बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट में बीते कुछ महीनों में ट्रैफिक की व्यवस्था में काफी सुधार आया है. नागरिकों में हेलमेट लगाने और यातायात नियमों का पालन करवाने के लिए पुलिस जमीन पर काम कर रही है. ऐसे में लोग भी जागरूक हो रहे हैं. लोग खुशी-खुशी न सिर्फ हेलमेट लगा रहे बल्कि ट्रैफिक नियमों के लिए जागरूक भी हो रहे हैं लेकिन समाज में ऐसे लोग भी हैं, जो नियम तोड़ने पर पुलिस से बहस करते हैं और अपना रसूख बताते हैं. ऐसे में पुलिस के लिए यातायात नियमों का पालन करवाना टेढ़ी खीर बन जाता है. इन जैसे लोगों को देखकर अन्य लोग भी पुलिस से खराब व्यवहार करने की कोशिश करते हैं. वे लोग सड़क पर तैनात पुलिसकर्मियों की झूठी शिकायत उनके उच्च अधिकारियों से करते हैं.
मामला यही नहीं थमता, कई तो कानूनी कार्रवाई तक पहुंच जाते हैं लेकिन पुलिसकर्मी भी अब बेखौफ रहते हैं. दरअसल उनके पास फील्ड पर आने वाली समस्याओं के बचाव के लिए एक खास डिवाइस होता है, जो ड्यूटी के वक्त उनके कंधे पर होता है. यहीं आधुनिक यंत्र उनके बचाव में और सबूत इकट्ठा करने में काम आता है. हम बात कर रहे है बॉडी वार्न कैमरे की. यह डिवाइस न सिर्फ ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर नकेल कसता है बल्कि विवाद के समय सबूत भी इकट्ठा करता है.
क्या है बॉडी वार्न कैमरा?
बॉडी वॉर्न कैमरा एक छोटा सा पोर्टेबल वीडियो रिकॉर्डिंग डिवाइस है. यह ड्यूटी के दौरान अराजक तत्वों पर नजर रखने के काम आता है. यह फील्ड पर पारदर्शिता, डॉक्यूमेंटेशन और जवाबदेही तय करने में मदद करता है. अगर कोई हेलमेट न पहने, सीट बेल्ट न लगाए, गलत साइड से आ रहा हो, तो यह डिवाइस इसे कैप्चर करने और ई-चालान भेजने में मदद करता है.
बालाघाट के यातायात थाना प्रभारी यीना राहंगडाले ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि बॉडी वार्न कैमरे को पुलिसकर्मी अपने कंधे पर हुक की मदद से टांगते हैं, जो उनके आगे हो रही घटना को कैमरे में ऑडियो के साथ कैद करता है. इसमें एक इंटरनल स्टोरेज यानी मेमोरी कार्ड होता है. आमतौर पर शिफ्ट खत्म होने के बाद पुलिसकर्मी फुटेज को क्लाउड स्टोरेज या फिर कंप्यूटर में ट्रांसफर कर देते हैं. वहीं अगर जरूरी फुटेज न हो, तो उसे डिलीट कर दिया जाता है.
सिंगल चार्ज में 8 से 10 घंटे रिकॉर्डिंग
उन्होंने आगे बताया कि इस डिवाइस की खास बात है कि यह सिंगल चार्ज में 8 से 10 घंटे तक चल जाता है, यानी कि इसे लंबी बैटरी लाइफ के लिए डिजाइन किया गया है. अब लगातार इसका इस्तेमाल हो रहा है. इसमें नाइट विजन फीचर भी होता है, जो रात में काम कर रहे पुलिसकर्मियों को सहूलियत देता है.
बॉडी वॉर्न कैमरे का इस्तेमाल साल 2005 से शुरू हो गया था. सबसे पहले ब्रिटेन पुलिस ने इसकी टेस्टिंग की थी. इसके बाद 2012 में अमेरिका पुलिस ने इसे अपनाया था. इसके इस्तेमाल से ही कई अच्छे बदलाव देखने को मिले और फिर धीरे-धीरे पूरी दुनिया में इसका इस्तेमाल होने लगे. वहीं भारत की बात की जाए, तो 2015 में हैदराबाद ट्रैफिक पुलिस ने इसे जमीन पर काम करने वाले पुलिसकर्मियों को दिया था. इसी के साथ ही दिल्ली पुलिस ने इसे ट्रैफिक और पेट्रोलिंग पुलिस के लिए शुरू किया था. यह तब पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ था लेकिन अब यह पुलिस के लिए कवच के रूप में काम कर रहा है.
बालाघाट पुलिस के लिए बेहद मददगार
बालाघाट यातायात पुलिस को भी बॉडी वार्न कैमरे मिले हैं. कई पुलिसकर्मी पहली बार इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. अब वे पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. शुरुआत में उनके लिए इसे चलाना थोड़ा मुश्किल था लेकिन अब धीरे-धीरे पुलिसकर्मी इसका अच्छे से इस्तेमाल कर पा रहे हैं. थाना प्रभारी ने बताया कि यह कैमरा बहुत मददगार साबित हो रहा है. कई बार लोग गलत आरोप लगा देते हैं. ऐसे में यह बॉडी वार्न कैमरा ही उन्हें बचाता है और तथ्यों का संकलन करता है. यह वाद-विवाद को कैद करने और वीडियो को सबूत के तौर पर रखने के लिए अच्छा साधन है. ऐसे में यह डिवाइस न सिर्फ हमारी सुरक्षा करता है बल्कि नियम तोड़ने वालों के ई-चालान में भी मदद करता है.