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Khargone News: रामेश्वर की मेहनत का नतीजा भी दिखा. तरबूज की फसल जब तैयार हुई, तो वह खुशी से फूले नहीं समाए. खेत में 3-4 किलो तक वजन वाले बड़े और मीठे तरबूज तैयार हुए. उन्हें भरोसा था कि इस बार अच्छी कमाई होगी.
खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में तरबूज उत्पादक किसानों की मेहनत इस बार बाजार में दम तोड़ती नजर आ रही है. जिन खेतों में किसानों ने लाखों रुपये की लागत लगाकर तरबूज की फसल तैयार की, वही उपज अब कौड़ियों के भाव पर बिक रही है. हालात इतने बिगड़ गए कि गुस्से और बेबसी में किसान अपनी पकी पकाई फसल लोगों को मुफ्त में बांटने को मजबूर हो गए. कुछ ऐसा ही नजारा जिले के टांडा बरूड क्षेत्र के किसान रामेश्वर कुमरावत के खेत में भी देखा गया. ढाई एकड़ में लगा करीब चार लाख रुपये का तरबूज उन्होंने ग्रामीणों को मुफ्त बांट दिया.
अन्य किसानों ने जहां कपास, सोयाबीन और मक्का लगाई थी, वहीं रामेश्वर ने अधिक मुनाफा कमाने के लिए फलों की खेती की ओर रुख किया. उन्होंने देवली गांव में स्थित अपने ढाई एकड़ खेत में सिर्फ तरबूज लगाया. फसल पर लगातार निगरानी, सिंचाई, खाद-बीज और दवाइयों पर करीब 80 हजार रुपये खर्च किए. मेहनत का नतीजा भी दिखा. फसल जब तैयार हुई, तो वह खुशी से फूले नहीं समाए. खेत में तीन से चार किलो तक वजन वाले बड़े और मीठे तरबूज तैयार हुए. उन्हें उम्मीद थी कि इस बार अच्छी कमाई होगी.
व्यापारियों ने दिया ढाई रुपये किलो भाव
जब फसल बाजार में बेचने का समय आया, तो सारी उम्मीदें टूटकर बिखर गईं. जिले के खरगोन, बमनाला, राजपुर, खलघाट और कसरावद क्षेत्र के व्यापारी उपज खरीदने खेत तक पहुंचे लेकिन तरबूज देखकर भाव ऐसा बताया कि किसान के पैरों तले जमीन खिसक गई. व्यापारियों ने महज ढाई रुपये किलो का भाव लगाया. रामेश्वर कुमरावत ने उपज नहीं बेची. उन्होंने कहा कि इतने कम दाम में बेचने से लागत भी नहीं निकलती.
चार लाख रुपये की उपज फ्री में बांट दी
किसान रामेश्वर कुमरावत ने लोकल 18 को बताया कि तरबूज का साइज, वजन और मिठास तीनों अच्छी थी लेकिन अंदर से लाल सुर्ख रंग नहीं होने के कारण व्यापारियों ने कम भाव लगाया जबकि उपज पूरी तरह खाने योग्य और गुणवत्तापूर्ण थी. करीब 200 क्विंटल तरबूज खेत में तैयार था, जिससे उन्हें तीन से चार लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद थी लेकिन बाजार ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. बहरहाल भाव से नाराज और नुकसान से टूट चुके किसान ने फसल बेचने के बजाय गांव में ही मुफ्त बांटने का फैसला लिया. सूचना मिलने पर देखते ही देखते खेत पर ग्रामीणों की भीड़ लग गई. लोग थैले और बोरे भर-भरकर तरबूज ले गए.
किसानों ने सरकार से की मांग
रामेश्वर ओर उनके परिजनों का कहना है कि हमने इसे धर्म का काम समझकर किया. कम से कम फसल बर्बाद होने से तो बच गई. वहीं किसानों का कहना है कि तरबूज जैसी नकदी फसलों में लागत लगातार बढ़ रही है लेकिन बाजार में भाव पूरी तरह व्यापारियों के हाथ में है. सही दाम नहीं मिलने पर किसान मजबूर हो जाता है. उन्होंने शासन और कृषि विभाग से मांग की है कि तरबूज सहित अन्य फल और सब्जी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य या वैकल्पिक बाजार व्यवस्था बनाई जाए ताकि किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर या मुफ्त में बांटने की नौबत न आए.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.