहले बरोही निवासी पंकज शुक्ला वर्ष 2022 में गांजा तस्करी के एक मामले में जेल गया था। जेल पहुंचने के बाद उसने नशे के इस कारोबार से अपने संबंध और मजबूत कर लिए। शुरुआत में वह खुद गांजा पीता था और छोटी पुड़ियां बनाकर बेचने लगा। उप जेल मेहगांव में बंद रहने के दौरान उसने जेल के भीतर ही गांजे की सप्लाई का नेटवर्क खड़ा कर लिया। बाहर से पुड़िया मंगवाकर वह खुद भी सेवन करता और अन्य कैदियों को बेचता था।
जब उसकी गतिविधियां सामने आईं तो जेल प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए उसे सेंट्रल जेल ग्वालियर भेज दिया। यहीं उसकी मुलाकात उड़ीसा के बड़े गांजा तस्करों से हुई। संपर्क बढ़ने के बाद सस्ते दामों पर गांजा खरीदने की डील तय हुई। बाद में जमानत पर बाहर आने के बाद पंकज ने इसी जेल में बने नेटवर्क को आधार बनाकर भिंड में गांजा तस्करी का पूरा सिस्टम खड़ा कर दिया।

फाइनेंसर तलाशा, व्हाट्सऐप पर डील, फोनपे से पेमेंट जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद पंकज शुक्ला ने सबसे पहले अपने अवैध कारोबार को दोबारा खड़ा करने की योजना बनाई। इसके लिए उसने फाइनेंसर की तलाश शुरू की और दोगुना मुनाफे का लालच देकर गांव के भोलू दंडोतिया को तैयार कर लिया। फाइनेंसर मिलने के बाद नेटवर्क का विस्तार किया गया। पंकज ने अपने भरोसेमंद परिचित राजेंद्र बघेल और आर्यनगर निवासी मजनू उर्फ शिवम शर्मा को सप्लायर के रूप में जोड़ा। पुलिस की सख्ती से बचने के लिए गांजा सीधे नहीं रखा जाता था, बल्कि उसे सोई गांव में राजकुमार शर्मा के घर सुरक्षित रूप से स्टोर किया जाने लगा।
गिरोह के सदस्य आपस में बातचीत के दौरान किसी कंपनी की तरह शब्दों का इस्तेमाल करते थे। बातचीत में असली नामों की जगह ‘फाइनेंसर’, ‘डीलर’, ‘स्टोर कीपर’ और ‘सेल्समेन’ जैसे कोड वर्ड बोले जाते थे। पूरी बातचीत व्हाट्सऐप के जरिए होती थी। माल की डिलीवरी पूरी होने के बाद भुगतान नकद की बजाय फोनपे जैसे डिजिटल माध्यम से लिया जाता था, ताकि लेनदेन का रिकॉर्ड बना रहे और शक से बचा जा सके।

बरोही थाना।
5,000 रुपए किलो में उड़ीसा से खरीद, 25 हजार में बिक्री पुलिस के अनुसार जांच में यह सामने आया है कि गांजा तस्करी का यह गिरोह उड़ीसा से एक बार में 50 किलो से लेकर एक क्विंटल तक गांजा लाता था। गांजा कपड़ों के बैग में भरा जाता था, जिसमें नीचे गांजा और ऊपर कपड़े रखे जाते थे, ताकि चेकिंग के दौरान शक न हो। खरीद की पूरी रकम फाइनेंसर भोलू दंडोतिया लगाता था। माल बिकने के बाद उसे उसकी लगाई रकम के बदले दोगुनी राशि लौटाई जाती थी।
पुलिस ने बताया कि उड़ीसा से गांजा करीब 5 हजार रुपए प्रति किलो की दर से खरीदा जाता था, जिसे भिंड और आसपास के इलाकों में 20 से 25 हजार रुपए प्रति किलो तक बेचा जाता था। सप्लाई की जिम्मेदारी भी इलाकावार तय थी। मजनू उर्फ शिवम शर्मा भिंड शहर में गांजा सप्लाई करता था, जबकि देहात क्षेत्र की सप्लाई राजेंद्र बघेल के जिम्मे थी। इसके अलावा गिरोह की गतिविधियां इटावा और मुरैना जिले के पोरसा क्षेत्र तक फैली हुई थीं, जहां उनके गुर्गे सक्रिय बताए जा रहे हैं।

गांजा की तस्करी कर आरोपियों ने 12 लाख की कार खरीदी थी।
गांजा कारोबार से खरीदी 12 लाख की कार पुलिस जांच में सामने आया है कि राजेंद्र बघेल ने गांजा तस्करी से अर्जित पैसों से करीब 12 लाख रुपए की हुंडई एक्सटर कार खरीदी थी। इसी कार का इस्तेमाल आरोपी कई बार उड़ीसा जाकर गांजा लाने के लिए करता रहा। पुलिस के अनुसार यह वाहन तस्करी के नेटवर्क में अहम भूमिका निभा रहा था। कुछ महीने पहले इस मामले में पुलिस ने राजेंद्र बघेल की पत्नी को भी आरोपी बनाया था। जांच एजेंसियां गांजा कारोबार से जुड़े अन्य चल-अचल संपत्तियों की भी जानकारी जुटा रही हैं।
तीन आरोपी गिरफ्तार, जेल भेजा गया बरोही थाना प्रभारी अतुल भदौरिया का कहना है कि गांजा तस्करी के मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर एनडीपीएस एक्ट के तहत जेल भेजा गया है। गिरोह से जुड़े दो आरोपी भोलू दंडोतिया और मजनू उर्फ शिवम शर्मा फिलहाल फरार हैं, जिनकी तलाश की जा रही है।
