नमामि गंगे परियोजना में चंबल में व्यापक शोध और निगरानी कार्य हो रहा है। त्रि-राज्यीय निगम बनाने की कोशिश की जा रही है और अगले महीने से नया सर्वेक्षण शुरू होगा। मध्य प्रदेश वन विभाग जल्द ही गांधी सागर अभयारण्य में स्याहगोश पर आधारित विशेष प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। भारत में 75 फीसदी जंगल कैट्स बची हैं और दक्षिण एशिया इनका प्रमुख गढ़ है, इसलिए इन्हें पहचानना और बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में 50 से कम जंगली भैंस बचे हैं, जबकि उत्तर-पूर्व में लगभग 4000 हैं। यह जानकारी पर्यावरण परिसर भोपाल में सेंट्रल इंडिया में पाई जाने वाली लेसर नोन स्पीशीज पर आधारित चौथी राष्ट्रीय संगोष्ठी में दी गई। इसमें एमपी के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वीएन अम्बाड़े ने कहा कि लेसर नोन में न केवल पशु वर्ग पर बात होनी चाहिए, बल्कि इसके साथ ही फ्लोरा पर भी चर्चा आवश्यक है। उन्होंने विकास कार्यों के दौरान घोंसले युक्त पेड़ों को हटाने में संबंधित पक्षी को नुकसान न हो, इसके लिए डीसीएफ की निगरानी में ही पेड़ काटने या हटाने पर जोर दिया। पर्यावरण परिसर भोपाल में सेंट्रल इंडिया में पाई जाने वाली लेसर नोन स्पीशीज पर आधारित चौथी राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सम्मेलन का उद्घाटन मध्यप्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख वीएन अम्बाड़े, चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन, मध्यप्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अजय यादव एवं भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ के रविचंद्रन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। स्याहगोश के लिए गांधी सागर में विशेष प्रोजेक्ट
चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने कहा कि लेसर फ्लोरिकन और गोडावण का गायब होना हमारी नाकामियों में से एक है। पिछले मानसून में लेसर फ्लोरिकन पर किए गए सर्वे के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं थे। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश वन विभाग जल्द ही गांधी सागर अभयारण्य में स्याहगोश पर आधारित विशेष प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। मध्यप्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अजय यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश में कई प्रजातियां हैं जो संकटग्रस्त हैं। उन्होंने बताया कि बहुत सी प्रजातियों के बारे में यह पता नहीं है कि उनकी वर्तमान स्थिति क्या है और उनके आवास को क्या खतरा है। घड़ियाल संरक्षण के 50 वर्ष पूर्ण सम्मेलन के तकनीकी सत्र में भारत के क्रोकोडाइल संरक्षण प्रोजेक्ट के 50 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। वन्यजीव जीवविज्ञानी बीसी चौधरी ने कहा कि राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य एक आदर्श मॉडल है जिसे अन्य राज्यों को विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए अपनाना चाहिए। पैनल चर्चा में तरुण नायर ने कहा कि मानव-प्रधान क्षेत्रों में आवास की समस्या गंभीर है। सुहास कुमार ने बताया कि उन्होंने 2008 में वन्यजीव प्रभाग बनाने का प्रस्ताव दिया था और आवास की समस्याओं को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता है। ऋषिकेश शर्मा ने कि चंबल एरिया में वर्तमान में 2462 घड़ियाल हैं और कई दुर्लभ प्रजातियों के कछुए भी पाए जाते हैं। आर श्रीनिवास मूर्ति ने अपनी मुरैना में पोस्टिंग के दौरान के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने चंबल के लिए एक व्यापक प्रबंधन योजना तैयार की थी। उन्होंने बताया कि चंबल में गंगा डॉल्फिन की भी अच्छी संख्या है। त्रि-राज्यीय निगम बनाने की तैयारी
शुभरंजन सेन ने बताया कि नमामि गंगे परियोजना में चंबल में व्यापक शोध और निगरानी कार्य हो रहा है। त्रि-राज्यीय निगम बनाने की कोशिश की जा रही है और अगले महीने से नया सर्वेक्षण शुरू होगा। उन्होंने कहा कि खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों से घड़ियालों के घोंसलों की रक्षा करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। कच्छ में छोटे मांसाहारी जीवों पर अध्ययन
तकनीकी सत्रों में भारतीय वन्यजीव संस्थान की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. शोमिता मुखर्जी ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र में छोटे आकार के मांसाहारी जीवों पर स्टडी पेश की। उन्होंने बताया कि नवंबर 2023 से मार्च 2024 तक 67 स्थानों पर इंफ्रारेड कैमरा ट्रैप लगाकर पांच व्यापक सर्वेक्षण किए गए। उनकी फील्ड स्टडी में सबसे अधिक गोल्डन जैकल दिखे, जबकि जंगली बिल्ली, अफ्रो-एशियाटिक वाइल्ड कैट और इंडियन ग्रे मंगूज की महत्वपूर्ण उपस्थिति भी दर्ज की गई।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में 75 फीसदी जंगल कैट्स बची हैं और दक्षिण एशिया इनका प्रमुख गढ़ है, इसलिए इन्हें पहचानना और बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। कैरेकल भारत में स्वाभाविक रूप से दुर्लभ है क्योंकि यहां उसका उपयुक्त प्राकृतिक आवास सीमित है, और खराब भूमि नीति इसके लिए बड़ा खतरा है। पांच कैट प्रजातियों सहित अन्य कार्निवोर वेस्टलैंड में मौजूद हैं, इसलिए नीतिगत स्तर पर वेस्टलैंड के संरक्षण को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। हिल मैना से लेकर जुगनू पर भी प्रस्तुति डॉ. राजत भार्गव ने हिल मैना पर अपना शोध साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने अपना काम शुरू किया था तब यह प्रजाति लगभग विलुप्त हो चुकी थी, लेकिन अब जंगल में 200-300 पक्षी हैं। उन्होंने कहा कि यदि आप आवास पर काम करते हैं तो पक्षी वापस आ जाते हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्रा ने मध्य भारत के जंगली भैंसों पर बताया कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में 50 से कम जंगली भैंस बचे हैं, जबकि उत्तर-पूर्व में लगभग 4000 हैं। सत्र की अध्यक्षता असद रहमानी ने की और उन्होंने कहा कि घास भूमि में रहने वाले जीव सबसे अधिक खतरे में हैं। उन्होंने सभी प्रजातियों को सम्मान देने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि गौर को इसलिए पुनः स्थापित करना चाहिए क्योंकि वह गौर है, न कि केवल इसलिए कि वह बाघ या चीते का शिकार है। यह सम्मेलन सोसाइटी ऑफ नेचर हीलर्स, कंजर्वेटर एंड लोकल टूरिज्म डेवलपमेंट (एसएनएचसी) द्वारा आयोजित किया गया है और इसमें देशभर के प्रमुख वन्यजीव विशेषज्ञ, शोधकर्ता और संरक्षणवादी शामिल हो रहे हैं। यह तीन दिवसीय आयोजन है। कार्यक्रम के दूसरे दिन नदियों के इकोसिस्टम को ठीक करने और हेल्दी एनवायरनमेंट बनाए रखने में लोकल कम्युनिटी की जरूरी भूमिका पर चर्चा की जाएगी।
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