15 मौतों से पहले फाइल–फाइल खेलते रहे अफसर–नेता: 3 साल पहले पाइपलाइन बदलने की मंजूरी, 10 महीने में होना था काम लेकिन किस–किसने अटकाया – Madhya Pradesh News

15 मौतों से पहले फाइल–फाइल खेलते रहे अफसर–नेता:  3 साल पहले पाइपलाइन बदलने की मंजूरी, 10 महीने में होना था काम लेकिन किस–किसने अटकाया – Madhya Pradesh News


इंदौर के भागीरथपुरा की जिस पाइपलाइन ने 16 लोगों की जान ली, उसे बदलने की प्रक्रिया 3 साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन निगम परिषद की बैठक में पाइप लाइन बदलने का प्रस्ताव मंजूर होने से लेकर लोगों की मौतों तक हर कदम पर अफसर और नेताओं ने लापरवाही बरती। पाइपलाइ

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दूसरे फेज का काम तो तब शुरू हुआ जब भागीरथपुरा में गटर का पानी पीकर लोगों की मौतें होने लगीं। अब नेता इस पूरी लापरवाही के लिए अफसरों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन भास्कर के हाथ में इस फाइल की जो नोटशीट लगी है वो साफ बताती है कि अफसरों के साथ नेता भी उतने ही दोषी हैं।

बता दें कि इसी लापरवाही की चलते शुक्रवार रात सरकार ने नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को हटा दिया है। उन्हें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में उप सचिव के पद पर भेजा गया है। वहीं, एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव को सस्पेंड कर दिया गया है। आखिर किस तरह से टेंडर की ये फाइल कैसे एक टेबल से दूसरे टेबल पर धूल खाती रही… पढ़िए रिपोर्ट

अब सिलसिलेवार जानिए कैसे धूल खाती रही फाइल

पहला चरण: जब 3 महीने तक अपर आयुक्त के कैबिन में रखी रही भागीरथपुरा में समस्या नई नहीं थी। क्षेत्र में दूषित पानी की शिकायतें लगातार मिल रही थीं। मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्कालीन नगर निगम आयुक्त प्रतिभा पाल ने पाइपलाइन बदलने के लिए टेंडर जारी करने की प्रक्रिया शुरू की।

  • जुलाई 2022: भागीरथपुरा टंकी क्षेत्र में 2 करोड़ 40 लाख रुपए की लागत से पाइपलाइन बिछाने का टेंडर जारी हुआ।
  • 25 नवंबर 2022: महापौर परिषद की बैठक में संकल्प क्रमांक 106 के तहत इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई।
  • 23 नवंबर 2022: टेंडर स्वीकृति के लिए निगमायुक्त की ओर से फाइल जलकार्य समिति को भेज दी गई।

यहां तक सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन इसके बाद सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही का खेल शुरू हुआ। जो फाइल सीधे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ी थी, वह महीनों तक सिर्फ कुछ हस्ताक्षरों के लिए भटकती रही।

  • 3 फरवरी 2023: लगभग ढाई महीने बाद फाइल पर अपर आयुक्त के हस्ताक्षर हुए।
  • 6 फरवरी 2023: महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने फाइल पर हस्ताक्षर किए।

यानी, एक बेहद जरूरी काम की फाइल लगभग तीन महीने तक सिर्फ दस्तखत के इंतजार में पड़ी रही। सवाल उठता है कि जब मामला इतना गंभीर था, तो फाइल को इतने लंबे समय तक क्यों रोका गया? वहीं हस्ताक्षर होने के बाद वर्क ऑर्डर तो जारी कर दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद भी यह पाइपलाइन आज तक पूरी नहीं बिछ सकी है।

इस देरी पर जब सवाल उठे, तो महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सफाई देते हुए कहा, ‘इस टेंडर में सिर्फ एक ही निविदाकर्ता, मालवा इंजीनियर्स, सामने आया था। उसका पिछला काम संतोषजनक नहीं था, इसलिए टेंडर का परीक्षण करना जरूरी था। इसी वजह से हस्ताक्षर करने में समय लग सकता है।’

