सतना. मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शासकीय विद्यालयों में पारदर्शिता और उपस्थिति की निगरानी के उद्देश्य से शुरू किया गया ई-अटेंडेंस सिस्टम प्रदेश भर में शिक्षकों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनता जा रहा है. हालात यह हैं कि बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंचने वाले शिक्षक सबसे पहले मोबाइल फोन और नेटवर्क की तलाश में जुट जाते हैं. कई बार सर्वर डाउन रहने के कारण घंटों तक उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाती, जिससे शिक्षकों को अनुपस्थित मान लिया जाता है और वेतन कटौती या वेतन रोकने जैसी कार्रवाई का डर बना रहता है. जिले के कई शासकीय विद्यालयों में शिक्षक ई-अटेंडेंस लगाने के लिए स्कूल की बाउंड्री पर चढ़ते या इधर-उधर नेटवर्क ढूंढते नजर आते हैं. खासकर पहाड़ी और दूरस्थ अंचलों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां नेटवर्क लगभग शून्य है. ऐसे में शिक्षक समय पर स्कूल पहुंचने के बावजूद उपस्थिति दर्ज नहीं कर पाते और पूरा दिन मानसिक तनाव में गुजरता है. ऐसे में शिक्षकों का कहना है कि पढ़ाने से ज्यादा समय ई-अटेंडेंस लगाने में बर्बाद हो जाता है.
राज्य शिक्षक संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष और जिला अध्यक्ष शैलेंद्र त्रिपाठी ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि ई-अटेंडेंस ऐप की सबसे बड़ी खामी उसका बार-बार सर्वर डाउन होना है. कई बार सुबह 11 बजे तक भी अटेंडेंस नहीं लग पाती, तो कभी दोपहर 2:30 बजे जाकर उपस्थिति दर्ज होती है. लॉगिन और लॉगआउट की समस्या इतनी जटिल है कि पांच घंटे बाद लॉगआउट होता है और इस तकनीकी अव्यवस्था का सीधा असर शिक्षण व्यवस्था पर पड़ रहा है.
वेतन कटौती और रुकी तनख्वाह से नाराजगी
उनका आरोप है कि ई-अटेंडेंस न लगने पर उन्हें अनुपस्थित मान लिया जाता है और वेतन रोक दिया जाता है. उनके खुद का वेतन पिछले दो महीनों से रुका हुआ है. प्रदेश में बहुत कम शिक्षक ऐसे हैं, जिन्हें पूरे 30 दिन का वेतन मिल पाता है, बाकी अधिकांश शिक्षक कटौती की मार झेल रहे हैं. अतिथि शिक्षकों को भी ई-अटेंडेंस 3.0 से जोड़ दिया गया है, जिससे उनकी परेशानियां और बढ़ गई हैं. उन्हें शनिवार को छुट्टी नहीं मिल पाती और अगर किसी कारण से छुट्टी दर्ज हो जाए, तो रविवार का वेतन भी कट जाता है.
छुट्टियों पर भी वेतन कटने का डर
शिक्षक संघ का आरोप है कि इससे शिक्षकों में असंतोष बढ़ रहा है. उनका कहना है कि प्रशासन के पास शिक्षकों के कार्य मूल्यांकन के लिए कई अन्य व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं, केवल ई-अटेंडेंस के आधार पर कार्यक्षमता का आकलन करना उचित नहीं है. शिक्षकों का मानना है कि ई-अटेंडेंस की इस अव्यवस्थित प्रणाली का दुष्प्रभाव बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा परिणाम पर भी पड़ सकता है. पहला और आखिरी पीरियड अक्सर अटेंडेंस लगाने में निकल जाता है, जिससे कक्षा संचालन प्रभावित होता है. लगातार तनाव में रहने से शिक्षक अपनी पूरी क्षमता के साथ पढ़ा नहीं पा रहे हैं, जिसका असर छात्रों की सीखने की प्रक्रिया पर पड़ना तय है.
शैलेंद्र त्रिपाठी ने ई-अटेंडेंस ऐप के निर्माण और संचालन को लेकर भी सवाल उठाए हैं. कभी इसे अमेरिका के न्यूयॉर्क में बनी ऐप बताया गया, फिर किसी अन्य स्थान का नाम सामने आया और अब कहा जा रहा है कि यह बॉम्बे की किसी कंपनी की है. ऐसे में ऐप का प्रोपराइटर कौन है, इसपर स्पष्टता नहीं है. साथ ही शिक्षकों को अपने निजी मोबाइल से ऐप चलाने, डेटा और लोकेशन साझा करने को लेकर भी आपत्ति है. ई-अटेंडेंस ऐप के लिए 5G या एंड्रॉयड स्मार्टफोन की अनिवार्यता भी शिक्षकों के लिए समस्या बन गई है. कई वरिष्ठ शिक्षक अब भी कीपैड फोन का उपयोग करते हैं जबकि जिनके पास आईफोन है, उन्हें भी एंड्रॉयड फोन खरीदने की मजबूरी है क्योंकि यह ऐप आईओएस पर काम नहीं करता.
शिक्षा अधिकारी ने मानी तकनीकी दिक्कत
इस पूरे मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी ने ई-अटेंडेंस में तकनीकी समस्या को स्वीकार किया है. उन्होंने लोकल 18 से कहा कि सर्वर और नेटवर्क से जुड़ी दिक्कतों की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को पत्राचार के माध्यम से दी जाएगी ताकि समाधान निकाला जा सके.
राज्य शिक्षक संघ ने मांग की है कि जब तक ई-अटेंडेंस की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो जाता, तब तक इस व्यवस्था को स्थगित किया जाए. संघ का कहना है कि यदि उपस्थिति दर्ज करनी ही है, तो इसे एनआईसी या बायोमैट्रिक सिस्टम के माध्यम से की जाए ताकि शिक्षकों को सुविधा मिले न कि परेशानी. फिलहाल सतना सहित प्रदेश के कई जिलों में ई-अटेंडेंस शिक्षकों के लिए सुविधा से ज्यादा असुविधा बनती नजर आ रही है.