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Mahakal Mahashivratri News: उज्जैन महाकाल की महाशिवरात्रि की धूम पूरे दुनिया में मचती है. दूर-दूर से भक्त बाबा के दर्शन के लिए आते हैं. पूरा उज्जैन जश्न मनाता है. इसी बीच महाशिवरात्रि के बाद बाबा का एक खास प्रसाद मिलता है, जिसके लिए लूट मचती है. माना जाता है कि उसको घर में रखने बरकत नहीं रुकती…
Ujjain News: धर्मनगरी उज्जैन में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शिव नवरात्रि का उत्सव बेहद विशेष और अद्वितीय माना जाता है. बारह ज्योतिर्लिंगों में से केवल उज्जैन ही ऐसा स्थान है, जहां शिव नवरात्रि 9 दिन तक भक्ति और आस्था के साथ मनाई जाती है. इन नौ पावन दिन में बाबा महाकाल प्रतिदिन अलग-अलग दिव्य स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिससे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा वातावरण बन जाता है. हर दिन विशेष पूजन, आरती और आकर्षक श्रृंगार के साथ भगवान का अलौकिक रूप सजाया जाता है. महाशिवरात्रि के अगले दिन महाकाल दूल्हे के रूप में भक्तों के समक्ष प्रकट होते हैं. इस दिन उनका मुखारविंद कुंतल पुष्पों और सप्तधान से भव्य रूप से सजाया जाता है.
विदेशी फूलों से सजता है सेहरा
महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि के अगले दिन भगवान के ऐसे रूप के दर्शन होते हैं, जिसे देखने के लिए शिवभक्त वर्ष भर तक इंतजार करते हैं. भगवान महाकाल का देश विदेश से आए अलग-अलग फूलों के साथ सप्तधान्य, चांदी, भांग, केसर, चंदन, सुगंधित इत्र, फल आदि से श्रृंगार किया जाता है. इसके बाद भगवान की आरती और पूजा होती है. जब भगवान दूल्हा बनकर सेहरा सजा लेते हैं तब शिवभक्त पलक बिछा कर उनका अभिनंदन करते हुए आशीर्वाद लेते हैं. बाबा महाकाल का यह नजारा देखने लायक रहता है, इसलिए देश विदेश से श्रद्धालु महाकाल मंदिर आते हैं.
साल मे एक दिन मिलता है ये प्रसाद
महाकाल मंदिर के पंडित महेश पुजारि ने बताया, महाकाल का सेहरा दर्शन पूरा होने के बाद श्रृंगार जब उतारा जाता है तब इसे लूटने के लिए भी भक्त उतावले दिखाई देते हैं. इस परंपरा के बारे में शास्त्रों में तो कोई उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन इसे सेहरा लूटने की परंपरा कहा जाता है. मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, सेहरे के धान को घर में रखने से मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद बना रहता है और घर में सुख समृद्धि का वास होता है. वहीं सेहरे के फूलों को लोग अपने घर की तिजोरी में रखते हैं, ताकि धन की बरकत बनी रहे. फलों को भक्त प्रसादी के रूप में अपने साथ ले जाते हैं.
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