राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत शुक्रवार खरगोन जिले के लेपा आश्रम पहुंचे। यहां श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन द्वारा आयोजित एक विचार-प्रेरक कार्यक्रम में सहभागिता की। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कार्यों से जुड़े लोगों का लगभग ढाई घंटे विशेष सत्र हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में सेवा, समर्पण और सद्भाव के भाव को और अधिक मजबूत करना है। कार्यक्रम में चयनित 250 लोग शामिल हुए। डॉक्टर भागवत ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक उत्थान, ग्रामीण विकास और आपदा सेवा जैसे क्षेत्र में विशेष सेवा दे रहे लोगों का आत्म बल बढ़ाया। जब व्यक्ति का चरित्र, विचार और आचरण मजबूत होता है, तभी समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त बनता है। 200 लोग भागवत की सुरक्षा में रहे
सरसंघचालक के दौरे को लेकर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रही। 200 से ज्यादा सुरक्षा जवान लगे हुए थे। डॉ मोहन भागवत इंदौर से करत होकर नर्मदा किनारे लेपा पुनर्वास नर्मदालय आश्रम पहुंचे। यह आश्रम नर्मदा घाटी में शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े काम कर रहे हैं। खास तौर पर निमाड़ की नर्मदा घाटी क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण के साथ आदिवासी बच्चों की पढ़ाई पर फोकस कर रहा है। उन्होंने कहा सभी परमेश्वर के स्वरूप है, अत: उपकार नही, सेवा करना हमारा धर्म है। हमारे यहां चैरिटी नही, सेवा है। बोले- सुख बाहर नहीं, मनुष्य के अंदर
मनुष्य देखकर ही सीखता है, सुनकर या बोलकर नही। भारत की यात्रा में यह सत्य सिद्ध हुआ कि सुख बाहर नही, अपितु मनुष्य के अंदर ही है। भारत में मनुष्य के अंदर की खोज की यात्रा प्रारंभ हुई। मनुष्य के अंदर की यात्रा से हमें शाश्वत सुख प्राप्त होता है। हमारे पूर्वजों ने अनुभव के आधार पर बताया कि माया का आधार अध्यात्म ही होना चाहिए। ईश्वर ने मनुष्य को संवेदना दी है। मनुष्य की संवेदना दूसरे के सुख-दु:ख को जानती है। किसी की उपेक्षा करके सुख भोगना, मनुष्य की संवेदना में नहीं है। जीवन मूल्यों के लिये जीवन में शिक्षा और शुचिता का आवश्यक है। मनुष्य को शिक्षा इसीलिए चाहिए कि मुझे स्वयं का दुख दूर तो करना ही है, किन्तु समाज और देश का भी दुख दूर करना है, यह स्वभाव भारत का स्वभाव है। ऐसा धर्म जब हमने दुनिया को दिया, तब भारत बना। परतंत्रता में भी हमारा स्वाभाव नहीं बदला। टंट्या मामा और संत गाडगे पर बोले भागवत
टंट्या मामा और संत गाडगे महाराज जैसे महापुरुषों में कोई औपचारिक शिक्षा ली थी, किंतु आज भी उनका सम्मान है। हमारे अंदर दैवीय गुण निहित है, उन्हें बाहर निकालना होगा उसका ज्ञान प्राप्त करना होगा। मनुष्य को विश्व मानवता का ज्ञान दिलाने वाली शिक्षा, आत्मनिर्भर बनाने वाली शिक्षा, श्रम की प्रतिष्ठा वाली शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है। व्यक्ति की बजाय कर्म की मान्यता और परिणाम की बजाय प्रामाणिक और उत्कृष्ट कार्य करना, भारत का स्वभाव है।
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