भारत भवन में आदिवासी परंपरा की झलक: लाल चींटियों से बनी चटनी ने भोपालियों को चौंकाया; किताबों के बीच बस्तर का जायका – Bhopal News

भारत भवन में आदिवासी परंपरा की झलक:  लाल चींटियों से बनी चटनी ने भोपालियों को चौंकाया; किताबों के बीच बस्तर का जायका – Bhopal News


भोपाल के भारत भवन में चल रहे लिटरेचर फेस्ट में इस बार किताबों और विचारों के साथ आदिवासी खान-पान और पारंपरिक ज्ञान भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से आए आदिवासी समूह यहां एक अनोखी और परंपरागत डिश लेकर पहुंचे हैं। चापड़ा चटनी, ज

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बस्तर से आए सूरज ने बताया कि चापड़ा दरअसल रेड एंट्स को कहा जाता है, जो महुआ के पेड़ों की पत्तियों को जोड़कर ऊंचाई पर अपने घोंसले बनाती हैं। इन्हीं घोंसलों और चींटियों को सुखाकर पारंपरिक तरीके से चटनी बनाई जाती है। यह डिश सदियों से बस्तर और छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी समुदायों के भोजन का हिस्सा रही है।

सूखे के दौर में सहारा बना चापड़ा

आदिवासी प्रतिनिधियों के मुताबिक, पुराने समय में जब क्षेत्र में सूखा पड़ता था और भोजन की कमी होती थी, तब महुआ और चापड़ा ने लोगों को जीवित रखा। यही कारण है कि यह धीरे-धीरे आदिवासी संस्कृति और परंपरा में शामिल हो गया। यह ज्ञान कहीं लिखित रूप में दर्ज नहीं है, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी बातचीत और सामुदायिक जीवन के जरिए आगे बढ़ा है।

5 से 10 मिनट में चटनी तैयार हो जाती है।

इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में पहचान चापड़ा चटनी को लेकर आदिवासी समुदायों का दावा है कि इसमें फॉर्मिक एसिड पाया जाता है, जो एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों वाला होता है। इसका स्वाद खट्टा और तीखा होता है, जिसे सिट्रिक एसिड जैसा बताया जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार, यह इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करती है। कोरोना काल के दौरान, जब कई इलाकों में वैक्सीन नहीं पहुंच पाई थी, तब आदिवासी समुदायों ने चापड़ा चटनी और चावल से बने पेय ‘पेच’ का सेवन कर खुद को स्वस्थ रखा।

5 से 10 मिनट में तैयार होती है चटनी चापड़ा चटनी बनाने वाले चेतन लाल नाग बताते हैं कि इसे तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगता। सूखी चींटियों को धनिया, हरी मिर्च, नमक, अदरक और लहसुन के साथ कूटकर पत्थर पर घिसा जाता है। जंगल में यह काम पारंपरिक तौर पर पत्थरों की मदद से किया जाता है। 5 से 10 मिनट में चटनी तैयार हो जाती है और यह रेडी टू ईट होती है।

सूखी चींटियों को धनिया, हरी मिर्च, नमक, अदरक और लहसुन के साथ कूटकर पत्थर पर घिसकर चटनी बनाई जाती है।

सूखी चींटियों को धनिया, हरी मिर्च, नमक, अदरक और लहसुन के साथ कूटकर पत्थर पर घिसकर चटनी बनाई जाती है।

लंबी शेल्फ लाइफ, कहीं भी ले जाने योग्य ड्राई किए जाने के बाद चापड़ा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। इसे यात्रा में साथ ले जाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है। बस्तर से आए समूह इसे चार-पांच दिन पहले सुखाकर भोपाल लाए हैं और फेस्ट के दौरान लगातार लोगों को चखाया जा रहा है।

भोपालियों की मिली-जुली प्रतिक्रिया फेस्ट में आने वाले नॉन-वेजिटेरियन दर्शकों ने इसे चखा और स्वाद को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। लोगों ने इसे स्पाइसी और खट्टा बताते हुए ‘अमेजिंग’ कहा। वहीं, वेजिटेरियन दर्शक इस डिश को देखकर हैरान नजर आए कि चींटियों से भी भोजन बनाया जाता है। कई लोगों के लिए यह एक बिल्कुल नया अनुभव रहा।

खतरनाक दिखती हैं, लेकिन नुकसानदेह नहीं चापड़ा को इकट्ठा करना आसान नहीं होता। ये चींटियां तेज काटती हैं और इनके घोंसले पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर होते हैं। इसके बावजूद आदिवासी समुदायों का कहना है कि इनके काटने से कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, सर्दी-जुकाम में इसकी खुशबू भी राहत देती है।



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