1990 में पहली FIR, 2025 में आखिरी सरेंडर, माओवाद की 35 साल की लड़ाई में बालाघाट ने क्या-क्या खोया?

1990 में पहली FIR, 2025 में आखिरी सरेंडर, माओवाद की 35 साल की लड़ाई में बालाघाट ने क्या-क्या खोया?


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Balaghat naxal history: बालाघाट नक्सल मुक्त हो गया है. आखिरी नक्सली दीपक और उसके साथी रोहित ने सरेंडर कर दिया है. इसी के साथ का एक काला अध्याय भी समाप्त हो गया. लेकिन क्या आपको पता है कि लाल आतंक की लड़ाई में बालाघाट ने क्या खोया? अगर नहीं तो एक नजर में जान लिजिए बालाघाट नक्सल का पूरा इतिहास…

Balaghat Naxal News: मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला 1990 के दशक से लाल आतंक की गढ़ था. लेकिन 2023 के बाद से ही लाल आतंक के पतन की कहानी शुरू हुई और साल 2025 के खत्म होने से पहले ही बालाघाट से नक्सलवाद खत्म हुआ. बालाघाट की पहचान ही नक्सलवाद  बन गई थी. लोग कहते थे ये वहीं जिला है ना जहां माओवादी रहते हैं. नक्सलियों का खौफ इतना था कि ज्वाइनिंग लेटर में बालाघाट लिखा आए, तो लोग नौकरी छोड़ना पसंद करते थे. लेकिन आखिरी नक्सली दीपक और उसके साथ रोहित ने सरेंडर कर दिया. इसी के साथ बालाघाट का एक काला अध्याय भी समाप्त हो गया. आइए जानते हैं पूरी कहानी…

वैसे तो सशस्त्र माओवाद साल 1990 में शुरू हुआ लेकिन उसके सालों पहले ही नक्सलियों ने अपनी जड़ने जमाने का काम शुरू किया. गुपचुप तरीके से आते और इलाके की मैपिंग करते…सर्वे करते की किस तरह बालाघाट में जड़े  जमाई जा सकती है. लोगों को माओवादी संगठन से कैसे जोड़ना है. आपको जानकर हैरानी होगी कि बालाघाट में जिस आखिरी नक्सली दीपक ने सरेंडर किया वह 1986 से ही संगठन में जुड़ गया था. ऐसे में जिले में आए और साल कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिए. इसमें सुरक्षा बलों के कई जवानों शहादत दी, तो माओवादियों ने कई निर्दोष ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी…

1990 में दर्ज पहली एफआईआर
नक्सलियों ने बालाघाट में 1990 से कई पहले ही पांव जमाना शुरु कर दिए थे. लेकिन नक्सलियों पर पहली एफआईआर 1990 में बिरसा थाना में दर्ज हुई थी. इसके अगले साल ही यानी 1991 में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए माओवादियों ने बहेला थाना क्षेत्र के सीतापाला में एक बड़ा IED ब्लास्ट किया था, जिसमें 9 जवानों की मौत हुई थी. यह बालाघाट के नक्सल इतिहास की पहली बड़ी घटना थी. इसके बाद नक्सलियों का खौफ न सिर्फ उस इलाके में व्याप्त हुआ बल्कि पूरे जिले का नाम सुन खौफ खाने लग जाते थे.  इसके बाद नक्सलियों ने कई छोटी-बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया, जिसमें तेंदूपत्ता फड़ जलाना, तो कभी बस सुलगाने जैसी घटनाओं को अंजाम दिया.

बालाघाट में 95 लोगों ने जान गवाई
35 साल तक नक्सलियों के सशस्त्र आंदोलन में बालाघाट के 95 लोगों ने अपनी जान गवाई है. नक्सली हमलों में सुरक्षा बलों के 38 जवानों ने अपनी शहादत दी. तो कई नक्सलियों ने आम लोगों को उनके खिलाफ जाने और मुखबिरी के शक में 57 आम नागरिकों को मौत के घाट उतारा. 19 नवंबर को हॉक फोर्स में पदस्थ इंस्पेक्टर आशीष शर्मा की शहादत हुई थी. वहीं 17 सितंबर को देवेंद्र यादव को नक्सलियों ने पहले उसका अपहरण किया फिर उसकी हत्या कर दी थी.

अब जानिए नक्सलियों पर क्या कार्रवाई हुई
35 सालों की माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षाबलों ने भी समय-समय नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब दिया. 35 सालों में सुरक्षा बलों ने 45 नक्सलियों ढेर किया और 28 को गिरफ्तार किया. लेकिन साल 2019 के बाद माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों को कार्रवाई तेज हो गई, जिसमें 27 से ज्यादा माओवादी बालाघाट रेंज में ढेर हुए.

42 दिनों में खत्म हुआ माओवाद
पुलिस के मुताबिक, बीते 41 दिनों में एमएमसी जोन के 42 नक्सलियों ने अलग-अलग इलाकों में जाकर सरेंडर किया. वहीं, बालाघाट में 13 नक्सलियों ने सरेंडर किया. एंटी नक्सल ऑपरेशन के एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला ने लोकल 18 को बताया कि एमएमसी जोन में कोई नक्सली आ न सके इसके लिए सर्चिंग ऑपरेशन जारी रहेंगे. वहीं, आने वाले दिनों में नक्सल प्रभावित इलाकों में सेनेटाइजेशन होगा. इस दौरान सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ की जाएगी और उनकी निशानदेही पर कार्रवाई की जाएगी. वहीं, जहां विकास की गति रुक गई थी, वहां विकास कार्य किए जाएंगे.

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Dallu Slathia

Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें

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