बीआरटीएस की रेलिंग हटाने, इंदौर के बिगड़ते ट्रैफिक और नियम विरुद्ध प्राइवेट वाहनों में हूटर लगाने के मामले में लगी जनहित याचिकाओं के मामले में बुधवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच में सुनवाई हुई। इसमें कमेटी ने बीआरटीएस को लेकर रिपोर्ट पेश की। इस पर कोर्ट न
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दरअसल मामले में 16 दिसंबर को सुनवाई होनी थी जो नहीं हो सकी थी। इसी दिन कलेक्टर और निगम कमिश्नर की ओर से एक आवेदन लगाया गया कि अभी SIR (मतदाता सूची पुनरीक्षण) का काम चल रहा है इसलिए कोर्ट में उपस्थित रहने में हाजिरी माफी दी जाए। आवेदन में इसके लिए 16 फरवरी तक का समय मांगा गया। बुधवार को पहले सत्र में कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि बीआरटीएस का काम भी जरूरी है। आप आदेश की अवहेलना की कोशिश कर रहे हैं। आप ढाई बजे किसी भी स्थिति में कोर्ट में उपस्थित हों। आपको उपस्थित होना ही होगा। इस तरह के कारण बनाकर ऐसा नहीं कर सकते। साथ ही सरकारी एडवोकेट से कहा कि ये कहीं भी हो इन्हें कोर्ट में उपस्थित करवाइए।
इंदौर बीआरटीएस का हिस्सा।
कोर्ट की सख्ती के बाद उपस्थित हुए आला अफसर फिर ढाई बजे कलेक्टर शिवम वर्मा, निगम कमिश्नर दिलीप यादव, ट्रैफिक डीसीपी आनंद कलांदगी डिवीजन बेंच के समक्ष उपस्थित हुए। मामले में याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अजय बागडिया ने सबसे पहले कोर्ट को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आपके आदेश के कारण ही इतना काम हो पाया है। इसके लिए उन्होंने शहर की ओर से भी धन्यवाद दिया। मामले में अब सुनवाई 12 जनवरी को नियत की गई है।
एक ओर की रेलिंग नहीं हटाने से ट्रैफिक बदहाल याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अजय बागडिया ने कहा कि वर्तमान में बीआरटीएस की एक हिस्से की रेलिंग हटाने से सड़क चौड़ी जरूर हुई है। इससे भंवरकुआ से विजय नगर की ओर आने वाले वाहनों चालकों को अब 1/3 हिस्सा मिल भी रहा है। दूसरी ओर विजय नगर से भंवरकुआ जाने वाले हिस्से की रेलिंग नहीं हटने से मार्ग काफी संकरा हो गया है जिससे ट्रैफिक का दबाव वहां ज्यादा है।

इंदौर बीआरटीएस की हटाई जा रही रेलिंग।
अस्थाई डिवाइडर नहीं लगाए जा सकते याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया कि वहां कि रेलिंग भी हटाकर बीच में डिवाइडर बनाए जाए। इस पर अधिकारियों की ओर से बताया कि इतनी जल्दी डिवाइडर नहीं बन पाएगा क्योंकि अभी हिस्से की रेलिंग को तोड़ा है और यह जगह अभी डिवाइडर के लिए ही छोड़ी गई है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से सुझाव दिया गया कि अभी जीपीओ चौराहा से शिवाजी नगर प्रतिमा तक बीच में डिवाइडर के रूप में सीमेंट के जो ब्लॉक लगाए हैं वैसे ही बाकी हिस्से में भी लगा दें। इस पर निगम कमिश्नर ने कहा कि इसकी कास्ट बहुत ज्यादा है। निगम के पास जो था वह लगा दिया गया है।
अधिकारी बोले- इससे तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी मामले इसे लेकर याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि ऐसे में पुलिस की जो बेरिकेटिंग होती है वह लगा दी जाए या प्लास्टिक बेरिकेट्स भी लगाए जा सकते हैं। अगर ये भी उपलब्ध नहीं हैं तो तब तक बीच में खंभे लगाकर रस्सी बांध दी जाए और दूसरी ओर रेलिंग भी तोड़ी जाए। इस पर अधिकारियों ने कहा कि यह जोखिमपूर्ण होगा और दुर्घटनाएं होंगी। लोग इससे कूदकर दूसरी ओर आएंगे।
लोग पालन नहीं करते तो दूसरे कैसे जिम्मेदार मामले में याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया कि ये वे लोग हैं जो ट्रैफिक रूल्स का पालन नहीं करते। अगर वे ऐसा करते हैं तो खुद की रिस्क पर करते हैं। अगर कोई घटना होती है तो दूसरा (प्रशासन) कैसे जिम्मेदार होगा। ऐसे लोगों के कारण पूरे शहर के लोग परेशानी क्यों भुगते इसलिए बीच में डिवाइडर बनाया जाए जो बहुत जरूरी है।

