सतना. ग्रामीण भारत में पशुपालन सिर्फ आजीविका नहीं बल्कि अनुभव और परंपराओं से जुड़ा विज्ञान भी है. जब किसी गाय या भैंस का बछड़ा जन्म के तुरंत बाद मर जाता है, तो पशुपालक के सामने दोहरी परेशानी खड़ी हो जाती है. एक ओर नवजात की मौत का दुख और दूसरी ओर दूध बंद हो जाने का आर्थिक संकट. ऐसे में गांवों में आज भी एक पुराना लेकिन बेहद असरदार देसी जुगाड़ चर्चा में है, जिसमें किसान भूसे से आर्टिफिशियल बछड़ा बनाकर गाय को उसके ही बच्चे का अहसास कराते हैं और आश्चर्यजनक रूप से गाय फिर से दूध देने लगती है.
पुराने समय में पशुओं के बच्चों की अचानक मौत के बाद दूध सूख जाना आम समस्या थी. उस दौर में न तो आधुनिक दवाइयां आसानी से उपलब्ध थीं और न ही पशु चिकित्सालय हर गांव तक पहुंचते थे. ऐसे में किसानों और पशुपालकों ने अपने अनुभव के आधार पर यह तरीका विकसित किया. मृत बछड़े के बाद किसान भूसे, लकड़ी और मृत बच्चे के वेस्ट से एक ढांचा तैयार करते थे जिसे बछड़े का रूप दिया जाता था. इसे देखकर और सूंघकर गाय को अपने बच्चे का अहसास होता और उसका दूध उतरने लगता था. आज भले ही तकनीक आगे बढ़ गई हो लेकिन यह देसी उपाय अब भी कई गांवों में कारगर साबित हो रहा है.
एक्सपर्ट ने समझाई पूरी बात
लोकल 18 से बातचीत में मध्य प्रदेश के सतना के प्रभारी जिला पशु चिकित्सालय के डॉक्टर बृहस्पति भारती ने बताया कि पशुपालक आमतौर पर अपने पशुओं की प्रेग्नेंसी अवधि याद रखते हैं. कई बार यह अवधि पांच–छह दिन आगे-पीछे हो सकती है लेकिन अगर गर्भ में ही बच्चा खत्म हो जाए, तो पशु में साफ लक्षण दिखाई देने लगते हैं. इसमें पशु बार-बार उठने-बैठने लगता है, पेट में दर्द होता है, पेशाब के रास्ते से गंदा कचरा निकलता है आदि. यदि वॉटर बैग में मौजूद न्यूट्रिक फ्लूड फूट जाए और तीन–चार घंटे तक बच्चा बाहर न निकले, तो तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए और बच्चे को निकलवाना जरूरी होता है.
दूसरे बछड़े को गाय के सामने ले जाते
डॉ भारती के अनुसार, कई मामलों में जानवर के पेट में बच्चा मृत हो जाता है. जिसके बाद पशु के शरीर से ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज नहीं होता. यही हार्मोन दूध उतरने में अहम भूमिका निभाता है. ऐसी स्थिति में पशुपालक बघेलखंडी भाषा में कहते हैं कि जानवर पेन्हा नहीं रहा यानी दूध नहीं उतर रहा. यदि बच्चा मृत पैदा होता है, तो कुछ किसान दूसरे पशु के नवजात बछड़े को मृत बच्चे से निकले न्यूट्रिक फ्लूड और वेस्ट से सना कर उस गाय के सामने ले आते हैं. इससे गाय उसे अपना ही बच्चा मान लेती है और दूध देना शुरू कर देती है.
पुराने समय के कैती का नया ढंग
पुराने जमाने में इस प्रक्रिया के लिए एक खास तरीका प्रचलित था, जिसे स्थानीय भाषा में कैती कहा जाता था. नवजात मृत बछड़े की स्किन निकालकर उसमें नमक की परत लगाई जाती थी और अंदर लकड़ी या भूसे का ढांचा तैयार किया जाता था. यह कैती दिखने और सूंघने में बिल्कुल असली बछड़े जैसी होती थी. आज के समय में ऐसे कारीगर कम मिलते हैं, इसलिए किसान लकड़ी, भूसा और कपड़े से ही बछड़े जैसा स्ट्रक्चर बनाकर उसे सिल देते हैं.
प्रोसेस तुरंत करनी चाहिए
पशु चिकित्सकों का कहना है कि यह प्रक्रिया कोविंग यानी बच्चे के जन्म के तुरंत बाद करनी चाहिए. जैसे ही यह पता चले कि बच्चा मर चुका है, तो फौरन आर्टिफिशियल बछड़ा तैयार कर गाय के सामने रखना चाहिए. ऐसा करने से मां उस ढांचे को ही अपना बच्चा मान लेती है और उसी हिसाब से अधिक दूध देती है. एक हिस्सा वह बछड़े के लिए और बाकी अतिरिक्त दूध किसान के काम आता है.
कुल मिलाकर यह देसी जुगाड़ दिखाता है कि ग्रामीण ज्ञान और अनुभव आज भी कितने उपयोगी हैं. आधुनिक पशुपालन के दौर में भी यह पुरानी तकनीक किसानों के लिए आर्थिक सहारा बन रही है और पशुपालकों को नुकसान से बचाने में मदद कर रही है.