‘मुझे बस 10 मिनट दीजिए’, सुप्रीम कोर्ट में 19 साल के स्‍टूडेंट ने इन 5 शब्‍दों से रचा इतिहास

‘मुझे बस 10 मिनट दीजिए’, सुप्रीम कोर्ट में 19 साल के स्‍टूडेंट ने इन 5 शब्‍दों से रचा इतिहास


भोपाल/जबलपुर.  मध्‍य प्रदेश के 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी की दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया है. बिना वकालत पढ़े, सुप्रीम कोर्ट में अपना केस खुद लड़ने अथर्व ने NEET में 530 अंक हासिल कर EWS कोटे में MBBS सीट का दावा किया था. यह मामला पहले हाई कोर्ट में जीता और अब 10 फरवरी 2026 में एक बार फिर उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अथर्व की दलीलों पर उनके पक्ष में फैसला सुनाया है. दरअसल, मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर से निकलकर 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी ने डॉक्टर बनने के सपने को साकार करने के लिए कड़ी मेहनत की. उन्होंने न केवल NEET परीक्षा को एक बार बल्कि दो बार पास किया, जिसमें 530 अंकों का शानदार स्कोर हासिल किया. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी से ताल्लुक रखने वाले अथर्व के लिए यह स्कोर किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन जब निजी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन की बारी आई, तो उन्हें झटका लग गया. राज्य सरकार की अधिसूचना देरी से जारी होने के कारण EWS कोटे का लाभ न मिलने का हवाला देकर उनका दावा खारिज कर दिया गया. यह खबर अथर्व के परिवार पर भारी थी, क्योंकि मेडिकल शिक्षा का खर्च वहन करना उनके लिए असंभव था. अथर्व ने हार न मानी. उन्होंने कानूनी किताबें पढ़ीं, खुद को तैयार किया और अदालत का रुख किया. यह यात्रा न केवल उनकी व्यक्तिगत लड़ाई थी, बल्कि उन हजारों छात्रों की आवाज बनी जो प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं. अथर्व की कहानी दृढ़ संकल्प की मिसाल है, जहां एक युवा ने सिस्टम की कमियों को चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट की फरवरी 2025 की सुनवाई में अथर्व ने खुद अपनी पैरवी की, बिना किसी वकील के. जब जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने उन्हें बोलने का मौका दिया, तो अथर्व ने कहा, ‘मुझे बस 10 मिनट दीजिए.’ यह आत्मविश्वास भरी अपील जज को इतनी प्रभावित कर गई कि उन्होंने पूरे समय दिए. अथर्व ने तर्क दिया कि पॉलिसी की देरी का दोष योग्य छात्रों पर नहीं डाला जा सकता. कोर्ट ने उनकी दलीलों को सराहा और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रोविजनल MBBS एडमिशन का आदेश दिया. नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देशित किया गया कि सात दिनों में कॉलेज आवंटित हो. यह फैसला न केवल अथर्व की जीत था, बल्कि EWS कोटे की नीतिगत खामियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. अथर्व की यह सफलता युवाओं को प्रेरित करती है कि न्याय के लिए आवाज उठानी चाहिए.

शुरुआती संघर्ष: NEET की दोहरी सफलता और एडमिशन का झटका
अथर्व चतुर्वेदी का सफर 2024 से शुरू हुआ, जब उन्होंने पहली बार NEET UG परीक्षा दी. 530 अंकों के साथ वह EWS श्रेणी में मेरिट लिस्ट में शामिल हो गए. लेकिन मध्य प्रदेश में निजी मेडिकल कॉलेजों के लिए EWS आरक्षण की अधिसूचना न आने के कारण उनका नाम कट गया. राज्य सरकार ने जुलाई 2024 में एक नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें सरकारी कॉलेजों के लिए EWS कोटा का प्रावधान था, लेकिन निजी संस्थानों को इससे बाहर रखा गया. अथर्व ने दूसरी बार NEET 2025 दी और फिर वही स्कोर हासिल किया. परिवार की आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कोचिंग के लिए गांव के रिश्तेदारों से मदद ली. हाईकोर्ट में पहली याचिका दायर की, लेकिन वहां भी राहत न मिली. जजों ने उनकी दलीलों की तारीफ की, लेकिन समयसीमा का हवाला देकर खारिज कर दिया. यह असफलता अथर्व को तोड़ न सकी. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां जनवरी 2025 में नई याचिका दाखिल की. उनकी तैयारी में कानूनी प्रावधानों का गहन अध्ययन शामिल था, जो एक 12वीं पास छात्र के लिए असाधारण था.

सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक पल: ’10 मिनट’ की अपील
फरवरी 2025 की ऑनलाइन सुनवाई के दौरान अथर्व बिना वकील के कोर्ट में उपस्थित हुए. जस्टिस सूर्यकांत ने जब उनसे पूछा कि क्या वे खुद बहस करेंगे, तो अथर्व ने हामी भरी. ‘मुझे बस 10 मिनट दीजिए, सर,’ यह कहते हुए उन्होंने अपनी बात रखनी शुरू की. जज प्रभावित हुए और पूरे 15 मिनट दिए. अथर्व ने तर्क दिया कि संविधान की मूल भावना EWS जैसे वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करने की है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया, जैसे कि आरक्षण नीतियों में समावेशिता पर जोर. उनका कहना था कि प्रशासनिक देरी छात्रों के भविष्य को बाधित नहीं कर सकती. कोर्ट ने माना कि अथर्व का केस असाधारण है, क्योंकि वह योग्य हैं और कोटा का हकदार भी है. अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट ने ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप किया. यह फैसला 10 फरवरी 2025 को आया, जिसमें प्रोविजनल एडमिशन के साथ कॉलेज आवंटन का आदेश था.

फैसले का व्यापक असर: EWS छात्रों के लिए नई उम्मीद
यह फैसला मध्य प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों के लिए मिसाल बनेगा, जहां EWS कोटा लागू करने में देरी होती है. नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को निर्देश मिला है कि अथर्व को 2025-26 सत्र के लिए तुरंत सीट दी जाए. राज्य सरकार को सात दिनों में कॉलेज आवंटित करने का आदेश है, अन्यथा कोर्ट आगे हस्तक्षेप करेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय आरक्षण नीतियों में पारदर्शिता लाएगा. अथर्व की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जहां युवा उन्हें ‘लीगल हीरो’ कहा. उनके परिवार ने इसे ‘ईश्वरीय कृपा’ बताया. लेकिन सवाल उठता है कि क्या सरकारें ऐसी देरी रोकेंगी? अथर्व अब पढ़ाई पर फोकस कर रहे हैं, लेकिन उनका संघर्ष नीतिगत सुधार की मांग करता है.



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