अगर बंदर नहीं रहे तो क्या होगा? 35 साल की रिसर्च ने खोला राज, सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई

अगर बंदर नहीं रहे तो क्या होगा? 35 साल की रिसर्च ने खोला राज, सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई


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सागर और आसपास के मंदिरों-गांवों में बंदरों का आतंक बढ़ता दिख रहा है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई चौंकाने वाली है. यूनिवर्सिटी ऑफ मैसूर के प्रोफेसर मेवा सिंह का दावा है कि बीते 35 वर्षों में बंदरों की आबादी करीब 80 फीसदी तक घट चुकी है. जंगलों में भोजन और संसाधन खत्म होने के कारण बंदर सड़कों और गांवों की ओर बढ़ रहे हैं. प्रोफेसर के अनुसार बंदर प्रकृति के संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं. आइए जानते हैं…

Sagar News. पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि अचानक टूरिज्म क्षेत्र मंदिर और गांव में बंदर बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं. मंदिर जाते समय हाथ में जो कुछ भी रहता है उसे छीन ले जाते हैं. गांव में इनका आतंक देखने को मिलता है. बंदर कच्चे मकान के छप्पर फोड़ देते हैं, जिससे गरीबों का नुकसान हो जाता है. सड़क किनारे भी जंगल के आसपास यह दिखाई देते हैं और सड़क दुर्घटनाओं का शिकार भी हो जाते हैं. हमें भले ही बंदरों की आबादी बढ़ते दिख रही हो लेकिन पिछले 35 साल से बंदरों पर अध्ययन कर रहे यूनिवर्सिटी आफ मैसूर के प्रोफेसर ने बड़ा दावा किया है.

उनका कहना है कि बंदरों की संख्या 80 फीसदी तक कम हो गई है और आने वाले समय में क्या होगा इसका अंदाज लगाना मुश्किल है, लेकिन अगर बंदर नहीं होंगे तो प्रकृति का बायोलॉजिकल सिस्टम बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगा. बंदरों के कम होने की वजह जंगलों में उनके रिसोर्सेस खत्म होना है.

बंदरों की आबादी लगातार घटती जा रही
यूनिवर्सिटी ऑफ मैसूर के प्रोफेसर मेवा सिंह पिछले 35 साल से बंदरों को लेकर काम कर रहे हैं, इसमें उन्होंने बंदरों के व्यवहार, जीवन शैली और उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे पर स्टडी की है. स्टडी करने के लिए उन्होंने 1000 किलोमीटर की जगह चिन्हित और इस क्षेत्र में जहां पर भी बंदर पाए गए वहां से फोटोग्राफ्स के माध्यम से रिकॉर्ड जुटाया. फिर इसमें अपने स्टूडेंट्स को भी लगाया. बार बार उन्होंने मॉनिटरिंग की. इन पर स्टडी की. पता चला है कि बंदरों की आबादी लगातार घटती जा रही है.

इस वजह से सड़क-गांव की ओर बढ़ रहे
जंगल में उनके जीवन यापन करने के रिसोर्सेस खत्म होते जा रहे हैं, जिसकी वजह से वह सड़कों की तरफ गांव की तरफ बढ़ रहे हैं. लेकिन बंदर अभी गांव में दिखाई दे रहे हैं या गांव की तरफ आ रहे हैं ऐसा नहीं है बंदर हजारों साल से गांव में रहे हैं. तमिल में संगम नाम का ग्रंथ है जिसमें बार-बार बंदरों के गांव में होने का जिक्र मिलता है, इसलिए हम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते की बंदर अभी गांव की तरफ आ रहे.

प्रोफेसर मेवा सिंह बताते हैं कि चींटी से लेकर शेर तक की जो नेचर बायोलॉजिकल साइकिल है उसमें हर चीज का महत्व है. अगर उसमें से कोई चीज कम हो जाती है तो सारा संतुलन डगमगा जाएगा, हम लोगों की रिसर्च में तो यह भी पाया गया कि बंदरों का ग्रुप जब जंगल से ऐसी जगह पर शिफ्ट हुआ जहां पेड़ों की कमी थी तो वहां उनके द्वारा खाई गई फलों और बीजों को फेंकने की वजह से जंगल ही तैयार हो गया तो ऐसा बंदरों का नेचर के लिए अलग-अलग तरह से उपयोग हैं और इसका पता हमें काफी सालों के बाद चलेगा.

बंदरों से बचाव का तरीका
गांव में आकर आतंक मचाने और नुकसान करने को लेकर मेवा सिंह कहते हैं कि इससे बचाव का यह तरीका है कि जहां पर बंदरों का आतंक है वहां घरों पर या आंगन में किसी भी तरह की खाने की चीज नहीं रखें. इसके अलावा कुछ लोग इन्हें पका पकाया भोजन दे देते हैं या अन्य खाने वाली चीज देते हैं, जिसकी इन्हें आदत लग जाती है. फिर वह गांव में ही डेरा जमा लेते हैं. परेशान होकर कई लोग पॉइजन दे देते हैं कोई करंट डाल देता है या कोई अन्य तरीके से मार देता है तो इससे अच्छा है कि उन्हें खाने के लिए ना कुछ दिया जाए तो वह आएंगे नहीं.

ICIBR-2026 का शुभारंभ
तीन दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इंटीग्रेटेड बायोलॉजिकल रिसर्च (ICIBR-2026) का शुभारंभ बुधवार को मध्य प्रदेश के सागर स्थित डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में हुआ. इस सम्मेलन का आयोजन स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज़ के प्राणीशास्त्र विभाग द्वारा किया जा रहा है. सम्मेलन में देश-विदेश से आए प्रतिष्ठित जीवविज्ञानी, पारिस्थितिकीविद, स्वास्थ्य वैज्ञानिक, शिक्षाविद् तथा युवा शोधकर्ता सहभागी रहे.

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Dallu Slathia

Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें

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