हम और आप जब ब्लड टेस्ट कराते हैं, तो रिपोर्ट में जो ‘नॉर्मल रेंज’ दिखती है, वह ज्यादातर पश्चिमी देशों के लोगों पर आधारित होती है। यानी यूरोप-अमेरिका के खान-पान, बॉडी और जेनेटिक्स के हिसाब से तय की गई रेंज। लेकिन भारत में रहने वाले बच्चों और बड़ों की
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एम्स भोपाल में आयोजित चौथे रिसर्च डे कार्यक्रम में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने कहा कि देशभर से व्यापक डेटा इकट्ठा किया जा रहा है, जिसमें उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व के लोग शामिल हैं, ताकि सही मायने में “भारतीय नॉर्मल रेंज” तय की जा सके। भारत में जेनेटिक्स, खान-पान, मौसम, संस्कृति और लाइफस्टाइल सब अलग हैं, इसलिए हमारे बच्चों और वयस्कों के लिए अलग मेडिकल पैटर्न बनते हैं।
एम्स भोपाल में मंगलवार को चौथा रिसर्च डे आयोजित हुआ।
इलाज नहीं, रिसर्च आधारित समाधान ढूंढने पर फोकस कार्यक्रम में यह भी सामने आया कि भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था अब इलाज-केंद्रित नहीं रहेगी, बल्कि रिसर्च आधारित समाधान की ओर बढ़ेगी। ICMR ने देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखकर 12 से 15 रिसर्च प्राथमिकताएं तय की हैं। जिनमें टीबी, एनीमिया, कुपोषण, नवजात मौतें, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कैंसर शामिल हैं। इन पर पांच बड़े राष्ट्रीय रिसर्च चल रहे हैं और आने वाले समय में इनका असर सरकारी नीतियों में दिखाई देगा। अब रिसर्च सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दूर के गांवों और कमजोर आबादी तक पहुंचेगी।
इसमें टीबी की पहचान को तेज करने के लिए हैंड-हेल्ड एक्स-रे और एआई आधारित टूल बनाए जा रहे हैं। एनीमिया की समस्या को “साइलेंट संकट” बताते हुए लक्ष्य रखा गया है कि इसे 50% से घटाकर 20% किया जाए। नवजात मौतों को कम करने के लिए जन्म के शुरुआती घंटों पर फोकस किया जा रहा है। कुपोषण के खिलाफ जीवनचक्र आधारित मॉडल तैयार हो रहे हैं, जिसमें मां से लेकर बच्चे तक हर पड़ाव को सुधारने की बात है।

देशभर से डॉक्टर, शोधकर्ता और वैज्ञानिक एम्स भोपाल पहुंचे।
लैब से समाज तक पहुंचे रिसर्च एम्स भोपाल में मंगलवार को चौथा रिसर्च डे आयोजित हुआ, जिसमें देशभर से डॉक्टर, शोधकर्ता और वैज्ञानिक पहुंचे। कार्यक्रम का मुख्य विषय “Translating Thought to Impact” था। यानी शोध को समाज पर असर पैदा करने तक पहुंचाना। कार्यक्रम में डॉ. राजीव बहल मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। उनके साथ गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के एडिटर-इन-चीफ डॉ. पीयूष गुप्ता भी मौजूद थे। एम्स भोपाल की तरफ से निदेशक डॉ. माधवानंद कर, डीन एकेडमिक्स डॉ. रजनीश जोशी, डीन रिसर्च डॉ. रेहान-उल-हक और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता उपस्थित रहे।
यह आयोजन दिखाता है कि एम्स भोपाल अब सिर्फ इलाज करने वाला संस्थान नहीं रहा, बल्कि रिसर्च और नीति निर्माण का केंद्र बनता जा रहा है। डॉ. बहल ने बताया कि देशभर में जो कुल रिसर्च प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनमें से लगभग एक प्रतिशत अकेले एम्स भोपाल में हो रहा है। यह संख्या देखने में छोटी लगती है, लेकिन संस्थान के आकार और उम्र को देखते हुए यह बड़ी उपलब्धि है।
केवल एक प्रतिशत फंड एम्स भोपाल को मिल रहा डॉ. बहल ने कहा कि उनके पास जो कुल रिसर्च फंड है, उसमें से एम्स भोपाल फिलहाल केवल एक प्रतिशत ले पा रहा है, जबकि दिल्ली एम्स की क्षमता 12 प्रतिशत से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि अगर भोपाल एम्स रिसर्च और बढ़ाए और अच्छे प्रोजेक्ट भेजे, तो यह अनुपात आसानी से दोगुना हो सकता है।
पेटेंट और छात्र को मिल सम्मान कार्यक्रम में कई वैज्ञानिक सत्र हुए, जिनमें रिसर्च नैतिकता, युवा वैज्ञानिक निर्माण, पीएचडी रिसर्च और 3D बायो-प्रिंटिंग जैसे विषयों पर बातचीत हुई। रिसर्च शोकेस भी सजाया गया, जिसमें सबसे ज्यादा पेटेंटेड प्रोजेक्ट एम्स के डेंटल विभाग से थे। दंत रोग विशेषज्ञों ने बताया कि उनके कई इनोवेशन भारत सरकार से पेटेंट ले चुके हैं और आगे चलकर देश की जनता के लिए सस्ते विकल्प बनेंगे। कार्यक्रम में पीजी और यूजी छात्रों को उनके शोध के लिए गोल्ड मेडल और सम्मान दिया गया।
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एम्स भोपाल से उड़ान भरेगी एयर एम्बुलेंस’

अब एम्स भोपाल से ही एयर एम्बुलेंस के लैंड और टेकऑफ कराने की तैयारी चल रही है। इसे लेकर संस्थान में हेलीपैड बनाने का प्रस्ताव सोमवार को भारत सरकारी की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (SFC) में रखा गया है। इसके अलावा 200 बेड का कैंसर अस्पताल (ऑन्कोलॉजी सेंटर), 150 बेड का अपेक्स ट्रॉमा सेंटर, यूरोलॉजी विभाग में रोबोटिक सर्जिकल सिस्टम और वर्चुअल ऑटोप्सी जैसे प्रोजेक्ट की डिटेल प्रेजेंटेशन भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने दी। पूरी खबर पढ़ें