हाथों में आवेदन, आंखों में उम्मीद…कलेक्टर ऑफिस के बाहर लगी भीड़, जानें वजह!

हाथों में आवेदन, आंखों में उम्मीद…कलेक्टर ऑफिस के बाहर लगी भीड़, जानें वजह!


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Har Ghar Jal Yojana Ground Reality: डिण्डौरी जिले के पिंडरूखी गांव में हर घर जल योजना की सच्चाई बेहद डरावनी तस्वीर पेश करती है, जहां बैगा जनजाति के लोग नाले और झरनों का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. कागजों में नल-जल योजना होने के बावजूद गांव के नल सूखे पड़े हैं और ग्रामीण रोजाना कई किलोमीटर चलकर पानी लाते हैं. पानी के साथ-साथ पक्की सड़क न होने से एंबुलेंस और सरकारी सुविधाएं भी गांव तक नहीं पहुंच पातीं. व्यवस्था से परेशान होकर ग्रामीण कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और अपनी पीड़ा प्रशासन के सामने रखी. यह ग्राउंड रिपोर्ट सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के बड़े फर्क को साफ तौर पर उजागर करती है.

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रिपोर्ट-भीमशंकर साहू, डिंडोरी

मध्यप्रदेश के डिण्डौरी जिला में विकास के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है. शहपुरा विधानसभा के अमरपुर विकासखंड की ग्राम पंचायत परसेल का पिंडरूखी गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. यहां रहने वाली विशेष जनजाति ‘बैगा’ के लोगों के लिए न साफ पानी है और न ही पक्की सड़क. हालात ऐसे हैं कि ग्रामीण नाले और झरनों के गंदे पानी से ही अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं.

नल-जल योजना सिर्फ फाइलों में
सरकार की बहुचर्चित हर घर जल योजना गांव में सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गई है. गांव में नल तो लगाए गए, लेकिन उनमें एक बूंद पानी नहीं आता. नतीजा यह है कि महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाने जाते हैं. कई बार वही पानी पीना पड़ता है, जो जानवर भी पीते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि दूषित पानी की वजह से गांव में बीमारियां तेजी से फैल रही हैं.

सड़क नहीं, तो सुविधा भी नहीं
पानी की परेशानी के साथ-साथ गांव में पक्की सड़क का न होना दूसरी बड़ी समस्या बन गया है. बरसात के दिनों में हालात और बदतर हो जाते हैं. एंबुलेंस, सरकारी वाहन या कोई भी मदद गांव तक नहीं पहुंच पाती. किसी मरीज को अस्पताल ले जाना हो तो चारपाई या बाइक ही सहारा बनती है. ग्रामीणों का कहना है कि सड़क न होने से वे पूरी तरह मुख्यधारा से कट गए हैं.

हारकर पहुंचे कलेक्टर की चौखट पर
सालों तक गुहार लगाने के बाद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो गांव के लोग मजबूरी में कलेक्टर कार्यालय पहुंचे. हाथों में आवेदन और आंखों में उम्मीद लेकर पहुंचे ग्रामीणों ने प्रशासन को अपनी पीड़ा बताई. उनका साफ कहना है कि अगर जल्द पानी और सड़क की व्यवस्था नहीं हुई, तो उनका जीवन और भी नारकीय हो जाएगा.

गीत में छलका महिलाओं का दर्द
गांव की महिलाओं ने अपनी पीड़ा सरकार तक पहुंचाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया. उन्होंने अपनी स्थानीय बोली में गीत गाकर बताया कि कैसे हर दिन पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है. गीत में दर्द भी था, गुस्सा भी और व्यवस्था के प्रति सवाल भी. महिलाओं का कहना है कि जब तक उनकी आवाज सुनी नहीं जाएगी, तब तक वे चुप नहीं बैठेंगी.

अब भी सवाल वही
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन अब जागेगा या फिर इन आदिवासियों की प्यास और सड़क की उम्मीद सिर्फ सरकारी फाइलों में ही दबी रह जाएगी. हर घर जल जैसे बड़े दावे तब तक खोखले हैं, जब तक पिंडरूखी जैसे गांवों तक सच में पानी नहीं पहुंचता.

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shweta singh

Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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