आजादी के 77 साल बाद जब पहली बार जले बल्ब, अहेरा गांव के लोगों की आंखों में छलक आए आंसू; पीढ़ियों का अंधेरा खत्म

आजादी के 77 साल बाद जब पहली बार जले बल्ब, अहेरा गांव के लोगों की आंखों में छलक आए आंसू; पीढ़ियों का अंधेरा खत्म


स्वतंत्र भारत के 77 साल बाद भी मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के छोटे से गांव अहेरा ने स्वतंत्रता का असली अर्थ नहीं समझा था. कारण था कि यहां कभी बिजली नहीं पहुंची. आजादी के बाद से इस गांव के लोग बिजली की रोशनी से वंचित थे. पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन गांव की रातें दीये और लालटेन की रोशनी में ही गुजरती रही.

अहेरा गांव जंगल के इलाके में स्थित है. चारों तरफ घना जंगल, कच्चे रास्ते और सीमित सुविधाएं. यहां रहने वाले ज्यादातर लोग आदिवासी समुदाय से है. जिनके लिए जीवन हमेशा संघर्षपूर्ण रहा. दिन किसी तरह कट जाता था, लेकिन रात होते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता था. बच्चों की पढ़ाई हो या बीमार बुजुर्गों की परेशानी, बिजली न होने से हर काम मुश्किल हो जाता था.

गांव के बुजुर्ग बताते है कि उन्होंने अपने बचपन से लेकर आज तक गांव में कभी बल्ब जलते नहीं देखा. ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार बिजली के लिए अधिकारियों से शिकायत की. कभी तहसील गए, कभी जिला कार्यालय तक पहुंचे. लेकिन हर बार फाइलें अटकती रही. गांव फॉरेस्ट एरिया में होने के कारण आवश्यक अनुमतियां नहीं मिल पाती थी. साल दर साल गुजरते गए. लेकिन गांव का अंधेरा नहीं छंटा.

4 दिसंबर का दिन अहेरा गांव के लिए किसी त्योहार से कम नहीं रहा. उस दिन मुख्यमंत्री मोहन यादव कूनो नेशनल पार्क जा रहे थे. उनका काफिला इस इलाके से गुजर रहा था. जैसे ही ग्रामीणों को पता चला वे दौड़कर सड़क पर पहुंचे और काफिले को रोक लिया. ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से कहा साहब, आजादी के बाद से हमारे गांव में बिजली नहीं आई. हम आज भी अंधेरे में जी रहे हैं. यह सुनकर मुख्यमंत्री भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत अधिकारियों को मौके पर बुलाया और स्पष्ट निर्देश दिए कि गांव में जल्द से जल्द बिजली पहुंचाई जाए.

इसके बाद प्रशासन हरकत में आया. कलेक्टर रविंद्र कुमार चौधरी के अनुसार जैसे ही फॉरेस्ट विभाग से आवश्यक अनुमतियां मिली. काम तेजी से शुरू कर दिया गया. पीएम जनमन योजना के तहत गांव का विद्युतीकरण किया गया. गांव के सरपंच विद्दिया आदिवासी और सचिव लक्ष्मण उपसरपंच रेनू भदोरिया ने भी भरपूर सहयोग किया.

करीब एक महीने के भीतर गांव के 138 आदिवासी परिवारों को बिजली से जोड़ दिया गया. इसके लिए 15.45 किलोमीटर लंबी 11 केवी हाई टेंशन लाइन बिछाई गई. 3.78 किलोमीटर लो टेंशन लाइन डाली गई और 9 ट्रांसफार्मर लगाए गए. इस पूरे काम पर करीब 1.19 करोड़ रुपये खर्च किए गए.

जिस दिन गांव में पहली बार बल्ब जले. उस दिन लोगों की आंखों में खुशी के आंसू थे. बच्चों ने पहली बार अपने घर में बिजली की रोशनी देखी. बुजुर्ग देर तक बल्ब को देखते रहे. मानो यकीन ही नहीं हो रहा हो कि अब उनका गांव भी रोशन हो गया है.

बिजली के साथ-साथ गांव में पहली बार हर घर के बाहर नल कनेक्शन भी लगाए गए है. अब लोगों को दूर से पानी ढोकर नहीं लाना पड़ता. इसके अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइटें भी गांव की गलियों में लगाई गई है. जिससे रात में बाहर निकलना सुरक्षित हो गया है.

इतना ही नहीं, अब तक मोबाइल नेटवर्क से कटे इस गांव में बीएसएनएल का मोबाइल टावर लगाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. इससे गांव के लोग बाहरी दुनिया से जुड़ पाएंगे.अहेरा गांव ही नहीं, बल्कि इसी अभियान के तहत शिवपुरी जिले की 339 पीवीटीजी और जुगा आदिवासी बस्तियों में भी बिजली पहुंचाई गई है. कुल 4017 आदिवासी परिवारों को बिजली मिलने के बाद शिवपुरी जिला पीवीटीजी योजना के तहत देश में पहला स्थान हासिल कर चुका है.



Source link