एक्‍सक्‍लूसिव: पीले दांत, कमजोर हड्डियां और नहीं हो रही शादियां, खंडवा में फ्लोराइड का जहर

एक्‍सक्‍लूसिव: पीले दांत, कमजोर हड्डियां और नहीं हो रही शादियां, खंडवा में फ्लोराइड का जहर


खंडवा.  इंदौर में जहरीले पानी से 21 लोगों की मौत की घटनाओं के बाद अब मध्य प्रदेश के खंडवा जिले से एक और डराने वाली तस्वीर सामने आई है. जिले के आखिरी छोर पर बसे किल्लौद ब्लॉक के 7 गांवों में लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि बच्चों के दांत पीले पड़ चुके हैं, हड्डियों में जकड़न आ रही है और युवाओं को कम उम्र में शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इसी पीड़ा को लेकर सोमवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण और बच्चे एक बार फिर जिला मुख्यालय पहुंचे और कलेक्टर कार्यालय में अपनी शिकायत दी. लोगों का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो खंडवा में भी इंदौर जैसी स्थिति बन सकती है.

ग्रामीणों का दर्द सिर्फ बीमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उनके सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा है. बच्चों को पीले और तिरछे दांतों की समस्‍या आ चुकी है. वहीं युवाओं का कहना है कि फ्लोराइड प्रभावित गांव का नाम सुनते ही शादी के रिश्ते टूट जाते हैं. लोग डर के साए में जी रहे हैं, क्योंकि पीने के लिए उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. नल-जल योजना के तहत एक ही बोरवेल से पूरे गांव को पानी दिया जा रहा है और उसी पानी में फ्लोराइड की मात्रा तय मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई है. यही वजह है कि ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से तुरंत सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की है.

किल्लौद ब्लॉक के गांवों में बढ़ता खतरा
खंडवा जिले के किल्लौद ब्लॉक के कई गांवों में पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा 2.0 से 5.0 पीपीएम तक पाई गई है. जबकि सरकारी मानक के अनुसार यह 1.5 पीपीएम से अधिक नहीं होनी चाहिए. लंबे समय से इसी पानी के इस्तेमाल के कारण अब इसके दुष्परिणाम साफ दिखने लगे हैं.

बच्चों और युवाओं पर असर
ग्रामीणों के अनुसार बच्चों के दांत पीले पड़ रहे हैं. कई बच्चों के दांतों में गैप आ गया है. हाथ-पैरों में जकड़न, जोड़ों में दर्द और हड्डियों से जुड़ी समस्याएं आम हो गई हैं. युवाओं का कहना है कि शारीरिक कमजोरी बढ़ रही है और इसी वजह से शादी के रिश्ते नहीं हो पा रहे हैं.

कलेक्टर कार्यालय पहुंचे बच्‍चे, युवा और ग्रामीण
प्रभावित गांवों के ग्रामीण और बच्चे कलेक्टर कार्यालय पहुंचे. उन्होंने ज्ञापन सौंपकर शुद्ध पेयजल की मांग की. ग्रामीणों का आरोप है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने दूषित जल स्रोतों की पहचान तो की, लेकिन समय पर उन्हें बंद नहीं किया गया.

ग्रामीणों की मुख्य शिकायतें  

  • बच्चों के दांत पीले पड़ना और हड्डियों की कमजोरी.
  • युवाओं में शारीरिक समस्याएं और शादी में आ रही दिक्कतें.
  • नल-जल योजना में सिर्फ एक ही बोरवेल पर निर्भरता.
  • वैकल्पिक शुद्ध पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं.

फ्लोराइड की मात्रा और सरकारी मानक 

  • सुरक्षित सीमा – 1.5 पीपीएम तक.
  • प्रभावित गांवों में पाई गई मात्रा – 2.0 से 5.0 पीपीएम.
  • सबसे ज्यादा असर – गहरे ट्यूबवेल से निकलने वाले पानी में.

प्रशासन से कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं 
गांव के युवा जितेंद्र देवड़ा ने कहा कि हमारे गांव की हालत देखकर कोई भी अपनी बेटी यहां देने को तैयार नहीं है. प्रशासन को कई बार शिकायत की, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई. वहीं, बजरंग राजपूत नाम के बालक ने बताया कि जुलाई में भी जनसुनवाई में शिकायत की थी, लेकिन गांव में कोई टीम नहीं पहुंची. स्‍कूली बच्‍चे ने अपने पीले दांत दिखाते हुए बताया कि दांत कमजोर हैं और पूरे गांव के बच्‍चों को यही शिकायत है, ढंग से खाना चबाने में दिक्‍कत आती है. दांतों में गैप आ चुका है. दांत तिरछे हो चुके हैं. गांव में सरकारी मदद नहीं मिल रही है. अभी तक कोई मेडिकल चेकअप या डॉक्‍टर नहीं पहुंचा है.

राजनीति भी हुई तेज, विधायक ने सवालों से मुंह चुराया 
मामले पर राजनीति भी शुरू हो गई है. कांग्रेस ने प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं और मांधाता विधायक नारायण पटेल को घेरा है. कांग्रेस का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो बड़ा हादसा हो सकता है. वहीं विधायक नारायण पटेल ने कहा कि कलेक्टर ने मामले पर ध्यान दिया है और जल्द ही व्यवस्था सुधारी जाएगी. हालांकि विधायक से जब मीडिया ने फ्लोराइट वाले पानी और उससे हो रही समस्‍याओं पर सवाल किए तो उन्‍होंने सीधे जवाब नहीं दिया. उन्‍होंंने मीडिया से कहा पहले खाना खा लेते हैं.

कलेक्‍टर ने दिए सरकारी आदेश, कब पहुंचेगी मदद, हो रहा है इंतजार 
कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने माना कि किल्लौद ब्लॉक के कुछ गांवों में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा पाई गई है. उन्होंने बताया कि जिन ट्यूबवेल में फ्लोराइड अधिक है, वहां लाल निशान लगाए गए हैं और मोटर निकालने को कहा गया है. उथले जल स्रोत और कुओं का पानी सुरक्षित बताया गया है. साथ ही नए कुएं खोदने, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और हेल्थ कैंप लगाने के निर्देश दिए गए हैं. हालांकि कलेक्‍टर ने यह नहीं बताया कि जुलाई में की गई शिकायत के बाद कार्रवाई क्‍यों नहीं हुई? प्रशासन की लापरवाही और गांव के हालात के लिए जिम्‍मेदा कौन है?  फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तक वैकल्पिक शुद्ध पानी की स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक इन गांवों के लोग कैसे सुरक्षित रहेंगे. इंदौर की घटना के बाद खंडवा प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि हालात बिगड़ने से पहले ठोस और स्थायी समाधान किया जाए.



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