दूसरा चरण: 24 घंटे में दौड़ी फाइल अगर पहले चरण की कहानी प्रशासनिक सुस्ती को दिखाती है, तो दूसरे चरण की कहानी सिस्टम के क्रूर चेहरे को उजागर करती है, जो सिर्फ मौतों के बाद ही जागता है। दूसरे चरण में पाइपलाइन को बिछाने की फाइल 12 नवंबर 2024 को ही तैयार कर ली गई थी, लेकिन इस पर कोई तेजी नहीं दिखाई गई।

  • 8 अगस्त 2025: लगभग नौ महीने बाद टेंडर जारी किया गया।
  • 17 सितंबर 2025: टेंडर खोलने की तारीख तय थी, लेकिन न तो टेंडर खोले गए और न ही काम शुरू करने के कोई निर्देश दिए गए।

तकरीबन 2.40 करोड़ रुपए के इस टेंडर की फाइल महीनों तक अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया की मेज पर अटकी रही। इस पूरी अवधि के दौरान, भागीरथपुरा के नलों से गंदा और बदबूदार पानी आता रहा। लोग शिकायतें करते रहे, लेकिन उनकी आवाजें दफ्तरों की मोटी दीवारों से टकराकर लौट आती रहीं।

इसके बाद वह हुआ जिसका डर था। दूषित पानी ने अपना कहर बरपाना शुरू कर दिया। सिर्फ तीन दिनों के भीतर नौ लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए। शहर में हड़कंप मच गया और मामला मीडिया की सुर्खियों में आ गया। लोगों की मौतों ने जो काम महीनों में नहीं हो सका, उसे घंटों में कर दिया।

30 दिसंबर 2025: अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया ने उसी फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए, जो लगभग आठ महीने से उनकी मेज पर धूल फांक रही थी।

अगले ही दिन: टेंडर खोल दिया गया और ठेकेदार को वर्क ऑर्डर जारी करने की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई। यानी अफसरों के लिए फाइल की इंपोर्टेंस इंसानी जान से ज्यादा थी। जो काम आठ महीने में नहीं हुआ वो 24 घंटे में कैसे पूरा हो गया?

क्या कहते हैं तकनीकी कारण और वर्तमान स्थिति? नगर निगम के निलंबित कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव ने बताया कि भागीरथपुरा में पानी की पाइपलाइन 1998 में, यानी 27 साल पहले बिछाई गई थी। सामान्य तौर पर एक पाइपलाइन 30-35 साल तक चल सकती है, और आजकल इस्तेमाल होने वाली HDPE (प्लास्टिक) पाइपलाइन तो 100 साल तक भी खराब नहीं होती, अगर उसे कोई नुकसान न पहुंचे।

समस्या तब शुरू हुई जब शहर में सड़क, सीवर लाइन और अन्य यूटिलिटी कार्यों के लिए बार-बार खुदाई हुई। इस खुदाई के दौरान पुरानी पाइपलाइनों में छेद हो गए, जिनका तुरंत पता नहीं चल सका। इन्हीं छेदों से ड्रेनेज का गंदा पानी पीने के पानी की लाइन में मिलने लगा और धीरे-धीरे यह एक गंभीर समस्या बन गया।

इस नोटशीट में लगी सरकारी सील और तारीख से लापरवाही का पता चलता है।

इस नोटशीट में लगी सरकारी सील और तारीख से लापरवाही का पता चलता है।

प्रशासनिक खींचतान और कार्रवाई इस पूरी त्रासदी ने नगर निगम के भीतर चल रही खींचतान को भी उजागर कर दिया है। गुरुवार, 1 जनवरी को हुई एक बैठक में महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के सामने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “अधिकारी सुनते नहीं हैं। मैं ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता। आप चाहें तो यह संदेश मुख्यमंत्री तक पहुंचा दें।”

वहीं, क्षेत्र के पार्षद कमल वाघेला ने देरी का कारण “पिछले सालों में इन्फ्रास्ट्रक्चर का कोलेप्स होना” बताया और कहा कि उन्होंने नगर निगम में कई बार लिखकर दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए और चौतरफा दबाव के बाद प्रशासन ने कुछ कदम उठाए हैं

  • रोहित सिसोनिया (अपर आयुक्त): उन्हें पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। इसके बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। जल आपूर्ति विभाग समेत कई महत्वपूर्ण विभाग उन्हीं के पास थे।
  • संजीव श्रीवास्तव (कार्यपालक अभियंता): इनसे पहले जल वितरण विभाग का प्रभार वापस ले लिया और बाद में उन्हें सस्पेंड कर दिआ।



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