वह भोपाल है इसलिए हो गया मामले में कोर्ट ने दोहराया कि जब भोपाल में रेलिंग हटाने का फैसला हुआ तो महज 9 दिन में इसे पूरी तरह हटाकर रोड को चौड़ा कर दिया गया। वहीं इंदौर में फरवरी में आदेश हुआ। 10 महीने होने आए अभी भी एक ही हिस्से में रेलिंग हट पाई है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह भोपाल है इसलिए हो गया, यह इंदौर है इसलिए नहीं हो पा रहा है।
गिट्टी, मलबा बीच में पड़ा है, सही पेचवर्क की जरूरत मामले में कमेटी ने अपनी जो रिपोर्ट पेश की उसमें भी यही दोहराया कि एक ओर की रेलिंग तोड़ी गई है लेकिन दूसरी ओर की नहीं। इसके चलते एक ओर का मार्ग काफी संकरा हो गया है इसलिए इस हिस्से की रेलिंग तोड़ना जरूरी है। इसके साथ ही जो पेंचवर्क किया है उसे लेकर बताया कि इससे बाइक सवार दुर्घटनाग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे में पेंचवर्क सही तरीके समतल किया जाए ताकि दुर्घटना न हो। ऐसे ही मार्ग पर जो मलबा पड़ा है, कई जगह रेलिंग तोड़ने से सड़क की गिट्टी भी निकली पड़ी है। उसे साफ करना जरूरी है।

दोनों ओर रेलिंग के कारण संकेतक जरूरी कमेटी ने रिपोर्ट में लिखा कि बीआरटीएस के जो बस स्टॉप हैं वहां रेलिंग छोड़ दी गई हैं। ऐसे में यहां संकेतक लगाए जाएं ताकि दुर्घटना न हो। मामले में कोर्ट ने सुझाव दिया कि अभी जो रेलिंग हटाई गई है उसे अस्थाई डिवाइडर के रूप में उपयोग की जा सकती है। इस पर निगम की ओर से कहा गया कि मामले में जो ठेकेदार से अनुबंध हुआ है वह यह कि जैसे-जैसे तोड़ने का काम होगा वैसे-वैसे पेमेंट डिपाजिट करते जाएंगे। अगर तोड़ी गई रेलिंग का उपयोग किया गया तो फिर डिपाजिट नहीं हो सकेगा। मामले में कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि इस मामले में 12 जनवरी तक प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करें।
हूटर को लेकर कार्रवाई संतोषजनक नहीं इसी कड़ी में आज प्राइवेट वाहनों में नियम विरुद्ध हूटर और बत्ती लगाने के मामले में भी सुनवाई हुई। इसमें परिवहन उपायुक्त कोर्ट में पेश हुए और इस मामले में अब तक की गई कार्रवाई को लेकर रिपोर्ट पेश की। इस पर याचिकाकर्ता एडवोकेट मनीष यादव ने इस पर आपत्ति ली और कहा कि यह रिपोर्ट और मैदानी स्थिति बहुत अलग है।
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